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Wednesday, 20 May 2026
विश्व

रूस ने ईरान को नहीं दी इंटेलिजेंस सपोर्ट

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Komal
संवाददाता
📅 16 April 2026, 7:02 AM ⏱ 1 मिनट 👁 495 views
रूस ने ईरान को नहीं दी इंटेलिजेंस सपोर्ट
📷 aarpaarkhabar.com

मॉस्को के क्रेमलिन पैलेस से आई एक बड़ी घोषणा ने पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया है। रूस के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने सीधे तौर पर कहा है कि यह संघर्ष रूस की कोई व्यक्तिगत लड़ाई नहीं है और न ही मॉस्को ईरान को किसी प्रकार की सैन्य जानकारी या बुद्धिमत्ता समर्थन प्रदान कर रहा है। इस बयान ने न केवल मध्य पूर्व में बल्कि पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय में एक नई बहस को जन्म दिया है।

दिमित्री पेस्कोव, जो रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के प्रमुख प्रवक्ता हैं, ने अपने इस वक्तव्य में न केवल दूरी बनाई है बल्कि अमेरिका पर गंभीर आरोप भी लगाए हैं। पेस्कोव ने कहा कि अमेरिका द्वारा अपनाए गए द्वैध मानदंड अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारी भ्रांति पैदा कर रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से इस बात का जिक्र किया कि अमेरिका ने यूरेनियम संबंधी प्रस्तावों को ठुकरा दिया है जो ईरान के साथ संबंधों को सुधारने के लिए महत्वपूर्ण थे।

अमेरिका के दोहरे मानदंड का आरोप

रूस के प्रवक्ता ने स्पष्ट किया कि अमेरिका की नीति में एक खतरनाक विसंगति देखी जा रही है। जहां एक ओर अमेरिका ईरान को परमाणु हथियार रखने का आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर वह खुद परमाणु शक्तियों को समर्थन दे रहा है। यह नीति अंतरराष्ट्रीय कानून के नियमों के विरुद्ध है। पेस्कोव ने बिना किसी लाग-लपेट के कहा कि अमेरिका अपने हितों के लिए नियमों को बदल देता है, जो न्यायसंगत नहीं है।

दिमित्री पेस्कोव के अनुसार, ईरान के पास कभी भी परमाणु हथियार बनाने की कोई वास्तविक मंशा नहीं रही है। वह देश विकास और शांति के पथ पर चलना चाहता था, लेकिन अमेरिका की नीतियों ने उसे लगातार परेशान किया है। रूस का मानना है कि यूरेनियम मुद्दा केवल एक बहाना बन गया है ताकि ईरान पर हमले को न्यायसंगत ठहराया जा सके। यह दृष्टिकोण न केवल गलत है बल्कि खतरनाक भी है क्योंकि इससे पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ती है।

मॉस्को की तटस्थता की रणनीति

रूस के इस बयान का एक बड़ा महत्व यह है कि मॉस्को ने स्पष्ट रूप से अपनी तटस्थता को परिभाषित करने की कोशिश की है। पेस्कोव ने कहा कि रूस न तो ईरान की ओर से हथियार भेज रहा है और न ही इंटेलिजेंस सपोर्ट दे रहा है। यह बयान उन सभी अफवाहों को खारिज करता है जो पश्चिमी देशों द्वारा फैलाई जा रही थीं। हालांकि, रूस की इस तटस्थता की घोषणा को लेकर विश्लेषकों के अलग-अलग विचार हैं।

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या रूस वास्तव में पूरी तरह तटस्थ रह सकता है? मध्य पूर्व में रूस के भू-राजनीतिक हित हैं, और वह सीरिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में, रूस के लिए पूरी तरह तटस्थ रहना मुश्किल हो सकता है। लेकिन क्रेमलिन की इस घोषणा से यह स्पष्ट है कि रूस इस संघर्ष में सीधे हस्तक्षेप नहीं करना चाहता।

परमाणु मुद्दे पर रूस का दृष्टिकोण

पेस्कोव के बयान में एक और महत्वपूर्ण बात यह निकली कि रूस ईरान के परमाणु कार्यक्रमों को लेकर अमेरिका के तरीकों को गलत मानता है। रूस का मानना है कि ईरान के साथ संवाद के माध्यम से इस मुद्दे को सुलझाया जा सकता है, न कि सैन्य आक्रमण के माध्यम से। मॉस्को की राय में, अमेरिका ने 2015 के ईरान परमाणु समझौते को तोड़कर एक बड़ी गलती की थी।

रूस का तर्क है कि यदि अमेरिका उस समझौते को बनाए रखता और अपनी प्रतिबद्धताओं को निभाता, तो आज की परिस्थिति नहीं होती। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से समझौता निकालने के कदम ने ईरान को असुरक्षित महसूस कराया और उसे अपने परमाणु कार्यक्रमों को तेज करने के लिए प्रेरित किया। रूस इसे अमेरिकी विदेश नीति की असफलता मानता है।

क्रेमलिन की यह घोषणा आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। रूस ने साफ कर दिया है कि वह इस संघर्ष में सीधे भागीदार नहीं है, लेकिन वह ईरान की व्यथा को समझता है। दिमित्री पेस्कोव के इस बयान ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि विश्व राजनीति कितनी जटिल है और किस तरह से विभिन्न देश अपने हितों की रक्षा करने के लिए अपनी रणनीति बनाते हैं।