महिला आरक्षण और परिसीमन पर NDA की चुनौती
संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े संवैधानिक संशोधन बिल को लेकर राजनीतिक खींचतान का सिलसिला जारी है। इस साल अप्रैल में जब यह बिल विशेष सत्र में पेश किया गया था तो उसमें बहुत ही नाटकीय घटनाएं देखने को मिलीं। बिल के पक्ष में 298 वोट पड़े थे जबकि विरोध में 230 वोट पड़े थे। यह संख्या संवैधानिक संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से काफी कम थी। इसी वजह से NDA को एक बड़ी राजनीतिक असफलता का सामना करना पड़ा था।
अब सवाल यह उठता है कि क्या NDA इस बार सफल हो सकेगा? किन-किन राजनीतिक बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है? और इसके लिए क्या-क्या कदम उठाने होंगे? आइए इस संपूर्ण मुद्दे को समझते हैं।
महिला आरक्षण बिल का महत्व और उद्देश्य
महिला आरक्षण बिल भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक कदम माना जाता है। इस बिल का मुख्य उद्देश्य संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाना है। वर्तमान समय में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लोकसभा में मात्र 15 प्रतिशत के आसपास है। यह संख्या एक विकसित लोकतंत्र के लिए बेहद कम है।
इस बिल के तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की कुल सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित की जानी हैं। इसके अलावा स्थानीय निकायों में भी महिलाओं के लिए आरक्षण बढ़ाने की बात कही गई है। यह बिल महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
हालांकि, परिसीमन का प्रावधान इसे और भी जटिल बनाता है। परिसीमन का मतलब है कि जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय करना। इससे कई सीटों की संरचना बदल सकती है। इसी कारण से विभिन्न राजनीतिक दलों में इस मुद्दे पर आंतरिक मतभेद भी देखने को मिल रहे हैं।
अप्रैल की असफलता और वर्तमान राजनीतिक समीकरण
अप्रैल में संसद के विशेष सत्र में यह बिल जब पेश किया गया था तो उसके पहले यह माना जा रहा था कि बिल आसानी से पास हो जाएगा। लेकिन अंतिम समय में कई विरोधी दलों ने अपनी रणनीति बदली। कुछ क्षेत्रीय दलों ने भी NDA का साथ नहीं दिया।
वर्तमान सरकार के पास लोकसभा में बहुत सीमित संख्या में सीटें हैं। सरकार की सहयोगी पार्टियों का समर्थन संदिग्ध है। कई सहयोगी दल इस बिल पर अपनी शर्तें रखे हुए हैं। कुछ दलों को डर है कि परिसीमन से उनकी सीटें कम हो सकती हैं। इसी वजह से वे इस बिल का पूरे मन से समर्थन नहीं कर रहे हैं।
विरोधी दलों की रणनीति भी काफी सुसंगत दिख रही है। वे महिला आरक्षण का विरोध तो नहीं कर रहे हैं, लेकिन परिसीमन के प्रावधान को लेकर गंभीर आपत्तियां उठा रहे हैं। कुछ दलों का कहना है कि परिसीमन के बाद दलितों और अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है।
NDA के लिए आवश्यक रणनीति और संभावित समाधान
NDA को इस बार अपनी रणनीति को पूरी तरह बदलना होगा। सबसे पहली बात यह है कि सरकार को सभी सहयोगी दलों को विश्वास में लेना होगा। उन्हें यह समझाना होगा कि यह बिल लंबे समय में सभी के हित में है।
दूसरा, सरकार को विरोधी दलों से भी बातचीत करनी चाहिए। कुछ मुद्दों पर यदि संशोधन कर दिए जाएं तो विरोधी दलों का समर्थन भी मिल सकता है। उदाहरण के लिए, अगर यह सुनिश्चित किया जाए कि परिसीमन से दलितों और अल्पसंख्यकों के आरक्षण में कोई कमी न आए तो कई दल अपना रुख बदल सकते हैं।
तीसरा, यह बिल धीरे-धीरे पारित करने का विचार भी किया जा सकता है। पहले लोकसभा से पास कराया जाए, फिर राज्यसभा। इस बीच राजनीतिक परिस्थितियां बदल सकती हैं। कुछ दलों को समझाया जा सकता है।
चौथा, जनता को इस बिल के लाभों के बारे में शिक्षित करना चाहिए। महिला आरक्षण कैसे समाज के विकास में मदद करेगा, इस बारे में व्यापक प्रचार-प्रसार होना चाहिए। इससे राजनीतिक दबाव कम हो सकता है।
अंत में, यह कहा जा सकता है कि यह एक जटिल राजनीतिक मामला है। लेकिन महिला आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है जिसके लिए विभिन्न राजनीतिक दलों को एक मंच पर आना चाहिए। भारत के लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी अत्यावश्यक है। उम्मीद है कि आने वाले समय में सरकार सफल हो जाएगी।




