दुनिया का सबसे मोटा शहर: जंक फूड की त्रासदी
दुनिया के नक्शे पर एक छोटा सा द्वीप है जहां की सबसे बड़ी समस्या न तो बेरोजगारी है, न ही गरीबी, बल्कि मोटापा है। ये कहानी है उस जगह की जहां सड़कों पर चलने वाले लोगों की शारीरिक बनावट ही परिचय बन गई है। जहां बचपन से ही बच्चों को जंक फूड की लत लग जाती है और वयस्कता तक पहुंचते-पहुंचते वे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का शिकार हो जाते हैं। ये सिर्फ एक व्यक्तिगत समस्या नहीं रह गई है, बल्कि एक राष्ट्रीय संकट बन गई है।
जब हम दुनिया के सबसे मोटे शहर की बात करते हैं तो असल में हम एक विफल स्वास्थ्य व्यवस्था, गलत खान-पान की आदतें और आर्थिक मजबूरियों का एक जटिल जाल समझते हैं। यह द्वीप शहर जहां के लोग एक समय ताकतवर और फुर्तीले हुआ करते थे, आज उसी शहर के निवासी कदम-कदम पर दम तोड़ रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान आगे बढ़ गया है लेकिन आम जनता की सोच नहीं बदली। सस्ता खाना, तेल-मसाले से भरपूर भोजन और शारीरिक निष्क्रियता ने यहां के जन-जीवन को संकट में डाल दिया है।
जंक फूड की कैद में फंसा एक द्वीप
इस द्वीप की आर्थिक व्यवस्था ऐसी है कि यहां के लोगों के पास स्वास्थ्यकर खाना खरीदने की क्षमता कम है। सस्ता जंक फूड, तली-भुनी चीजें और कोल्ड ड्रिंक्स ही यहां की मुख्य खाद्य संस्कृति बन गई है। बच्चों के लिए माता-पिता के पास समय नहीं होता कि वे घर में पोषक भोजन बनाएं। इसलिए तेल में तले गए, मैदा से भरे खाने की आसान सुविधा लोगों को आकर्षित करती है। एक प्लेट फास्ट फूड सस्ता भी है और खाने में स्वादिष्ट भी, पर उसका दाम चुकाना पड़ता है शरीर को।
विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार यहां की आबादी का साठ प्रतिशत से भी ज्यादा हिस्सा अधिक वजन या मोटापे से ग्रसित है। बच्चों में भी यह समस्या तेजी से बढ़ रही है। जो बचपन में स्वस्थ होना चाहिए, वही किशोरावस्था तक डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और दिल की बीमारियों का शिकार हो जाता है। स्कूल के मैदान में खेलने वाले बच्चों की संख्या घटती जा रही है क्योंकि उन्हें दौड़ना, कूदना, सीढ़ियां चढ़ना मुश्किल हो गया है। यह सब कुछ महज दस-पन्द्रह साल के समय में हुआ है।
बीमारियों की बाढ़ और स्वास्थ्य व्यवस्था का संकट
जब मोटापा बढ़ता है तो उसके साथ और भी कई बीमारियां आती हैं। इस द्वीप के अस्पतालों में हृदय रोग, डायबिटीज, जोड़ों की समस्या और नींद की बीमारी के रोगियों की भीड़ बढ़ गई है। चिकित्सकों के अनुसार हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। सरकारी स्वास्थ्य बजट इस समस्या को संभालने के लिए पर्याप्त नहीं है। अस्पतालों में बेड की कमी है, डॉक्टरों की कमी है और सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों में जागरूकता की कमी है।
एक आम नागरिक का दिन शुरू होता है तेल-मसाले से भरे नाश्ते से, दोपहर का खाना फास्ट फूड होता है और रात को भी वही सब कुछ दोहराया जाता है। व्यायाम करने का समय नहीं, सही खाना खाने का ध्यान नहीं और तनाव तो है ही। इन सब कारणों से शरीर लगातार खराब हो रहा है। सबसे दुखद बात यह है कि लोगों को समझ में नहीं आता कि वे गलत रास्ते पर जा रहे हैं।
क्या सिर्फ इस द्वीप का ही संकट है यह?
नहीं, बिल्कुल नहीं। भारत के बड़े शहर भी इसी समस्या की चपेट में आ रहे हैं। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु जैसे महानगरों में भी मोटापे की दर बढ़ रही है। हर घर में फ्रिज में कोल्ड ड्रिंक्स हैं, हर कोने में पिज्जा की दुकान है और हर बाजार में बर्गर और फ्रेंच फ्राइज बिक रहे हैं। माता-पिता के पास व्यस्त जीवन में बच्चों के साथ खेलने का समय नहीं रहा। स्कूल और ट्यूशन के नाम पर बच्चों को घर में बैठा दिया गया है।
अगर हम आज सचेत नहीं होंगे तो कुछ ही दशकों में भारत भी उसी द्वीप जैसी स्थिति में पहुंच सकता है जहां मोटापा एक महामारी बन जाता है। समय है कि हम अपनी जीवनशैली बदलें, व्यायाम को प्राथमिकता दें और स्वास्थ्यकर खान-पान को अपनाएं। छोटे-छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। सरकार को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य पर ज्यादा ध्यान देना होगा। शिक्षा व्यवस्था में भी स्वास्थ्य जागरूकता को शामिल करना होगा।
अगर हम इस समस्या को नजरअंदाज करते रहे तो आने वाली पीढ़ियों को कीमत चुकानी पड़ेगी। एक स्वस्थ राष्ट्र ही एक मजबूत राष्ट्र होता है। इसलिए आज ही फैसला लीजिए कि आप अपने स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देंगे। छोटे कदमों से शुरुआत करें, रोज सुबह टहलने जाएं, घर का बना खाना खाएं और अपने परिवार को भी इसी रास्ते पर लाएं। क्योंकि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ी संपत्ति है।




