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Monday, 15 June 2026
राजनीति

TMC बागी सांसद NCPI में क्यों गए पूरी कहानी

author
Komal
संवाददाता
📅 15 June 2026, 2:46 AM ⏱ 1 मिनट 👁 924 views
TMC बागी सांसद NCPI में क्यों गए पूरी कहानी
📷 aarpaarkhabar.com

टीएमसी में आई बगावत की लहर

पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी को हाल ही में अपने कई सांसदों की बगावत का सामना करना पड़ा है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में चलने वाली इस पार्टी में दरारें पड़ने लगी हैं। कई दिग्गज सांसद जो लंबे समय से टीएमसी का हिस्सा थे, उन्होंने अपनी पार्टी छोड़ने का फैसला किया है। यह बगावत सिर्फ किसी राजनीतिक मतभेद का नतीजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरी कहानी है।

जब ये सांसद अपनी पार्टी से अलग होने का फैसला ले रहे थे, तो उन्हें एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानूनी समस्या का सामना करना पड़ा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 102 और 191 में दलबदल विरोधी कानून यानी एंटी-डिफेक्शन लॉ मौजूद है। इस कानून के तहत अगर कोई निर्वाचित सदस्य अपनी पार्टी बदलता है, तो उसे अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ सकता है। यह कानून इसलिए बनाया गया था ताकि राजनीति में स्थिरता बनी रहे और सांसद अपनी जिम्मेदारियों से न भाग सकें।

टीएमसी के इन बागी सांसदों के पास अब एक ही विकल्प बचा था कि वे सीधे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए में चले जाएं। लेकिन यह भी एक समस्या थी क्योंकि ऐसा करने से उन्हें अपनी सांसद सदस्यता गंवानी पड़ती। सांसद की स्थिति खोने का मतलब था सत्ता और प्रभाव दोनों से हाथ धोना। इसलिए इन नेताओं ने एक बहुत ही होशियारी से भरी कानूनी चाल खेली।

NCPI में विलय की कानूनी तरकीब

टीएमसी के ये बागी सांसद सीधे एनडीए में न जाकर एक नई पार्टी, नेशनल कांग्रेस पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई का रुख किया। यह एक चतुर राजनीतिक कदम था। दलबदल विरोधी कानून में एक महत्वपूर्ण छूट है। यह छूट तब मिलती है जब पार्टी का विलय किया जाता है। अगर किसी पार्टी का दूसरी पार्टी में विलय हो जाता है, तो उस पार्टी के सदस्यों को दलबदली का दोष नहीं लगता।

टीएमसी के सांसदों ने इसी नियम का फायदा उठाया। उन्होंने अपनी पार्टी को एनसीपीआई में विलय करने की घोषणा की। इस तरह कानूनी दृष्टि से यह दलबदली नहीं मानी गई, बल्कि एक पार्टी के विलय के रूप में देखी गई। यह एक बेहद चालाकी भरी कानूनी व्यवस्था थी जिससे ये नेता अपनी सांसद सदस्यता को बचा सके।

इस फैसले के पीछे की राजनीति भी बेहद दिलचस्प है। ये सांसद जानते थे कि अगर वे सीधे एनडीए में चले जाएंगे, तो तत्काल उन्हें संसद से निष्कासित किया जा सकता है। लेकिन पार्टी विलय के जरिए, कानूनी लड़ाई लंबी खिंच सकती थी। इससे उन्हें अपनी सांसद की स्थिति को कुछ समय के लिए सुरक्षित रखने का मौका मिल गया।

राजनीतिक खेल की पृष्ठभूमि

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से ही गतिविधियों से भरी रहती है। भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी पिछले कुछ सालों में बंगाल में अपनी मजबूती बढ़ा रही है। ममता बनर्जी की टीएमसी इस चुनौती का सामना कर रही है। ऐसे में जब इन सांसदों को लगा कि टीएमसी उनके हितों की रक्षा नहीं कर पा रहा, तो उन्होंने अपना रुख बदल दिया।

यह भी संभव है कि इन सांसदों को एनडीए की ओर से आकर्षक ऑफर मिले हों। केंद्र सरकार के साथ जुड़ने से उन्हें विकास कार्यों के लिए बेहतर फंडिंग का वादा किया गया हो। यह एक आम राजनीतिक लेन-देन है जहां सांसद अपने चुनाव क्षेत्र के विकास के लिए केंद्रीय सरकार से अधिक मदद पाने की उम्मीद करते हैं।

हालांकि, एनसीपीआई में विलय की यह घोषणा भी कानूनी चुनौतियों का सामना कर सकती है। चुनाव आयोग और संसद की कार्यवाही समितियों को इस विलय की जांच करनी पड़ सकती है। यह निर्धारित करना पड़ सकता है कि क्या यह विलय वास्तविक था या सिर्फ दलबदल कानून से बचने की एक कानूनी तरकीब थी।

टीएमसी के इस संकट से भारतीय राजनीति में दलबदल विरोधी कानून की कमजोरियां भी उजागर होती हैं। यह कानून जहां एक ओर दलबदल को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था, वहीं दूसरी ओर चतुर राजनेताओं के लिए इसमें खामियां बनी हुई हैं। पार्टी विलय की शर्त का इस्तेमाल करके कोई भी नेता आसानी से एक पार्टी से दूसरी पार्टी में जा सकता है।

यह पूरा प्रकरण दिखाता है कि भारतीय राजनीति कितनी जटिल है। कानूनी नियम होते हुए भी, चतुर राजनेताओं के लिए हमेशा कोई न कोई रास्ता निकल आता है। टीएमसी के इन बागी सांसदों ने जो कदम उठाया है, वह एक ओर दलबदल विरोधी कानून की खामियों को दर्शाता है, तो दूसरी ओर भारतीय राजनीति की वास्तविकता को भी सामने लाता है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि कानूनी लड़ाई में इन सांसदों का क्या हाल होता है।