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Wednesday, 19 August 2026
राजनीति

यमुना नदी प्रदूषण: वजीराबाद डैम के बाद ऑक्सीजन संकट

author
Komal
संवाददाता
📅 26 June 2026, 5:30 AM ⏱ 1 मिनट 👁 701 views
यमुना नदी प्रदूषण: वजीराबाद डैम के बाद ऑक्सीजन संकट
📷 aarpaarkhabar.com

नई दिल्ली - दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति (डीपीसीसी) की ताजा रिपोर्ट ने यमुना नदी की भयावह स्थिति को उजागर किया है। सरकार द्वारा नदी के शुद्धीकरण के दावों को झुठलाते हुए यह रिपोर्ट बताती है कि वजीराबाद डैम के बाद नदी का पानी तेजी से प्रदूषित हो जाता है। आईएसबीटी से लेकर ओखला तक आने वाले हिस्से में नदी के पानी में ऑक्सीजन का स्तर लगभग शून्य हो जाता है। यह स्थिति जलीय जीवन के लिए बेहद घातक है और पूरी नदी प्रणाली को मृत बनाता है।

रिपोर्ट के मुताबिक यमुना की समस्या केवल प्रदूषक तत्वों तक सीमित नहीं है। नदी में गिरने वाले विभिन्न नालों और सीवर लाइनों से भी प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। दिल्ली के विभिन्न इलाकों से निकलने वाली गंदी नालियां सीधे यमुना में मिलती हैं, जिससे नदी का जल और अधिक विषाक्त हो जाता है। इन नालों में कार्बनिक और अकार्बनिक दोनों तरह के प्रदूषक मिल जाते हैं।

वजीराबाद डैम के बाद नदी की दुर्दशा

वजीराबाद डैम दिल्ली में यमुना का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है। यहां से ही दिल्ली को पानी की आपूर्ति की जाती है। लेकिन डैम के तुरंत बाद नदी की गुणवत्ता में भारी गिरावट देखी जाती है। डीपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार डैम के बाद यमुना के पानी में डिजॉल्व्ड ऑक्सीजन (डीओ) का स्तर खतरनाक रूप से कम हो जाता है। कहीं-कहीं तो यह शून्य के करीब भी चला जाता है।

ऐसी स्थिति में नदी में कोई भी जलीय जीव जीवित नहीं रह सकता। मछलियां, जलीय पौधे और अन्य जीव-जंतु सभी इस प्रदूषित पानी में मर जाते हैं। नदी पूरी तरह से निर्जीव हो जाती है। वजीराबाद डैम से लेकर ओखला बैराज तक का लगभग 40 किलोमीटर लंबा हिस्सा इस समस्या से ग्रस्त है। इस पूरे खिंचाव में नदी का पानी मृत जल बन जाता है।

डीपीसीसी की जांच में पाया गया है कि बायोकेमिकल ऑक्सीजन डिमांड (बीओडी) और केमिकल ऑक्सीजन डिमांड (सीओडी) दोनों का स्तर अत्यंत ऊंचा है। इसका मतलब यह है कि नदी में कार्बनिक प्रदूषकों की भारी मात्रा मौजूद है। ये प्रदूषक नदी के ऑक्सीजन को तेजी से खत्म करते हैं, जिससे जलीय जीवन के लिए अनुपयुक्त वातावरण बन जाता है।

आईएसबीटी से ओखला तक प्रदूषण का संकट

दिल्ली के आईएसबीटी (इंडिया स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट बस टर्मिनल) से लेकर ओखला बैराज तक यमुना की स्थिति और भी गंभीर है। इस खिंचाव में कई बड़ी नालियां नदी में गिरती हैं। काजीपुर, नजफगढ़, आजादपुर और अन्य नालों से दिल्ली का बड़ा हिस्सा सीवेज लेकर आता है। ये सभी नालियां बिना ट्रीटमेंट के सीधे यमुना में मिलती हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि ओखला बैराज के पास नदी की स्थिति सबसे बदतर है। यहां ऑक्सीजन का स्तर ही नहीं, बल्कि अन्य जहरीले तत्वों का भी स्तर बहुत अधिक है। भारी धातुएं, यूरिया, नाइट्रोजन और फॉस्फोरस की मात्रा इस हिस्से में काफी अधिक पाई जाती है। इन सभी कारणों से नदी पूरी तरह से मृत बन जाती है।

डीपीसीसी ने अपनी रिपोर्ट में कई स्थानों पर नदी के नमूने लिए थे। सभी स्थानों पर प्रदूषण का स्तर सरकार द्वारा निर्धारित मानदंडों से बहुत अधिक पाया गया। कई जगहों पर तो प्रदूषण दो से तीन गुना अधिक देखा गया। यह दिल्ली सरकार और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की विफलता को दर्शाता है।

सरकारी दावों पर प्रश्न चिह्न

दिल्ली सरकार और भारत सरकार दोनों ने यमुना को स्वच्छ करने के बड़े-बड़े दावे किए हैं। सैकड़ों करोड़ रुपये इस परियोजना पर खर्च किए गए हैं। लेकिन डीपीसीसी की रिपोर्ट ये सभी दावे झुठलाती हुई नजर आती है। नदी की प्रकृत स्थिति सरकार के दावों से बिल्कुल भिन्न है।

रिपोर्ट में सलाह दी गई है कि यमुना को स्वच्छ करने के लिए तुरंत व्यावहारिक कदम उठाने होंगे। सभी नालों को ट्रीट करना होगा। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांटों की क्षमता बढ़ानी होगी। औद्योगिक प्रदूषकों को नियंत्रित करना होगा। जब तक इन कदमों को नहीं उठाया जाता, तब तक यमुना कभी भी स्वच्छ नहीं हो सकेगी।

यमुना न केवल दिल्ली के लिए बल्कि पूरे उत्तर भारत के लिए महत्वपूर्ण नदी है। लाखों लोग इस नदी के पानी पर निर्भर हैं। इस नदी की जैव विविधता को बचाना सभी के लिए अत्यावश्यक है। डीपीसीसी की यह रिपोर्ट एक गंभीर चेतावनी है। सरकार को अब अपने दावों को वास्तविकता में बदलना होगा। अन्यथा यमुना पूरी तरह मृत नदी बन जाएगी। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान होगा, बल्कि लाखों मनुष्यों का जीवन भी प्रभावित होगा।