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Saturday, 13 June 2026
राजनीति

संसद विशेष सत्र: परिसीमन विधेयक विवाद

author
Komal
संवाददाता
📅 16 April 2026, 5:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.0K views
संसद विशेष सत्र: परिसीमन विधेयक विवाद
📷 aarpaarkhabar.com

संसद के विशेष सत्र को लेकर देश की राजनीति में तेजी से उबाल आ गया है। यह विशेष सत्र केवल महिलाओं के आरक्षण के बारे में नहीं है, बल्कि इसके साथ एक बड़ा विवाद भी जुड़ा हुआ है। विपक्ष के नेताओं का कहना है कि सरकार परिसीमन विधेयक के जरिए देश की संसद की बनावट को ही बदल देना चाहती है। आइए, समझते हैं कि आखिर यह सब क्या है और क्यों मची है इतनी बड़ी रार।

लोकसभा की सीटों में भारी वृद्धि की योजना

केंद्र सरकार एक साहसिक कदम उठाने वाली है। उसकी योजना लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों को बढ़ाकर 850 सीटें करने की है। यह संख्या लगभग डेढ़ गुना अधिक है। सरकार का तर्क यह है कि आजादी के बाद से देश की आबादी में भारी इजाफा हुआ है। इसलिए संसद में अधिक प्रतिनिधित्व देना जरूरी है। नए प्रस्तावित ढांचे के अनुसार, 815 सीटें विभिन्न राज्यों को दी जाएंगी और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों के लिए आरक्षित रहेंगी।

इसके साथ ही सरकार महिलाओं को लोकसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की भी घोषणा कर रही है। महिलाओं के सशक्तिकरण की दृष्टि से यह कदम निश्चित रूप से सराहनीय है। लेकिन विपक्ष को इसके अलावा अन्य मुद्दों पर गंभीर आपत्तियां हैं। विरोधी दलों का कहना है कि यह विधेयक केवल नारी शक्ति के बारे में नहीं है, बल्कि इसके पीछे कुछ और ही मंशा है।

विपक्ष का मुख्य विरोध और आशंकाएं

विपक्षी दलों के नेताओं का सबसे बड़ा डर परिसीमन (डिलिमिटेशन) है। परिसीमन का मतलब है कि चुनावी क्षेत्रों की सीमाओं को नए सिरे से तय करना। विपक्ष का कहना है कि जब सीटों की संख्या 543 से बढ़कर 850 हो जाएगी, तो संपूर्ण देश के चुनावी क्षेत्रों को फिर से परिभाषित करना होगा। इस प्रक्रिया में कई राज्यों के चुनावी नक्शे बदल जाएंगे।

विरोधी पक्ष का मुख्य आरोप यह है कि परिसीमन की इस प्रक्रिया में कुछ राज्यों को नुकसान होगा जबकि अन्य को लाभ मिलेगा। विशेषकर, उत्तर भारतीय राज्यों को अधिक सीटें मिलने की संभावना है क्योंकि उनकी आबादी अधिक है। दक्षिण भारतीय राज्यों को चिंता है कि उनकी सीटों की संख्या कम न हो जाए। यह एक राजनीतिक संवेदनशील मुद्दा है जो भारतीय संघ की बुनियाद को प्रभावित करता है।

मणिपुर, नागालैंड और मेघालय जैसे पूर्वोत्तर राज्यों को भी अपनी सीटों के गायब होने का डर है। संविधान के अनुच्छेद 371 के तहत इन राज्यों को विशेष सुरक्षा प्राप्त है। विपक्ष का तर्क है कि सरकार संविधान के इन्हीं प्रावधानों को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

संवैधानिक और राजनीतिक मायने

यह विधेयक महज एक साधारण कानून नहीं है। यह संविधान में संशोधन का प्रस्ताव है। संविधान संशोधन के लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। लोकसभा में सरकार को यह बहुमत प्राप्त है, लेकिन राज्यसभा में स्थिति स्पष्ट नहीं है। विरोधी दलों का संयुक्त प्रयास इस विधेयक को रोकने के लिए हो रहा है।

दूसरी ओर, क्षेत्रीय दल भी अपने हितों की रक्षा के लिए सतर्क हैं। अगर किसी राज्य को परिसीमन के कारण सीटें कम मिलें, तो उस क्षेत्र की राजनीति में भारी उथल-पुथल हो सकती है। इसीलिए कई राज्यों की सरकारें भी इस विधेयक पर अपनी चिंता व्यक्त कर रही हैं।

महिला आरक्षण का मुद्दा भले ही महत्वपूर्ण है, लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह कदम परिसीमन के विवादास्पद मुद्दे को छुपाने के लिए लिया गया है। सरकार महिलाओं के लिए अपना समर्थन दिखाकर एक सकारात्मक छवि बनाना चाहती है, जबकि पीछे से परिसीमन के माध्यम से राजनीतिक लाभ उठाना चाहती है।

भविष्य क्या होगा?

अगले कुछ दिनों में संसद में इस विधेयक पर जोरदार बहस होने वाली है। विरोधी दलें अपने सभी हथकंडे अपनाएंगे इसे रोकने के लिए। महिला आरक्षण तो एक आवश्यक कदम है, लेकिन परिसीमन के सवाल पर बहुत बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। भारतीय राजनीति में यह एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। देश के संघीय ढांचे को बनाए रखना और साथ ही सभी राज्यों को न्यायसंगत प्रतिनिधित्व देना, यह एक बेहद जटिल कार्य है। आने वाले समय में हम देखेंगे कि संसद के इस विशेष सत्र में क्या निर्णय होता है और इसका देश की राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है।