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Thursday, 20 August 2026
समाचार

संघ को स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने की इच्छा नहीं: मोहन भागवत

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Komal
संवाददाता
📅 09 April 2026, 5:46 AM ⏱ 1 मिनट 👁 881 views

नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक महत्वपूर्ण बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि संघ को अपने नाम को इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराने की कोई इच्छा नहीं है। यह बयान संघ की कार्यपद्धति और उसके दर्शन को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

भागवत के इस कथन का अर्थ यह है कि संघ की प्राथमिकता समाज सेवा में निहित है, न कि अपनी प्रशंसा पाने में। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ के द्वारा किए गए सभी कार्य समाज के कल्याण के लिए किए जाते हैं, न कि किसी प्रकार की मान्यता या सम्मान पाने के उद्देश्य से।

संघ की सफलताओं का श्रेय समाज को

मोहन भागवत ने संघ की सभी सफलताओं का श्रेय समाज को दिया है। उन्होंने कहा कि संघ केवल एक माध्यम है जिसके द्वारा समाज अपने लक्ष्यों को प्राप्त करता है। संघ के कार्य समाज की भावनाओं और आकांक्षाओं को दर्शाते हैं। इस दृष्टिकोण से देखें तो संघ एक सामूहिक शक्ति का प्रतीक है, न कि किसी व्यक्ति विशेष या संस्था का।

भागवत के इस बयान से यह स्पष्ट होता है कि संघ की कार्यप्रणाली समूह केंद्रित है। संघ विश्वास करता है कि समाज का विकास तभी संभव है जब लोग मिलकर काम करें और अपने समान लक्ष्यों के लिए प्रयास करें। संघ इसी विचारधारा पर आधारित है।

संघ की विचारधारा और कार्य पद्धति

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना सन 1925 में हुई थी। संघ की मूल विचारधारा राष्ट्र निर्माण और समाज सेवा पर केंद्रित है। संघ के सदस्य विभिन्न सामाजिक कार्यों में भाग लेते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा राहत और सांस्कृतिक कार्यों में संघ की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

भागवत के इस कथन को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि संघ की दीर्घकालीन दृष्टि क्या है। संघ का मानना है कि राष्ट्र के विकास में हर नागरिक की भूमिका महत्वपूर्ण है। संघ केवल एक संगठन नहीं है, बल्कि यह एक आंदोलन है जो समाज को संगठित करने का कार्य करता है।

मोहन भागवत ने बार-बार कहा है कि संघ की कार्यप्रणाली पारदर्शी और समाज के हित में है। संघ का कोई छिपा एजेंडा नहीं है। संघ जो कार्य करता है वह सार्वजनिक रूप से किए जाते हैं। संघ की सदस्यता किसी भी जाति, धर्म या समुदाय के व्यक्ति के लिए खुली है।

इतिहास में स्थान की परवाह न करना

भागवत का कथन कि संघ को इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने की इच्छा नहीं है, यह बेहद महत्वपूर्ण है। यह दर्शाता है कि संघ अपने कार्यों के लिए मान्यता चाहता ही नहीं। संघ का लक्ष्य वर्तमान में समाज को बेहतर बनाना है, भविष्य में अपना नाम रोशन करना नहीं।

यह विचारधारा कई लोगों को प्रभावित करती है क्योंकि यह एक सार्वभौमिक सत्य को प्रकट करती है कि सच्ची सेवा के लिए किसी पुरस्कार या मान्यता की आवश्यकता नहीं होती। समाज का कल्याण ही सर्वोच्च पुरस्कार है।

भागवत ने अपने बयान में संघ की मूल भावना को दर्शाया है। संघ के प्रत्येक सदस्य से यह अपेक्षा की जाती है कि वह समाज के कल्याण के लिए निस्वार्थ सेवा करे। संघ की इसी भावना ने लाखों लोगों को प्रेरित किया है।

यह बयान संघ की आंतरिक शक्ति और उसके विश्वास को दर्शाता है। संघ को अपने कार्यों पर पूरा विश्वास है। वह जानता है कि समाज उसके कार्यों का मूल्यांकन करेगा। इसलिए वह इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने की चिंता नहीं करता।

मोहन भागवत के इस कथन से यह संदेश मिलता है कि सच्ची सेवा के लिए कोई पुरस्कार या प्रशंसा की आवश्यकता नहीं होती। काम के प्रति समर्पण और समाज के प्रति प्रेम ही सर्वोच्च प्रेरणा है। संघ इसी विश्वास पर आधारित है और भविष्य में भी यही दृष्टिकोण बनाए रखेगा।