होर्मुज स्ट्रेट और न्यूक्लियर मुद्दे पर अटका US-ईरान शांति समझौता
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते की दिशा में चल रही कतर की मध्यस्थता में अब गंभीर अवरोध आ गए हैं। दोहा में मौजूद अमेरिकी राजनयिकों की ईरान के साथ उच्च स्तरीय बैठक नहीं हो पाएगी। कतर सरकार के मुताबिक इस सप्ताह केवल तकनीकी स्तर की वार्ता ही संभव हो पाएगी। यह स्थिति दोनों देशों के बीच चल रही वार्ता प्रक्रिया में एक बड़ी बाधा साबित हो रही है।
यह समझौता जिन मुख्य मुद्दों पर अटका है उनमें होर्मुज जलडमरूमध्य का नियंत्रण और ईरान के परमाणु कार्यक्रम का विनियमन शामिल हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से विश्व का लगभग एक तिहाई तेल व्यापार होता है। अमेरिका इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहता है जबकि ईरान इसे अपनी सार्वभौमिकता का मामला मानता है।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी इसी विवाद का केंद्र बिंदु है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने कई बार ईरान की परमाणु गतिविधियों पर चिंता व्यक्त की है। अमेरिका का मानना है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने की ओर बढ़ रहा है जबकि ईरान यह दावा करता है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है।
होर्मुज जलडमरूमध्य पर तनातनी
होर्मुज जलडमरूमध्य का मुद्दा लंबे समय से दोनों देशों के बीच विवाद का विषय रहा है। यह जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और इसकी चौड़ाई मात्र 21 मील है। इसकी रणनीतिक महत्ता इतनी ज्यादा है कि इसे विश्व के सबसे महत्वपूर्ण जल मार्गों में से एक माना जाता है।
अमेरिका चाहता है कि होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह अंतरराष्ट्रीय जल माना जाए और यहां की नेविगेशन की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए। दूसरी ओर ईरान का तर्क है कि चूंकि यह क्षेत्र उसके तट के पास है इसलिए वह इसके माध्यम से आने-जाने वाले जहाजों पर निगरानी रख सकता है। ईरान ने कई बार इस जलडमरूमध्य को बंद करने की धमकी दी है यदि अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध बढ़ाए गए तो।
यह तनातनी मई 2019 से शुरू हुई थी जब अमेरिका ने परमाणु समझौते से बाहर निकलने का फैसला किया। उसके बाद से दोनों देशों के बीच कई छोटे-मोटे सैन्य झड़प होते रहे हैं। ड्रोन और तेल टैंकर हमलों की घटनाएं इसी तनातनी का परिणाम हैं।
ईरान का परमाणु कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय चिंताएं
ईरान का परमाणु कार्यक्रम पिछले दो दशकों से अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता का विषय रहा है। ईरान ने 2015 में जॉन्ट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) पर हस्ताक्षर किए थे जिसके तहत वह अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के लिए सहमत हुआ था। इसके बदले में अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हटाए जाने थे।
हालांकि 2018 में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इस समझौते से अपने आप को अलग कर लिया और नए प्रतिबंध लगाए। इसके बाद से ईरान ने भी इस समझौते की शर्तों को पूरी तरह मानने से इंकार कर दिया और अपने परमाणु कार्यक्रम को दोबारा तेज किया। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने अपनी यूरेनियम को 90 प्रतिशत तक सुविधाजनक स्तर तक समृद्ध कर दिया है।
यह स्तर परमाणु हथियार बनाने के लिए आवश्यक 90 प्रतिशत समृद्धि से कम है लेकिन यह बहुत खतरनाक माना जाता है। अमेरिका, इजराइल और अरब देश इस पर बहुत चिंतित हैं। वे मानते हैं कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के कगार पर है।
वर्तमान समझौता प्रयास और भविष्य की संभावनाएं
कतर की मध्यस्थता में चल रही वार्ता दोनों पक्षों को समझौते के लिए बैठक के लिए प्रेरित कर रही है। यूरोपीय संघ, चीन और रूस भी इस समझौते को देखना चाहते हैं क्योंकि इससे मध्य-पूर्व में स्थिरता आएगी। लेकिन वर्तमान समय में दोनों पक्ष अपनी-अपनी मांगों पर अड़े हुए हैं।
अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह स्वीकार्य सीमा में रखे और होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से आने-जाने वाले सभी जहाजों को सुरक्षित मार्ग दे। दूसरी ओर ईरान अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों में छूट चाहता है और अपने क्षेत्रीय अधिकारों के प्रति सम्मान की मांग कर रहा है।
इस समय वार्ता की प्रक्रिया बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रही है। तकनीकी स्तर की वार्ता तो चल रही है लेकिन राजनीतिक स्तर पर कोई प्रगति नहीं हो रही है। दोनों देशों के नेतृत्व को एक-दूसरे पर भरोसा नहीं है। पिछले कई वर्षों के बीच तनाव और शत्रुता के कारण विश्वास का माहौल बिल्कुल खत्म हो गया है।
मध्य-पूर्व की स्थिरता के लिए यह समझौता बहुत जरूरी है। विश्व अर्थव्यवस्था को होर्मुज जलडमरूमध्य में शांति की आवश्यकता है। तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव सीधे विश्व व्यापार को प्रभावित करता है। ईरान-अमेरिका संघर्ष से पूरी दुनिया प्रभावित होती है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि समझौता कठिन होगा लेकिन असंभव नहीं है। दोनों पक्षों को अपनी मांगों में लचीलापन दिखाना होगा। कतर जैसे मध्यस्थ देशों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। साथ ही यूरोपीय संघ, चीन और रूस भी इस प्रक्रिया में सहायक हो सकते हैं।
आने वाले महीनों में इस समझौते के प्रति दोनों पक्षों का दृष्टिकोण और भी स्पष्ट होगा। यदि कोई रास्ता निकाला जाता है तो यह विश्व शांति के लिए एक बड़ा कदम होगा। लेकिन यदि वार्ता विफल हो गई तो मध्य-पूर्व में फिर से तनाव का माहौल बन जाएगा।




