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Monday, 14 September 2026
धर्म

वरुथिनी एकादशी व्रत: पूजा विधि और शुभ मुहूर्त

author
Komal
संवाददाता
📅 13 April 2026, 6:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 909 views
वरुथिनी एकादशी व्रत: पूजा विधि और शुभ मुहूर्त
📷 aarpaarkhabar.com

वरुथिनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित एक अत्यंत मंगलकारी और फलदायी व्रत है। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों के सभी कष्ट दूर होते हैं और अक्षय पुण्य मिलता है। वरुथिनी एकादशी चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाई जाती है। इस वर्ष यह व्रत अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसके पीछे कई प्राचीन कथाएं और धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं।

वरुथिनी एकादशी की व्रत कथा बहुत ही प्रेरणादायक है। पुराणों में वर्णित इस कथा के अनुसार, एक समय की बात है जब एक राजा था जो बहुत ही अत्याचारी और दुष्ट स्वभाव का था। उसके राज्य में प्रजा का बहुत दुःख होता था। एक दिन एक महान ऋषि उसके राज्य में आए और राजा को भगवान विष्णु की भक्ति करने की सलाह दी। राजा ने वरुथिनी एकादशी का व्रत रखा और भगवान विष्णु की पूजा की। इस व्रत के प्रभाव से राजा का हृदय परिवर्तित हो गया और वह एक न्यायप्रिय और दयालु राजा बन गया। उसके राज्य में शांति और खुशहाली आ गई।

वरुथिनी एकादशी की पूजा विधि

वरुथिनी एकादशी का व्रत रखने के लिए सबसे पहले दशमी तिथि को संध्या समय में भोजन कर लेना चाहिए। एकादशी की सुबह जल्दी उठकर स्नान कर लें और शुद्ध कपड़े पहनें। घर के पूजा घर को साफ-सुथरा कर लें। भगवान विष्णु की मूर्ति को तुलसी के पत्तों से सजाएं। पूजा के समय भगवान को फूल, गंध, दीप और अगरबत्ती अर्पित करें।

व्रत के दिन भगवान विष्णु को भोग लगाने के लिए फल, दूध और खीर का प्रयोग किया जाता है। कई लोग फलाहार करते हैं तो कई लोग पूरा निर्जल व्रत रखते हैं। व्रत को तोड़ने के लिए एकादशी के अगले दिन यानी द्वादशी को सूर्योदय के समय भोजन किया जाता है। पहले भगवान को भोग लगाया जाता है, फिर उसे प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।

व्रत के दिन सत्य बोलना चाहिए और किसी को कठोर शब्द नहीं कहने चाहिए। व्रत रखने वाले को क्रोध, लोभ और अहंकार से दूर रहना चाहिए। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए व्रत का नियम पालन करना चाहिए। इस दिन पवित्र स्थानों पर जाना अत्यंत शुभ माना जाता है।

शुभ मुहूर्त और व्रत के समय

वरुथिनी एकादशी का व्रत चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी को रखा जाता है। इस वर्ष व्रत का समय बहुत ही शुभ है। व्रत को तोड़ने का सर्वोत्तम समय द्वादशी की सुबह का समय माना जाता है। सूर्योदय के पश्चात और मध्यान्ह से पहले व्रत को तोड़ना सबसे उत्तम माना गया है। यदि कोई किसी कारण से इस समय व्रत नहीं तोड़ सकता है तो संध्या का समय भी ठीक है।

व्रत के दिन पूजा का समय प्रातःकाल का समय सबसे शुभ माना जाता है। सूर्योदय के बाद और दोपहर से पहले पूजा करना सर्वोत्तम फल देता है। हालांकि, यदि किसी को सुबह व्रत नहीं रख सकते हैं तो दोपहर या शाम को भी पूजा की जा सकती है।

वरुथिनी एकादशी का महत्व और लाभ

वरुथिनी एकादशी का धार्मिक महत्व हिंदू धर्म में अत्यंत अधिक है। माना जाता है कि इस दिन किया गया व्रत और पूजा भक्तों को मोक्ष का मार्ग दिखाता है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए यह व्रत सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस व्रत को रखने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं और वह पुनः जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।

व्रत रखने वाले को सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। परिवार में सभी सदस्यों के लिए यह व्रत कल्याणकारी माना जाता है। विवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत पति की लंबी उम्र के लिए किया जाता है। अविवाहित महिलाओं के लिए यह व्रत अच्छे वर की प्राप्ति के लिए माना जाता है।

व्यावहारिक दृष्टि से भी वरुथिनी एकादशी का महत्व है। व्रत रखने से शरीर में विषैले पदार्थ बाहर निकलते हैं और पाचन क्रिया सुधरती है। मन में शांति आती है और मानसिक शक्ति बढ़ती है। व्रत रखने वाले को आत्मविश्वास और संकल्प शक्ति में वृद्धि होती है। इसलिए न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी यह व्रत लाभकारी है।

वरुथिनी एकादशी का व्रत रखकर हम भगवान विष्णु को प्रसन्न करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यह व्रत हमारे जीवन में नई ऊर्जा, सकारात्मकता और सुख लाता है। इसलिए हर व्यक्ति को यथाशक्ति इस व्रत को रखना चाहिए और भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए।