🔴 ब्रेकिंग
मनप्रीत बादल भाजपा उपाध्यक्ष: मालवा राजनीति में बदलाव|मारुति फ्रॉन्क्स 28KM माइलेज, 2 लाख एक्सपोर्ट|वंदे मातरम विवाद: खरगे का जवाब और पूरा सच|हाफिज सईद के गुर्गे का दावा: LeT ने 10 हजार आतंकी भेजे|क्या डियो से ब्रेस्ट कैंसर होता है? जानें सच|विनोद तावड़े की कमबैक स्टोरी: साइडलाइन से यूपी की कमान तक|स्मृति ईरानी की राजनीतिक यात्रा: ड्रामा और ट्विस्ट|Jio Prime 300 रुपये में 1 साल, सभी सवालों के जवाब|बालों पर 25 हजार मासिक खर्च करने वाली महिला की कहानी|पहली इलेक्ट्रिक फेरारी Luce ₹383 करोड़ में बिकी|मनप्रीत बादल भाजपा उपाध्यक्ष: मालवा राजनीति में बदलाव|मारुति फ्रॉन्क्स 28KM माइलेज, 2 लाख एक्सपोर्ट|वंदे मातरम विवाद: खरगे का जवाब और पूरा सच|हाफिज सईद के गुर्गे का दावा: LeT ने 10 हजार आतंकी भेजे|क्या डियो से ब्रेस्ट कैंसर होता है? जानें सच|विनोद तावड़े की कमबैक स्टोरी: साइडलाइन से यूपी की कमान तक|स्मृति ईरानी की राजनीतिक यात्रा: ड्रामा और ट्विस्ट|Jio Prime 300 रुपये में 1 साल, सभी सवालों के जवाब|बालों पर 25 हजार मासिक खर्च करने वाली महिला की कहानी|पहली इलेक्ट्रिक फेरारी Luce ₹383 करोड़ में बिकी|
Wednesday, 19 August 2026
राजनीति

महिला आरक्षण और परिसीमन पर संसद में टकराव

author
Komal
संवाददाता
📅 15 April 2026, 6:30 AM ⏱ 1 मिनट 👁 530 views
महिला आरक्षण और परिसीमन पर संसद में टकराव
📷 aarpaarkhabar.com

नई दिल्ली - भारतीय राजनीति के इतिहास में एक नया मोड़ आने वाला है। महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक को लेकर संसद में तीव्र टकराव की स्थिति बन रही है। सरकार इस कदम को ऐतिहासिक बताते हुए महिलाओं को सशक्त बनाने का दावा कर रही है, जबकि विपक्ष इसके पीछे की नीयत पर सवाल उठा रहा है।

महिला आरक्षण विधेयक क्या है?

महिला आरक्षण विधेयक भारतीय संसद में महिलाओं के लिए सीधे आरक्षण प्रदान करता है। यह विधेयक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं को कुल सीटों का एक तिहाई हिस्सा देने का प्रावधान करता है। सरकार का मानना है कि यह कदम राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ाएगा और उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में सीधा हिस्सा देगा। शीर्ष नेतृत्व का कहना है कि लैंगिक समानता के लिए यह एक महत्वपूर्ण पहल है।

वर्तमान में भारतीय लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व मात्र पंद्रह से बीस प्रतिशत के बीच है। राज्य विधानसभाओं में यह आंकड़ा और भी कम है। इसी असंतुलन को दूर करने के लिए सरकार इस विधेयक को लाई है। महिला संगठन और नारीवादी विचारकों ने इस कदम का स्वागत किया है और कहा है कि यह लंबे समय से चली आ रही मांग है।

परिसीमन विधेयक और विवाद

परिसीमन विधेयक निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित करता है। जनगणना के आधार पर विभिन्न राज्यों में सीटों की संख्या में परिवर्तन किए जाते हैं। विपक्ष का मुख्य सवाल यह है कि महिला आरक्षण के साथ परिसीमन करने से कुछ राज्यों में सीटों की कुल संख्या में कमी आएगी। इससे उनका राजनीतिक प्रभाव घटेगा।

विपक्षी दलों का तर्क है कि सरकार महिला आरक्षण के नाम पर एक राजनीतिक खेल खेल रही है। उनका अनुमान है कि जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटों में कमी आएगी, जहां विपक्षी दलों की मजबूत उपस्थिति है। उत्तर भारतीय राज्यों, जहां सरकार की पकड़ मजबूत है, को अतिरिक्त सीटें मिल सकती हैं। यह संघीय ढांचे के लिए खतरनाक हो सकता है।

संसद में बढ़ता तनाव

संसद में इस विधेयक को लेकर हलचल बढ़ गई है। विभिन्न राजनीतिक दल अपनी-अपनी बातें कह रहे हैं। गठबंधन की समझ में भी तनाव देखा जा रहा है। सत्ता पक्ष के कुछ सहयोगी दल भी अपने क्षेत्रों के प्रभाव में कमी को लेकर चिंतित हैं।

सांसदों के बीच भी इसे लेकर गहरी बहस चल रही है। महिला सांसद इस विधेयक का समर्थन कर रही हैं, लेकिन कुछ पुरानी राजनीति के हिमायती इसका विरोध कर रहे हैं। संसद की कार्यवाहियां तनावपूर्ण हो गई हैं और कई बार कार्यसूची को रोका जाना पड़ा है।

सरकार का दावा है कि यह महिलाओं को सशक्त करने का एक ऐतिहासिक अवसर है। मंत्रियों ने कहा है कि भारत के संविधान में समानता का वादा दिया गया है और महिला आरक्षण उसी का एक अंग है। सरकार यह भी कहती है कि परिसीमन एक तकनीकी प्रक्रिया है जो जनसंख्या के आधार पर स्वचालित रूप से होती है।

विपक्ष का दृष्टिकोण बिल्कुल अलग है। उसका कहना है कि सरकार महिलाओं के मुद्दे को केवल राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। विपक्षी दलों के नेताओं ने कहा है कि परिसीमन के साथ यह विधेयक संघीय संरचना को नुकसान पहुंचाएगा और क्षेत्रीय संतुलन बिगाड़ेगा। उन्होंने मांग की है कि परिसीमन को अलग से किया जाए और महिला आरक्षण के साथ जोड़ा जाए।

भविष्य की दिशा

आने वाले हफ्तों में संसद में इस विधेयक पर जोरदार बहस होने वाली है। सरकार के पास संख्या का बल है, लेकिन सामाजिक सहमति प्राप्त करना उसके लिए चुनौती होगी। क्या यह विधेयक आसानी से पास हो जाएगा या संसद में लंबी लड़ाई होगी, यह देखना अभी बाकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा आने वाली राजनीति को प्रभावित करेगा।