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Saturday, 04 July 2026
राजनीति

सचिन कुमार: 7 नौकरियां छोड़कर बने SDM

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Komal
संवाददाता
📅 22 June 2026, 7:15 AM ⏱ 1 मिनट 👁 284 views
सचिन कुमार: 7 नौकरियां छोड़कर बने SDM
📷 aarpaarkhabar.com

नक्सल प्रभावित इलाके से आने वाले एक किसान परिवार के बेटे सचिन कुमार ने अपनी मेहनत, लगन और दृढ़ निश्चय से एक अलग ही कहानी लिख दी है। जमुई जिले का यह युवा सात सरकारी नौकरियों को एक-एक कर छोड़ता गया, क्योंकि उसका सपना सिर्फ एक पद पाना नहीं था, बल्कि अपने जीवन को एक बेहतर उद्देश्य देना था। आखिरकार, उसकी कड़ी मेहनत रंग लाई और बिहार लोक सेवा आयोग की 70वीं परीक्षा में 104वीं रैंक हासिल कर वह सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) बन गया।

सचिन कुमार की यह यात्रा केवल एक सफलता की गाथा नहीं है, बल्कि यह संघर्ष, आत्मविश्वास और असीम संभावनाओं की एक प्रेरणादायक कहानी है। एक ऐसे परिवार में जन्म लेना जहां गरीबी और असुरक्षा का साया हमेशा रहता है, और फिर भी अपने सपनों को पंख देना - यह किसी असाधारण प्रतिभा का प्रमाण है।

किसान परिवार से शुरू हुई मेहनत की कहानी

जमुई जिला बिहार के सबसे नक्सल प्रभावित इलाकों में से एक है। यहां के इलाके में शिक्षा और सुविधाएं सीमित होती हैं, लेकिन सचिन कुमार ने इसी परिवेश में अपने जीवन का आधार तैयार किया। एक सामान्य किसान परिवार में पैदा हुआ यह बालक बचपन से ही अलग सोच रखता था। उसके माता-पिता चाहते थे कि उनका बेटा पढ़-लिखकर कोई अच्छी नौकरी पा ले, लेकिन सचिन के मन में सिर्फ नौकरी पाना नहीं था। उसका सपना था - अपने जिले, अपने समाज की सेवा करना।

सचिन की प्रारंभिक शिक्षा गांव के स्कूल में हुई। वहां की सीमित सुविधाओं के बीच भी वह अपनी पढ़ाई को लेकर हमेशा गंभीर रहा। माता-पिता की आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उसने अपनी पढ़ाई जारी रखी। धीरे-धीरे सचिन का बेहतरीन प्रदर्शन उसे अपने जिले में एक मेधावी छात्र के रूप में पहचान दिलाने लगा।

सात नौकरियां छोड़ने का असाधारण निर्णय

जीवन की विडंबना यह है कि कई बार हमें अपने सपनों को पूरा करने के लिए कुछ अस्थायी सुविधाओं का त्याग करना पड़ता है। सचिन कुमार के जीवन में भी ऐसी ही स्थिति आई। उसने अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रवेश किया। इन परीक्षाओं में उसे सफलता मिली और उसे रेलवे विभाग सहित सात अलग-अलग सरकारी विभागों में नौकरी के अवसर मिले।

लेकिन यहीं पर सचिन की सोच अलग थी। रेलवे जैसी प्रतिष्ठित नौकरी पाने के बाद भी उसका मन संतुष्ट नहीं हुआ। उसे एहसास था कि ये नौकरियां उसके जीवन का अंतिम मंजिल नहीं हैं। एक-एक कर उसने इन सातों नौकरियों का त्याग कर दिया। यह निर्णय आसान नहीं था। परिवार की आर्थिक परिस्थितियां ठीक नहीं थीं, किंतु सचिन के अंदर का आत्मविश्वास इतना मजबूत था कि उसे पता था - वह अपने लक्ष्य तक जरूर पहुंचेगा।

यह साहस दिखाकर सचिन ने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की। उसने बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी करने का निर्णय लिया। इसके लिए उसने रात दिन एक कर दिया। किताबें उसके सबसे अच्छे साथी बन गईं।

BPSC 70वीं परीक्षा में शानदार सफलता

बिहार लोक सेवा आयोग की 70वीं परीक्षा में सचिन कुमार का शानदार प्रदर्शन रहा। उसने 104वीं रैंक प्राप्त की, जिसके कारण उसे सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) के पद पर नियुक्ति मिली। यह सफलता केवल एक नौकरी नहीं थी, बल्कि यह एक लक्ष्य की प्राप्ति थी। जमुई जिले का यह बेटा अब अपने इलाके में एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में काम कर सकेगा और अपनी जनता की सेवा कर सकेगा।

SDM बनने के बाद सचिन की जिम्मेदारियां बढ़ गईं, लेकिन उसका सपना यहीं सीमित नहीं रहा। वह जानता है कि यह एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। उसका अगला बड़ा लक्ष्य संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की परीक्षा को पास करके भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) का अधिकारी बनना है। IAS अधिकारी बनकर वह राष्ट्र स्तर पर अपनी सेवाएं प्रदान करना चाहता है।

सचिन कुमार की यह यात्रा सभी के लिए प्रेरणा है। जो युवा अपने जीवन में दिशा खोज रहे हैं, उनके लिए सचिन की कहानी यह संदेश देती है कि यदि आप अपने सपने को लेकर सच्चे हैं, यदि आप कड़ी मेहनत करने को तैयार हैं, और यदि आप अपने आप पर विश्वास रखते हैं, तो कोई भी असंभव नहीं है। गरीबी, क्षेत्रीय सीमाएं, या सामाजिक बाधाएं - कुछ भी आपको आपके लक्ष्य से दूर नहीं कर सकती।

सचिन अब एक सफल SDM हैं, लेकिन उनका संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ। IAS बनने के लिए उन्हें UPSC की कड़ी परीक्षा को पास करना होगा। लेकिन यदि आप सचिन के जीवन को देखें, तो आप समझ सकते हैं कि असली जीत वह नहीं है जो अंत में मिलती है, असली जीत तो संघर्ष की प्रक्रिया में होती है। सचिन कुमार ने यह समझ लिया है, और इसीलिए वह हर दिन बेहतर बनने के लिए प्रयासरत है।

जमुई का यह बेटा अब केवल अपने परिवार के लिए नहीं, बल्कि लाखों नक्सल प्रभावित इलाकों के युवाओं के लिए एक प्रतीक बन गया है। उसकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि पिछड़े इलाकों से भी सफल नेतृत्व के लिए योग्य व्यक्ति निकल सकते हैं। यह सफलता की कहानी न केवल व्यक्तिगत है, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है।