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Saturday, 04 July 2026
विश्व

ट्रंप-पेजेश्कियान डील में पाकिस्तान की भूमिका

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Komal
संवाददाता
📅 19 June 2026, 6:01 AM ⏱ 1 मिनट 👁 868 views
ट्रंप-पेजेश्कियान डील में पाकिस्तान की भूमिका
📷 aarpaarkhabar.com

ट्रंप और पेजेश्कियान के बीच हुई डील को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। लेकिन इस पूरी घटना के पीछे पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। खासकर तब जब शहबाज शरीफ दिखाई दिए और कुछ कागजात पर हस्ताक्षर किए जा रहे थे। इस पूरे प्रकरण में पाकिस्तान की भूमिका न केवल सीमित रही, बल्कि बेहद सतही भी साबित हुई।

ईरान और अमेरिका के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवाद को सुलझाने के लिए विभिन्न प्रयास किए गए हैं। इस प्रक्रिया में पाकिस्तान ने एक बार अपनी भूमिका निभाने की कोशिश की। पाकिस्तान ने अपनी जमीन पर इन दोनों पक्षों के बीच बातचीत की मेजबानी की। हालांकि, इस मेजबानी से निकला परिणाम पूरी तरह से सतही और अधूरा साबित हुआ।

ईरान-अमेरिका डील में पाकिस्तान की सीमित भूमिका

जब ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया, तो विश्व समुदाय ने विभिन्न देशों से मध्यस्थता करने का आग्रह किया। पाकिस्तान भी इस सूची में शामिल था क्योंकि यह भूराजनीतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण देश है। इस्लामाबाद ने ईरान और अमेरिका के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास किया। पाकिस्तान ने अपने देश में वार्ताएं आयोजित करने की पेशकश की। प्रारंभिक चरण में यह प्रयास थोड़ा आशाप्रद लग रहा था।

हालांकि, जैसे-जैसे समय बीतता गया, पाकिस्तान की भूमिका बेहद सीमित होती गई। पाकिस्तान की सरकार और विशेषकर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ केवल संदेशवाहक की भूमिका में रह गए। वे सिर्फ एक देश से दूसरे देश तक चिट्ठियां ले जाते और लाते रहे। लेकिन असली बातचीत और शर्तों को तय करने में उनकी कोई प्रभावी भूमिका नहीं रही। यह पाकिस्तान के लिए एक निराशाजनक स्थिति थी।

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में मध्यस्थता की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। जब कोई देश दो विरोधी पक्षों के बीच मध्यस्थता करता है, तो उसका प्रभाव और महत्व बढ़ता है। लेकिन पाकिस्तान के साथ ऐसा नहीं हुआ। पाकिस्तान केवल एक संदेशवाहक बनकर रह गया। इससे पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय भूमिका और प्रभाव में कोई वृद्धि नहीं हुई।

शहबाज शरीफ और पेपर साइनिंग की पारदर्शिता का प्रश्न

जब ट्रंप और पेजेश्कियान के बीच डील की प्रक्रिया चल रही थी, तो शहबाज शरीफ भी इसके दृश्य में नजर आए। उन्हें विभिन्न दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हुए दिखाया गया। लेकिन सवाल यह है कि वास्तव में कौन से कागजों पर हस्ताक्षर किए जा रहे थे? क्या पाकिस्तान की सरकार ने जनता को इसके बारे में पूर्ण जानकारी दी?

अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और डील्स में पारदर्शिता बेहद जरूरी है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि उसके नेता किस तरह की डील्स कर रहे हैं। लेकिन पाकिस्तान की मीडिया और सरकार इस बारे में पूरी तरह से स्पष्ट नहीं रही। यह एक चिंता का विषय है।

शहबाज शरीफ एक अनुभवी राजनेता हैं, लेकिन उन्हें भी इस पूरी प्रक्रिया में हाशिए पर रखा गया। पाकिस्तान की सरकार को चाहिए था कि वह इस डील में एक सक्रिय भूमिका निभाए। लेकिन वह एक निष्क्रिय दर्शक बनकर रह गई।

पाकिस्तान की राजनीतिक दुर्बलता का परिणाम

पाकिस्तान की इस तरह की भूमिका उसकी राजनीतिक दुर्बलता को दर्शाती है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति कमजोर हुई है। आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता के कारण पाकिस्तान अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी आवाज नहीं उठा पा रहा है।

टर्की, सऊदी अरब और अन्य मुस्लिम देशों ने अंतर्राष्ट्रीय मामलों में अधिक प्रभावी भूमिका निभाई है। लेकिन पाकिस्तान को इसमें कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया। यह दर्शाता है कि पाकिस्तान की अंतर्राष्ट्रीय प्रासंगिकता कम हो गई है।

ईरान-अमेरिका डील पाकिस्तान के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर था। इसके माध्यम से पाकिस्तान अपने आप को एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर सकता था। लेकिन पाकिस्तान ने इस अवसर को खो दिया। यह पाकिस्तान के नेतृत्व की नीतिगत कमजोरी को दर्शाता है।

आने वाले समय में पाकिस्तान को अपनी अंतर्राष्ट्रीय भूमिका को मजबूत करने की जरूरत है। केवल संदेशवाहक बनकर रहना किसी भी देश के लिए लाभदायक नहीं है। पाकिस्तान को अपनी राजनीतिक और आर्थिक स्थिति को मजबूत करना होगा, ताकि वह विश्व राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके। तब तक, पाकिस्तान केवल पर्दे के पीछे की भूमिका में सीमित रहेगा।