संघ का मकसद समाज को संगठित कर देश का पुनर्जागरण
त्रिशूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने संघ के उद्देश्यों और विचारधारा को स्पष्ट करते हुए कहा है कि आरएसएस का मुख्य मकसद समाज को संगठित करके देश का पुनर्जागरण करना है। भागवत ने एक कार्यक्रम में अपने विचार रखते हुए कहा कि संघ की विचारधारा किसी खास धर्म या समुदाय के खिलाफ नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आरएसएस की नींव 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना पर है, जिसका अर्थ है पूरी दुनिया एक परिवार है।
मोहन भागवत की विचारधारा का स्पष्ट करण
आरएसएस प्रमुख ने अपने भाषण में कहा कि संघ का हिंदुत्व विचार पूरी तरह से समावेशी है। उन्होंने बताया कि यह विचारधारा विविधता को स्वीकार करती है और सभी समुदायों के साथ मिल-जुलकर रहने का संदेश देती है। भागवत के अनुसार, आरएसएस कभी भी किसी धर्म विशेष को लक्ष्य करके काम नहीं करता है। बल्कि संघ का उद्देश्य सभी लोगों को एक सूत्र में बांधकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देना है।
मोहन भागवत ने अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने राष्ट्र के विकास के लिए जो कार्य किए हैं, वह संघ की विचारधारा का ही एक व्यावहारिक रूप है। भागवत के अनुसार, मोदी सरकार ने देश को विकास के पथ पर आगे बढ़ाया है और सभी समुदायों का विकास किया है।
आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि संघ का सबसे महत्वपूर्ण काम चरित्र निर्माण करना है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि केवल विकास से ही देश आगे नहीं बढ़ सकता, बल्कि लोगों के मन और चरित्र में भी सुधार लाना जरूरी है। भागवत के अनुसार, आरएसएस समाज के प्रत्येक सदस्य को एक अच्छा नागरिक बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
समाज को संगठित करने का उद्देश्य
मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा कि आरएसएस समाज को संगठित करने में विश्वास करता है। उन्होंने समझाया कि जब समाज संगठित हो जाता है, तो देश के विकास में तेजी आती है। संघ का मानना है कि एक संगठित समाज ही एक मजबूत राष्ट्र बना सकता है। भागवत के अनुसार, आरएसएस का प्रत्येक कार्य इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाता है।
आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि संघ की विचारधारा सदियों पुरानी है। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति में ही इस तरह के विचार विद्यमान हैं। भागवत के अनुसार, आरएसएस केवल इन विचारों को आधुनिक समय में अपनाकर समाज में लागू कर रहा है। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा किसी नई चीज नहीं है, बल्कि भारत की अपनी परंपरा का ही एक हिस्सा है।
देश के पुनर्जागरण के लिए संघ की भूमिका
मोहन भागवत ने अपने भाषण के आखिरी भाग में कहा कि आरएसएस देश के पुनर्जागरण के लिए काम कर रहा है। उन्होंने बताया कि संघ का मानना है कि भारत को अपनी खोई हुई पहचान को फिर से पाना चाहिए। भागवत के अनुसार, आरएसएस इस मिशन में पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।
आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि देश का पुनर्जागरण केवल भौतिक विकास से नहीं हो सकता। इसके लिए आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विकास भी जरूरी है। भागवत के अनुसार, संघ इन सभी पहलुओं पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा कि जब तक भारत अपनी मूल संस्कृति और मूल्यों से जुड़ा नहीं रहेगा, तब तक सच्चे अर्थ में विकास संभव नहीं है।
मोहन भागवत का यह भाषण आरएसएस की विचारधारा को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ की विचारधारा समावेशी है और किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है। भागवत के अनुसार, आरएसएस केवल समाज को संगठित करके और चरित्र निर्माण करके देश का विकास करना चाहता है। उन्होंने पीएम मोदी का उदाहरण देकर कहा कि आरएसएस की विचारधारा ही एक विकसित भारत का आधार बन सकती है।
भागवत के भाषण से यह भी पता चलता है कि आरएसएस का मुख्य फोकस राष्ट्र निर्माण पर है। संघ का मानना है कि एक मजबूत और संगठित समाज ही एक मजबूत राष्ट्र बना सकता है। भागवत के अनुसार, यही कारण है कि आरएसएस समाज के प्रत्येक स्तर पर काम कर रहा है। संघ का प्रत्येक कार्य इसी बड़े उद्देश्य को पूरा करने के लिए है। मोहन भागवत का यह भाषण साफ करता है कि आरएसएस की विचारधारा राष्ट्र केंद्रित है और समाज के समग्र विकास के लिए प्रतिबद्ध है।




