ट्रंप शांति, नेतन्याहू युद्ध: ईरान डील पर संकट
हाल के महीनों में मध्य पूर्व का राजनीतिक परिदृश्य काफी जटिल हो गया है। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप शांति वार्ता और कूटनीतिक समाधान की बातें कर रहे हैं, तो दूसरी ओर इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ईरान के खिलाफ कठोर रुख अपनाए हुए हैं। इस विरोधाभासी नीति के कारण ईरान परमाणु समझौते को लेकर गंभीर संकट पैदा हो गया है और यह सवाल उठ गया है कि क्या इजरायल इस महत्वपूर्ण डील को पटरी से उतार देगा।
नेतन्याहू ने दशकों से लगातार ईरान को इजरायल की सुरक्षा के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में चिन्हित किया है। उन्होंने बार-बार यह तर्क दिया है कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और यह इजरायल के अस्तित्व के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की शांति के लिए खतरनाक है। इसलिए उन्होंने लगातार अमेरिकी सरकारों से यह अपील की है कि ईरान पर अधिकतम दबाव बनाया जाए और उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं को नियंत्रित किया जाए।
ट्रंप की शांति नीति बनाम नेतन्याहू का आक्रामक रुख
वर्तमान में इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक अलग ही संकट पैदा हो गया है। ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ बातचीत और कूटनीतिक मार्ग अपनाना चाहता है। वह मानते हैं कि सैन्य कार्रवाई और आक्रामक नीति से ज्यादा बेहतर है कि सभी पक्षों के बीच संवाद स्थापित किया जाए। इसके विपरीत, नेतन्याहू का मानना है कि ईरान के साथ कोई भी कूटनीतिक समाधान अप्रभावी साबित होगा क्योंकि ईरान खुद को परमाणु शक्ति बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
यह भिन्नता दोनों देशों की नीतियों में एक बड़ी खाई पैदा कर रही है। नेतन्याहू इजरायल की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं और किसी भी संभावित खतरे को लेकर बहुत सतर्क रहते हैं। वह मानते हैं कि ईरान की परमाणु क्षमता को नियंत्रित करने के लिए केवल कठोर प्रतिबंध और सैन्य दबाव ही कारगर हो सकते हैं। लेकिन ट्रंप का दृष्टिकोण अलग है। वह मानते हैं कि बातचीत के माध्यम से एक ऐसा समझौता संभव है जो सभी के लिए स्वीकार्य हो।
ईरान परमाणु समझौते का इतिहास और वर्तमान स्थिति
ईरान परमाणु समझौता, जिसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2231 के तहत स्वीकार किया गया था, 2015 में हस्ताक्षर किया गया था। इस समझौते पर ईरान, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी ने हस्ताक्षर किए थे। लेकिन 2018 में ट्रंप के पहले कार्यकाल के दौरान अमेरिका इस समझौते से बाहर निकल गया और अनिलेटरल सेंक्शन लगाए गए।
इस समझौते के तहत ईरान ने अपनी परमाणु गतिविधियों को सीमित करने के लिए सहमति दी थी। समझौते की शर्तों के अनुसार, ईरान को अपने यूरेनियम को समृद्ध करने की प्रक्रिया को नियंत्रित रखना था और अंतर्राष्ट्रीय परमाणु एजेंसी की निरीक्षण टीमों को अपनी सुविधाओं तक पहुंचने देना था। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान को यह समझौता रखना मुश्किल हो गया है। इसके परिणामस्वरूप ईरान ने भी अपनी परमाणु गतिविधियों को बढ़ाया है।
इजरायल की चिंता और अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव
नेतन्याहू की चिंता पूरी तरह से आधारहीन नहीं है। ईरान वास्तव में अपनी सैन्य क्षमता को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है और इसमें परमाणु प्रौद्योगिकी शामिल है। लेकिन यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या ईरान को अलग-थलग करने का तरीका अपनाना ही सही समाधान है? नेतन्याहू का तर्क है कि परमाणु समझौता वास्तव में ईरान को परमाणु शक्ति बनने से नहीं रोक सकता। वह मानते हैं कि यह समझौता केवल समय बर्बाद करने वाला है।
दूसरी ओर, अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इस बात पर विश्वास करता है कि ईरान परमाणु समझौता दीर्घकालिक शांति के लिए महत्वपूर्ण है। यूरोपीय देश, रूस और चीन सभी इस समझौते को बनाए रखना चाहते हैं क्योंकि वह मानते हैं कि इससे ईरान को संयम में रखा जा सकता है। हालांकि ईरान पहले से ही कई बार समझौते की शर्तों का उल्लंघन करने के आरोप का सामना कर रहा है।
वर्तमान परिस्थितियों में इजरायल के सामने एक बड़ी चुनौती है। यदि वह ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करता है, तो इससे पूरे क्षेत्र में युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन यदि वह निष्क्रिय रहता है, तो ईरान की परमाणु क्षमता में वृद्धि होगी। ट्रंप की शांति नीति और नेतन्याहू के आक्रामक रुख के बीच यह टकराव आने वाले समय में और भी जटिल हो सकता है।




