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Friday, 05 June 2026
राजनीति

लखनऊ: महिला आरक्षण पर यूपी विधानमंडल विशेष सत्र

author
Komal
संवाददाता
📅 30 April 2026, 6:00 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
लखनऊ: महिला आरक्षण पर यूपी विधानमंडल विशेष सत्र
📷 aarpaarkhabar.com

लखनऊ - उत्तर प्रदेश विधानमंडल में महिला आरक्षण को लेकर विशेष सत्र आयोजित किया गया है। इस सत्र में गरमागर्मी का माहौल देखा गया और विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने अपनी अलग-अलग मांगें रखीं। समाजवादी पार्टी ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर अतिनिंदा प्रस्ताव पारित किया है जिससे विधानमंडल में तनाव की स्थिति बन गई है।

महिला आरक्षण का मुद्दा भारतीय राजनीति में एक संवेदनशील विषय बना हुआ है। देश के विभिन्न हिस्सों में महिलाओं को स्थानीय निकायों और विधानमंडलों में समान प्रतिनिधित्व देने के लिए आंदोलन चल रहे हैं। उत्तर प्रदेश में भी यह मुद्दा सत्ता के लिए एक महत्वपूर्ण औजार बन गया है।

विधानमंडल में तनावपूर्ण माहौल

विशेष सत्र में विधानमंडल का माहौल काफी तनावपूर्ण रहा। विभिन्न विरोधी दलों के सदस्य लगातार नारे लगा रहे थे और अपनी बातें मनवाने के लिए हंगामे की स्थिति पैदा कर रहे थे। समाजवादी पार्टी के विधायकों ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर अपनी गंभीर चिंताएं जताईं और कहा कि वर्तमान प्रस्ताव पर्याप्त नहीं है।

सत्र के दौरान कई विधायकों ने बार-बार टेबल पीटे और सदन के अध्यक्ष से आग्रह किया कि महिला आरक्षण के मामले में गंभीरता से विचार किया जाए। विरोधी दलों का मानना है कि सरकार महिलाओं के हितों के प्रति गंभीर नहीं है। इस बात पर तीव्र प्रतिक्रिया देते हुए सत्तारूढ़ दल के सदस्यों ने अपनी सरकार के कार्यों की तारीफ की।

सपा का अतिनिंदा प्रस्ताव

समाजवादी पार्टी ने विधानमंडल में एक अतिनिंदा प्रस्ताव पारित किया है। इस प्रस्ताव में पार्टी ने मुख्यमंत्री की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। सपा का कहना है कि महिला आरक्षण के मामले में सरकार नितांत उदासीन रहकर काम कर रही है।

सपा के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता ने इस अवसर पर भावुक भाषण दिया। उन्होंने कहा कि महिलाओं को समान अधिकार देने के लिए केवल बातें नहीं बल्कि ठोस कदम उठाए जाने चाहिए। उन्होंने पिछली सरकारों के दौरान महिलाओं के लिए किए गए कार्यों की चर्चा की और कहा कि वर्तमान सरकार पीछे की ओर चल रही है।

अतिनिंदा प्रस्ताव में सरकार से मांग की गई है कि वह महिला आरक्षण की नीति को स्पष्ट करे और विधानमंडल के सभी स्तरों पर महिलाओं के लिए आरक्षण सुनिश्चित करे। प्रस्ताव में कहा गया है कि आजादी के 75 साल बाद भी भारत में महिलाओं को समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।

महिला आरक्षण की मांग

महिला आरक्षण का मुद्दा भारतीय संसद में कई दशकों से लंबित है। संविधान में संशोधन की बात कही जाती है लेकिन विभिन्न कारणों से यह आगे नहीं बढ़ता। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में महिलाओं की आबादी काफी है परंतु उन्हें सत्ता में उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिला है।

महिला संगठनों का कहना है कि आरक्षण से न केवल महिलाओं को सत्ता में हिस्सेदारी मिलेगी बल्कि समाज में भी सकारात्मक परिवर्तन आएंगे। महिलाएं अपने क्षेत्र की समस्याओं को बेहतर तरीके से समझती हैं और उनका समाधान भी अधिक प्रभावी ढंग से कर सकती हैं।

विधानमंडल में महिलाओं की संख्या बहुत कम है। कई क्षेत्रों में तो एक भी महिला विधायक नहीं हैं। महिला संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि 33 प्रतिशत आरक्षण एक न्यूनतम मांग है न कि अधिकतम। राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि महिलाओं का सशक्तिकरण समाज के सशक्तिकरण के समान है।

विशेष सत्र के बाद बताया गया है कि सरकार महिला आरक्षण पर गंभीरता से विचार करेगी। हालांकि विरोधी दलों को इस वचन पर संदेह है। महिला आरक्षण के मुद्दे को लेकर आने वाले दिनों में विधानमंडल में और भी गरमागर्मी देखने को मिल सकती है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में महिला संगठनों ने भी इस मुद्दे पर विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि महिला आरक्षण का मुद्दा उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक प्रमुख स्थान ले चुका है। आने वाले समय में इसी मुद्दे को लेकर और भी विवाद देखने को मिल सकते हैं। महिलाओं के लिए समान अधिकार और समान प्रतिनिधित्व एक लोकतांत्रिक राज्य की नींव है और इसी आधार पर ही सच्चा विकास संभव है।