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Saturday, 04 July 2026
विश्व

ट्रंप की धमकी पर ईरान भड़का, गालिबाफ की कड़ी प्रतिक्रिया

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Komal
संवाददाता
📅 22 June 2026, 5:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 813 views
ट्रंप की धमकी पर ईरान भड़का, गालिबाफ की कड़ी प्रतिक्रिया
📷 aarpaarkhabar.com

अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चली आ रही कशमकश में एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ एक बार फिर सैन्य कार्रवाई की धमकी दी है। इस बयान के बाद ईरान भड़क उठा है और उसके शीर्ष वार्ताकार मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने अमेरिका को सख्त चेतावनी दी है। गालिबाफ ने कहा है कि अमेरिकी सरकार को अपने बयानों को लेकर अत्यंत सावधान रहना चाहिए क्योंकि ईरान किसी भी प्रकार की धमकी को गंभीरता से लेता है।

हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच एक शांति समझौता हुआ था जिससे दोनों देशों के बीच तनाव कम होने की उम्मीद जताई जा रही थी। लेकिन ट्रंप की नई धमकी से लगता है कि अभी भी दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी बनी हुई है। इस समझौते के बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति की आक्रामक रुख से साफ है कि दोनों देशों के बीच संबंध अभी भी बेहद नाजुक हैं और किसी भी गलत कदम से विस्फोटक स्थिति बन सकती है।

ट्रंप की यह धमकी लेबनान की परिस्थितियों के आलोक में दी गई है जहां ईरान समर्थक आतंकवादी संगठन हिज्बुल्लाह सक्रिय है। अमेरिका का मानना है कि ईरान इस संगठन को हथियार और वित्तीय सहायता प्रदान करता है। ईरान इस आरोप को पूरी तरह खारिज करता है और कहता है कि वह किसी भी आतंकवादी गतिविधि में शामिल नहीं है।

ईरान का कठोर रुख और सैन्य तैयारी

ईरानी वार्ताकार गालिबाफ का बयान साफ दर्शाता है कि ईरान ट्रंप की धमकियों से भयभीत नहीं है। उन्होंने कहा कि ईरान की सशस्त्र सेनाएं हर परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं और वे किसी भी आक्रमण का जवाबी कार्रवाई करने में सक्षम हैं। यह बयान दर्शाता है कि ईरान सैन्य रूप से भी काफी मजबूत स्थिति में है और अपनी क्षमताओं पर भरोसा रखता है।

ईरान के पास बैलिस्टिक मिसाइलों का एक विशाल भंडार है और उसके पास हाइपरसोनिक मिसाइल तकनीक भी विकसित हो चुकी है। ईरान ने अपनी सैन्य क्षमताओं को लगातार अपग्रेड करता रहा है। पिछले कुछ सालों में ईरान ने अपनी मिसाइल तकनीक में काफी सुधार किया है और नई मिसाइलों का परीक्षण किया है। इसलिए गालिबाफ का आत्मविश्वास काफी हद तक यथार्थवादी है।

गालिबाफ ने यह भी कहा कि ईरान को पिछले अनुभवों से सीखना चाहिए और अमेरिकी दबाव की नीति की विफलता को समझना चाहिए। उन्होंने बताया कि पिछले कई दशकों में अमेरिका ने ईरान पर दबाव डालने की कई कोशिशें की हैं लेकिन उनमें से कोई भी सफल नहीं हुई। ईरान हमेशा अपनी स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा के लिए दृढ़ संकल्प रहा है।

शांति समझौते की नाजुक परिस्थितियां

शांति समझौता हालांकि हुआ है लेकिन इसकी कार्यान्वयन की प्रक्रिया बेहद जटिल है। दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी इस प्रक्रिया को और भी मुश्किल बना रही है। अमेरिका और ईरान के बीच दशकों की दुश्मनी को एक रात भर में मिटाया नहीं जा सकता। दोनों देशों को एक दूसरे के प्रति संवेदनशील और सावधान रहना होगा।

ट्रंप की धमकी से लगता है कि अमेरिकी प्रशासन शांति समझौते को एक राजनीतिक विजय मानकर संतुष्ट नहीं है। बल्कि वह ईरान पर अपना दबाव बनाए रखना चाहता है और अपनी शर्तें मनवाना चाहता है। यह दृष्टिकोण शांति के लिए घातक साबित हो सकता है क्योंकि किसी भी समझौते की सफलता के लिए दोनों पक्षों को एक दूसरे की गरिमा का सम्मान करना जरूरी है।

अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की चिंता

इस तनाव से अंतर्राष्ट्रीय समुदाय भी चिंतित है। मध्य पूर्व में किसी भी सैन्य संघर्ष से वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। तेल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और इससे दुनिया भर में मुद्रास्फीति बढ़ सकती है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठन दोनों देशों को शांत रहने और संवाद के माध्यम से अपने विवादों को सुलझाने की सलाह दे रहे हैं।

यूरोपीय संघ के कई सदस्य देश भी इस स्थिति को लेकर चिंतित हैं। वे चाहते हैं कि अमेरिका और ईरान शांति के रास्ते पर चलें। लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीति अपेक्षाकृत कठोर है और वह ईरान को एक खतरनाक देश मानते हैं।

वर्तमान में दोनों देशों के बीच संवाद के रास्ते मुश्किल दिख रहे हैं। लेकिन अंतर्राष्ट्रीय दबाव और मध्यस्थता से संभव है कि दोनों देश फिर से बातचीत की मेज पर आएं। शांति के लिए धैर्य और समझदारी जरूरी है। ट्रंप को अपनी आक्रामक नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए और ईरान को भी अपने रुख में लचीलापन दिखाना चाहिए। केवल संवाद और समझ के माध्यम से ही दोनों देश एक स्थिर भविष्य की ओर बढ़ सकते हैं।