ईरान युद्ध से ट्रंप ने अमेरिका-यूरोप में दरार चौड़ी की
ईरान संकट ने बढ़ाई अमेरिका-यूरोप की खाई
वर्तमान समय में दुनिया की बड़ी शक्तियों के बीच जो राजनीतिक खींचातानी चल रही है, उसमें एक अहम भूमिका ईरान के सवाल पर ट्रंप की नीति निभा रही है। डोनाल्ड ट्रंप की पुरानी और नई नीतियों के बीच जो विरोधाभास है, वह अब अमेरिका और यूरोप के दक्षिणपंथी गठबंधन को कमजोर करने लगा है। इटली के प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से लेकर फ्रांस के राष्ट्रपति और जर्मनी की राजनीतिक शक्तियां सभी ट्रंप की ईरान नीति पर सवाल उठाने लगी हैं।
यह एक ऐसा मोड़ है जहां दाहिनी विचारधारा वाली राजनीतिक शक्तियां जो पहले अमेरिका के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती थीं, अब उनमें मतभेद देखने को मिल रहा है। ईरान के साथ संघर्ष को लेकर जो सैन्य रणनीति ट्रंप अपना रहे हैं, उससे यूरोपीय नेताओं को लगता है कि यह पूरे क्षेत्र में अस्थिरता पैदा कर सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह दरार सिर्फ एक सामयिक मतभेद नहीं है, बल्कि यह दीर्घकालीन राजनीतिक परिणाम तक पहुंच सकता है।
ट्रंप की अमेरिकी विदेश नीति को लेकर यूरोपीय नेताओं के मन में संदेह की स्थिति बन गई है। इस असहमति का सबसे बड़ा कारण है कि अमेरिका अकेले ईरान के खिलाफ कार्रवाई करना चाहता है, जबकि यूरोप इस मुद्दे को बहुपक्षीय तरीके से हल करना चाहता है। यूरोपीय संघ की राजनीतिक शक्तियां मानती हैं कि सैन्य हस्तक्षेप से पहले कूटनीतिक प्रयास किए जाने चाहिए।
जेडी वेंस के प्रयास विफल हो रहे हैं
अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस को ट्रंप की ओर से इस विवाद को सुलझाने के लिए यूरोप भेजा गया था। वेंस का मकसद था कि वह यूरोपीय नेताओं को ट्रंप की ईरान नीति के पक्ष में करें और एक मजबूत गठबंधन तैयार करें। हालांकि, वेंस के प्रयास अब तक व्यावहारिक सफलता नहीं पा सके हैं। इटली, फ्रांस और जर्मनी के नेताओं ने एक के बाद एक वेंस के साथ होने वाली मीटिंग में अपनी असहमति जाहिर की है।
जर्मनी की राजनीतिक परिस्थिति विशेष रूप से जटिल हो गई है। वहां की दाहिनी पार्टियां भी अब ट्रंप की ईरान रणनीति को पूरी तरह समर्थन नहीं दे रहीं। फ्रांस के राष्ट्रपति ने स्पष्ट कर दिया है कि वह यूरोपीय संघ की एकीकृत नीति के अंतर्गत ही ईरान के मुद्दे पर कदम उठाएंगे। इस तरह की स्थिति ने वेंस की यूरोप यात्रा को निराशाजनक बना दिया है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह असफलता ट्रंप की नीति की कमजोरी को उजागर करती है। जब अमेरिकी उप-नेतृत्व भी यूरोपीय सहयोगियों को समझा नहीं सकता, तो यह दर्शाता है कि ट्रंप की विदेश नीति में कोई बड़ी खामी है। इस स्थिति में अमेरिकी राजनीति में भी आंतरिक दबाव बढ़ने लगा है।
अमेरिकी घरेलू राजनीति में बढ़ता दबाव
ईरान से जुड़ी इस अंतर्राष्ट्रीय नीति के कारण अमेरिका के अंदर की राजनीति भी प्रभावित हो रही है। हाल के चुनावी परिणामों में रिपब्लिकन पार्टी को मिली हार से अब पार्टी के भीतर ट्रंप की नीतियों पर सवाल उठने लगे हैं। कई रिपब्लिकन सांसद और पार्टी के वरिष्ठ नेता अब खुले तौर पर यह कह रहे हैं कि ईरान पॉलिसी को फिर से सोचने की जरूरत है।
अमेरिकी संसद में भी इस मुद्दे को लेकर गर्मागर्म बहस हो रही है। जनतांत्रिक पार्टी ट्रंप की आक्रामक नीति का विरोध कर रही है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी के अंदर ही विभाजन देखने को मिल रहा है। ट्रंप की नीति को समर्थन देने वाले और विरोध करने वाले दोनों गुट पार्टी के भीतर सक्रिय हो गए हैं।
यह राजनीतिक दबाव ट्रंप के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। एक ओर तो वह यूरोपीय सहयोगियों को साथ लाना चाहते हैं, दूसरी ओर घरेलू राजनीति में भी संतुलन बनाना पड़ रहा है। इस स्थिति में अमेरिकी विदेश नीति की स्पष्टता में कमी आ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ट्रंप अपनी ईरान नीति में जल्द कोई समायोजन नहीं करते हैं, तो अमेरिका और यूरोप के बीच की दरार और चौड़ी हो सकती है। यह दरार न सिर्फ राजनीतिक होगी, बल्कि आर्थिक और सुरक्षा संबंधों में भी असर डाल सकती है। सभी दृष्टि से यह एक ऐसा समय है जब दोनों क्षेत्रों को विवेकपूर्ण कदम उठाने की जरूरत है।
वर्तमान परिस्थितियों में साफ है कि ईरान का सवाल केवल एक भू-राजनीतिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह अमेरिकी और यूरोपीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। आने वाले समय में कैसे इस संकट से निपटा जाता है, यह देश-दुनिया के लिए काफी महत्वपूर्ण होगा।




