FPI निवेशकों ने 10 दिन में ₹48000 करोड़ निकाले
भारतीय शेयर बाजार में पिछले कुछ दिनों से जो उथल-पुथल मची हुई है, वह निवेशकों के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति बन गई है। एक तरफ तो देश का प्रमुख सूचकांक संसद सूचकांक और निफ्टी में तेजी देखने को मिल रही है, लेकिन दूसरी तरफ विदेशी निवेशक अपने पैसे निकाल रहे हैं। पिछले दस दिनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 48,000 करोड़ रुपये की बिकवाली की है। यह आंकड़ा बेहद अलर्ट करने वाला है और बाजार विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर रहा है कि आखिर ये विदेशी पूंजी कब लौटेगी।
भारतीय शेयर बाजार की यह स्थिति किसी से छिपी नहीं है। कुछ महीने पहले जहां विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार में भारी मात्रा में पैसा लगा रहे थे, वहीं अब वही निवेशक अपने पोर्टफोलियो को कम करने में लगे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया है, बल्कि कई कारणों की वजह से हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी डॉलर की मजबूती, वैश्विक ब्याज दरों में बढ़ोतरी और अन्य अंतरराष्ट्रीय कारकों की वजह से यह स्थिति बन गई है।
FPI निवेश में गिरावट के मुख्य कारण
विदेशी निवेशकों की बिकवाली के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं। सबसे पहला कारण तो यह है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में वृद्धि की है। जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो विदेशी निवेशकों के लिए अपने पैसे को अमेरिकी डॉलर में निवेश करना ज्यादा आकर्षक हो जाता है। भारतीय शेयर बाजार में निवेश करने की तुलना में अमेरिकी बांड में निवेश करना अब ज्यादा फायदेमंद हो गया है।
दूसरा कारण है भारतीय रुपये की कमजोरी। जब रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर होता है, तो विदेशी निवेशकों को अपनी निवेश पर नुकसान का सामना करना पड़ता है। भले ही शेयरों में फायदा हो रहा हो, लेकिन मुद्रा विनिमय दर की वजह से उन्हें कुल मिलाकर नुकसान हो सकता है। इसी वजह से कई निवेशक अपने पैसे निकाल रहे हैं।
तीसरा कारण वैश्विक आर्थिक मंदी का डर है। दुनिया भर में आर्थिक विकास धीमा पड़ रहा है और रिसेशन का खतरा मंडरा रहा है। ऐसी स्थिति में विदेशी निवेशक अपने पोर्टफोलियो को कम जोखिम वाली संपत्तियों में स्थानांतरित कर रहे हैं।
शेयर बाजार में रैली के बावजूद निवेश में गिरावट क्यों?
यह सवाल बिल्कुल सही है कि जब शेयर बाजार में तेजी आ रही है, तो विदेशी निवेशक अपने पैसे निकाल क्यों रहे हैं। इसके पीछे तकनीकी कारण हैं। अक्सर ऐसा होता है कि शॉर्ट टर्म रैली आती है, लेकिन बड़े निवेशकों को लगता है कि यह स्थायी नहीं है। इसलिए वे इस अवसर का फायदा उठाकर अपने शेयरों को बेच देते हैं।
दूसरी बात यह है कि भारतीय शेयर बाजार का मूल्यांकन काफी अधिक हो गया है। जब किसी शेयर की कीमत अधिक हो जाती है, तो निवेशकों को लगता है कि अब और बढ़ोतरी होने की गुंजाइश कम है। ऐसे में वे मुनाफा बुक करके अपने पैसे निकाल लेते हैं।
भविष्य में FPI का रुख कैसा होगा?
यह सवाल हर निवेशक के मन में है कि आखिर ये विदेशी पूंजी कब लौटेगी। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अगर भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी मजबूत वृद्धि दर बनाए रखती है, तो विदेशी निवेशक जरूर लौटेंगे। वर्तमान में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6 से 7 प्रतिशत के बीच है, जो विश्व में सबसे अधिक है।
लेकिन इसके लिए भारतीय सरकार को भी अपनी नीतियों को सही रखना होगा। बुनियादी ढांचे में निवेश करना होगा और शेयर बाजार में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी। अगर भारत ये कर सकता है, तो विदेशी निवेशक निश्चित रूप से लौटेंगे।
अभी के लिए भारतीय निवेशकों को धैर्य रखना चाहिए। शेयर बाजार लंबे समय के निवेश के लिए है, और अल्पकालिक उतार-चढ़ाव आम बात है। घरेलू निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो को लेकर चिंतित नहीं होना चाहिए, बल्कि अच्छी कंपनियों में लगातार निवेश करते रहना चाहिए। समय के साथ, विदेशी निवेशक भी लौटेंगे और भारतीय शेयर बाजार फिर से चमकेगा। यह विश्वास और धैर्य का समय है, न कि घबराहट का।




