ट्रंप के हाथों पाकिस्तान की कठपुतली बनने की कहानी
निकले थे नायक बनने, पर बन गए पिछलग्गू। यह पाकिस्तान की सियासी कहानी है जो पश्चिम एशिया के युद्धविराम वार्ता में पूरी तरह उजागर हो गई है। जहां पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ खुद को मध्यस्थ के रूप में पेश कर रहे थे, वहीं असली सत्य कुछ और ही था। नई रिपोर्ट्स से पता चल रहा है कि अमेरिकी व्हाइट हाउस ने पाकिस्तान को महज एक संदेशवाहक की तरह इस्तेमाल किया और किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय में इसकी कोई स्वतंत्र भूमिका नहीं थी।
पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मंच पर अपनी स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था। लेकिन इस प्रक्रिया में वह पूरी तरह से अमेरिका के नियंत्रण में आ गया। शहबाज शरीफ की सरकार इस बात को समझ नहीं पाई या समझ कर भी नजरअंदाज कर गई कि व्हाइट हाउस उन्हें एक सीमित भूमिका ही दे रहा था।
अमेरिकी चाल और पाकिस्तान की भोलापन
पश्चिम एशिया में संघर्ष के बीच जब ईरान और अन्य देशों के बीच तनाव बढ़ गया, तब पाकिस्तान को लगा कि यह उसके लिए एक सुनहरा अवसर है। पाकिस्तान का मानना था कि अगर वह इस विवाद को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाता है, तो उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि सुधरेगी और उसे विश्व मंच पर एक सम्मानजनक स्थान मिलेगा।
लेकिन व्हाइट हाउस की रणनीति बिल्कुल अलग थी। अमेरिका को पाकिस्तान की किसी प्रकार की महत्वाकांक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं थी। अमेरिका को केवल एक मध्यस्थ की जरूरत थी जो अपने संदेश को दूसरे पक्षों तक पहुंचा सके। पाकिस्तान को इसी भूमिका में धकेल दिया गया। शहबाज शरीफ और उनकी सरकार केवल दूत बन कर रह गईं।
व्हाइट हाउस के फैसले पाकिस्तान को पहले ही दे दिए जाते थे। पाकिस्तान को यह बताया जाता था कि ईरान के पास क्या संदेश पहुंचाना है, किन शर्तों पर बातचीत होनी है, और किस प्रकार के युद्धविराम की बातें करनी हैं। पाकिस्तान के पास कोई निर्णय लेने की क्षमता नहीं दी गई थी। यह तो बस एक टेलीग्राफ की तरह काम करने के लिए कहा गया था।
शहबाज शरीफ: दर्शक भर नहीं, कठपुतली
शहबाज शरीफ ने सार्वजनिक रूप से यह दावा किया था कि पाकिस्तान इस मामले में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा था कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर शांति की स्थापना में काम कर रहे हैं। लेकिन जो सच था, वह यह था कि शहबाज शरीफ खुद भी ट्रंप प्रशासन के निर्देशों का पालन कर रहे थे।
नई रिपोर्ट्स के अनुसार, व्हाइट हाउस ने पाकिस्तान को इतना भी आजादी नहीं दी कि वह अपने हित के अनुसार कोई कदम उठा सके। जब भी पाकिस्तान किसी विचार को आगे रखने की कोशिश करता था, तो अमेरिका उसे पीछे खींच देता था। पाकिस्तान की सरकार को यह साफ कर दिया जाता था कि उसे केवल यही करना है, जो अमेरिका चाहता है।
यह स्थिति बेहद दयनीय थी। एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में पाकिस्तान को अपनी विदेश नीति में कम से कम कुछ स्वतंत्रता तो होनी चाहिए थी। लेकिन यहां तो पाकिस्तान को पूरी तरह से अमेरिकी नियंत्रण में रखा गया था। शहबाज शरीफ की सरकार इसका विरोध करने के लिए काफी कमजोर थी।
ट्रंप प्रशासन की रणनीति और उसके निहितार्थ
ट्रंप प्रशासन की यह रणनीति बहुत ही चालाकीपूर्ण थी। अमेरिका को पता था कि अगर वह सीधे ईरान के साथ बातचीत करेगा, तो इसमें बहुत सारी जटिलताएं आएंगी। इसलिए अमेरिका ने एक ऐसे मध्यस्थ की तलाश की जो अपने हितों को छोड़कर केवल अमेरिका के निर्देशों का पालन करे। पाकिस्तान को यह भूमिका देने से अमेरिका को दोगुना लाभ मिल गया।
पहला, अमेरिका ने पाकिस्तान के माध्यम से ईरान के साथ बातचीत की, जिससे प्रत्यक्ष संघर्ष से बचा जा सका। दूसरा, पाकिस्तान के लिए यह एक बहुत बड़ी हार थी क्योंकि उसे एहसास हो गया कि दुनिया की ताकतशाली शक्तियों के समक्ष उसकी कोई स्वतंत्र भूमिका नहीं है।
इस पूरे प्रकरण से पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय स्थिति को नुकसान हुआ है। जो पाकिस्तान एक शांतिदूत के रूप में उभरना चाहता था, वह तो अमेरिका की कठपुतली बन गया। इसका असर पाकिस्तान की विदेश नीति पर भी पड़ेगा। अब अन्य देश पाकिस्तान को एक स्वतंत्र हस्ताक्षरकारी के रूप में नहीं, बल्कि अमेरिका का एक दूत के रूप में देखेंगे।
पाकिस्तान की सरकार को यह बात समझनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अपनी स्वतंत्रता बनाए रखना कितना जरूरी है। जब तक पाकिस्तान बड़ी शक्तियों के इशारे पर नाचता रहेगा, तब तक उसे कभी सम्मान नहीं मिलेगा। पाकिस्तान को अपनी आत्मनिर्भरता को मजबूत करना चाहिए और अपनी विदेश नीति में स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए।
यह पूरा प्रकरण एक महत्वपूर्ण सबक देता है कि दुनिया की राजनीति में कितना खतरनाक है अपनी स्वतंत्रता खो देना। पाकिस्तान को इससे सीख लेनी चाहिए और भविष्य में ऐसी गलतियां नहीं करनी चाहिए। राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए, न कि किसी विदेशी शक्ति की नीतियों का अनुसरण करना चाहिए।




