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Thursday, 05 November 2026
शिक्षा

विक्रम और मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कविता

मैथिलीशरण गुप्त की अमर कविता 'कहो आज किस ओर चलोगे' का विस्तृत विश्लेषण और महत्व। हिंदी साहित्य का गौरवशाली अध्याय।

author
Komal
संवाददाता
📅 25 October 2026, 7:30 AM ⏱ 1 मिनट 👁 968 views
विक्रम और मैथिलीशरण गुप्त की प्रसिद्ध कविता
📷 aarpaarkhabar.com

हिंदी साहित्य के इतिहास में मैथिलीशरण गुप्त का नाम अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है। वे हिंदी के महान कवि, नाटककार और राष्ट्रभक्त साहित्यकार थे जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय समाज को जागृत किया। उनकी कविता 'कहो आज किस ओर चलोगे' एक ऐसी रचना है जो आज भी प्रासंगिक है और हमें मार्ग दिखाती है।

मैथिलीशरण गुप्त का जीवन परिचय और साहित्यिक यात्रा अत्यंत प्रभावशाली रही है। वे 3 अगस्त 1886 को चिरगाँव (अब झारखंड) में जन्मे थे। उन्होंने अपनी शिक्षा काशी विश्वविद्यालय से प्राप्त की थी। गुप्त जी का साहित्यिक जीवन बहुत ही समृद्ध रहा। वे राष्ट्रीय भावना को अपनी कविताओं में प्रतिबिंबित करते थे और आम जनता को अपनी मातृभाषा से जुड़ने के लिए प्रेरित करते थे।

मैथिलीशरण गुप्त की कविता: विषयवस्तु और महत्व

मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं में राष्ट्रीयता, धर्म, नैतिकता और सामाजिक चेतना के विषय मुख्य रूप से मिलते हैं। उनकी प्रसिद्ध रचना 'भारत भारती' हिंदी साहित्य की एक अमूल्य निधि है। इसमें उन्होंने भारत के गौरव, संस्कृति और परंपरा का वर्णन किया है। 'साकेत' और 'यशोधरा' जैसी महाकाव्यात्मक रचनाएं उनकी प्रतिभा का प्रमाण हैं।

'कहो आज किस ओर चलोगे' कविता में मैथिलीशरण गुप्त ने व्यक्ति और समाज से एक प्रश्न पूछा है। यह कविता हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि हम अपने जीवन में किस दिशा की ओर बढ़ रहे हैं। क्या हम सही मार्ग पर चल रहे हैं? क्या हम अपने कर्तव्यों को पूरा कर रहे हैं? ये सवाल आज के समय में भी बेहद प्रासंगिक हैं।

इस कविता में गुप्त जी ने मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी के बारे में बात की है। वे चाहते हैं कि हर व्यक्ति अपने जीवन के बारे में गंभीरता से सोचे और सही निर्णय ले। उनकी कविता का संदेश आज के युवाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जो अपने भविष्य के बारे में चिंतित रहते हैं।

विक्रम की अवधारणा और हिंदी साहित्य में इसका स्थान

विक्रम शब्द संस्कृत से लिया गया है जिसका अर्थ होता है शक्ति, साहस और पराक्रम। मैथिलीशरण गुप्त की कविताओं में विक्रम की अवधारणा बार-बार दिखाई देती है। वे विश्वास करते थे कि मनुष्य को अपने भीतर की शक्ति को जागृत करना चाहिए और साहस के साथ अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए।

हिंदी साहित्य के आधुनिक काल में विक्रम और पराक्रम की भावना को लेकर कई कविताएं लिखी गई हैं। मैथिलीशरण गुप्त इस धारा के प्रमुख प्रतिनिधि थे। उन्होंने भारत के प्राचीन वीरों और महापुरुषों के जीवन से प्रेरणा लेकर अपनी कविताएं रची थीं। उनका संदेश था कि भारत को अपनी संस्कृति पर गर्व करना चाहिए और अपनी परंपराओं को सहेजना चाहिए।

'साकेत' महाकाव्य में गुप्त जी ने राम और रावण के बीच विक्रम की परीक्षा दिखाई है। इसी तरह 'यशोधरा' में उन्होंने महिला शक्ति और त्याग की गाथा सुनाई है। ये सभी रचनाएं मानवीय मूल्यों और विक्रम की भावना को प्रतिपादित करती हैं।

आज के समय में गुप्त जी की कविता की प्रासंगिकता

वर्तमान समय में जब समाज भौतिकवाद की ओर दौड़ रहा है, मैथिलीशरण गुप्त की कविताएं हमें नैतिक मार्ग दिखाती हैं। 'कहो आज किस ओर चलोगे' कविता का यह प्रश्न आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उस समय था। आज का युवा अपने जीवन में अनेक विकल्पों के सामने खड़ा है। सफलता के लिए वह किस रास्ते पर चले, यह प्रश्न महत्वपूर्ण है।

गुप्त जी की कविताओं में सामाजिक चेतना और राष्ट्रीय गौरव का भाव मिलता है। वे मानते थे कि साहित्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि समाज को बदलने का माध्यम है। आज जब भारतीय संस्कृति को विभिन्न चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, गुप्त जी की विचारधारा हमें सही दिशा दिखाती है।

हिंदी साहित्य को आगे बढ़ाने के लिए मैथिलीशरण गुप्त की भूमिका अतुलनीय है। उन्होंने प्रमाणित किया कि हिंदी भाषा में महान साहित्य की रचना संभव है। उनकी कविताएं आज भी स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई जाती हैं और लाखों लोगों को प्रेरित करती हैं। उनका योगदान भारतीय साहित्य के इतिहास में चिरकाल तक अमर रहेगा।

अंत में, मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'कहो आज किस ओर चलोगे' हमें जीवन के बारे में गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करती है। यह कविता केवल साहित्य नहीं है, बल्कि हमारे जीवन का एक सवाल है जिसका उत्तर हर व्यक्ति को अपने आप से खोजना चाहिए। इसी में हमारे जीवन की सार्थकता और सफलता निहित है।