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Friday, 05 June 2026
समाचार

वैशाख अमावस्या 2024: तिथि और शुभ मुहूर्त

author
Komal
संवाददाता
📅 16 April 2026, 7:15 AM ⏱ 1 मिनट 👁 511 views
वैशाख अमावस्या 2024: तिथि और शुभ मुहूर्त
📷 aarpaarkhabar.com

वैशाख अमावस्या को हिंदू धर्म में सबसे महत्वपूर्ण दिनों में से एक माना जाता है। इस पवित्र दिन पर किए गए सभी धार्मिक कार्यों का विशेष महत्व होता है। सनातन धर्म के अनुसार, वैशाख अमावस्या के दिन पितरों को याद किया जाता है और उन्हें जल अर्पित किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए शुभ कार्यों से पितृ प्रसन्न होते हैं और घर में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।

वैशाख मास की अमावस्या को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है क्योंकि इस समय प्रकृति भी अपने पूर्ण विकास में होती है। वसंत ऋतु का अंत और गर्मी की शुरुआत इसी समय होती है। पुराणों में वर्णित है कि इस दिन का संबंध पितृ लोक से विशेष रूप से जुड़ा होता है। इसीलिए हमारे पूर्वज इस दिन को पितृ पूजन के लिए सबसे उपयुक्त दिन मानते थे।

वैशाख अमावस्या की तिथि और समय

इस बार वैशाख अमावस्या 8 मई 2024 को मनाई जाएगी। इस दिन अमावस्या की तिथि सुबह लगभग 5 बजकर 30 मिनट से शुरू होगी। अमावस्या की तिथि 9 मई 2024 को दोपहर लगभी 2 बजकर 40 मिनट तक रहेगी। इसलिए अधिकांश धार्मिक कार्य 8 मई को ही किए जाएंगे।

इस दिन चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है, जिससे चंद्रमा दिखाई नहीं देता। ज्योतिष के अनुसार अमावस्या की रात को चंद्रमा की शक्ति पृथ्वी पर सर्वाधिक प्रभाव डालती है। इसी कारण से इस दिन को आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद शुभ माना जाता है।

शुभ मुहूर्त और पूजन समय

वैशाख अमावस्या पर पितृ पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ समय प्रातःकाल है। सूर्योदय के बाद लगभग दो घंटे का समय अमावस्या पूजन के लिए सबसे अनुकूल माना जाता है। इस समय का जल और हवा दोनों ही पवित्र होते हैं।

तिल और जल से तर्पण करने का समय सूर्योदय के एक घंटे बाद से दोपहर 12 बजे तक निर्धारित किया गया है। इस समय यदि कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों को जल अर्पित करता है तो उसका जल सीधे पितृ लोक तक पहुंचता है। पितर तर्पण से पहले घर के सभी लोगों को स्नान कर लेना चाहिए और सफेद वस्त्र धारण करने चाहिए।

धार्मिक महत्व और परंपराएं

हिंदू धर्म में वैशाख अमावस्या का विशेष महत्व है क्योंकि इसी दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटित हुई हैं। कहा जाता है कि वैशाख अमावस्या के दिन महर्षि वाल्मीकि ने रामायण की रचना की थी। साथ ही इसी दिन गुरु नानक देव जी का जन्म हुआ था, जिसे बैसाखी के रूप में मनाया जाता है।

भारतीय संस्कृति में पितृ पूजन का विशेष स्थान है। माना जाता है कि हमारे पितर हमेशा हमारे चारों ओर रहते हैं और हमारी रक्षा करते हैं। जब हम उन्हें जल अर्पित करते हैं और उनके नाम का उच्चारण करते हैं तो वे प्रसन्न होते हैं। प्रसन्न पितर घर में समृद्धि और सुख लाते हैं।

वैशाख अमावस्या पर दान का भी विशेष महत्व है। इस दिन गरीबों को अनाज, कपड़े और धन का दान करने से घर में सुख और शांति आती है। कई लोग इस दिन गंगा या किसी अन्य पवित्र नदी में स्नान करते हैं और पितर पूजन करते हैं।

पूजा के समय घर के आंगन में तुलसी के पौधे के पास पितृ पूजन किया जाता है। पूजा में तिल, चावल, दूध और मिठाई का प्रयोग किया जाता है। कुछ घरों में इस दिन खीर, हलवा और पूरी बनाने की परंपरा भी है। ये खीर और हलवा पहले भगवान को अर्पित करते हैं, फिर परिवार के सभी सदस्य इसे ग्रहण करते हैं।

वैशाख अमावस्या के दिन व्रत रखना भी माना जाता है। कई लोग पूरे दिन फल-दूध का सेवन करते हैं और शाम को पूजा के बाद भोजन करते हैं। यह व्रत मन और आत्मा को शुद्ध करता है। व्रत रखने से व्यक्ति के अंदर धार्मिक भावनाएं जागृत होती हैं और मन में शांति आती है।

आधुनिक समय में हालांकि हम अपनी व्यस्त जीवनशैली के कारण इन परंपराओं को भूल गए हैं, लेकिन वैशाख अमावस्या जैसे पवित्र दिनों पर अपने पितरों को याद करना और उन्हें सम्मान देना हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है। इस दिन यदि कोई व्यक्ति अपने पूर्वजों के लिए कुछ समय निकालता है और उन्हें पूजता है तो न केवल पितर प्रसन्न होते हैं बल्कि परिवार में भी सकारात्मक बदलाव आते हैं।

इसलिए आइए इस वैशाख अमावस्या को अपनी परंपराओं के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते हुए मनाएं और अपने पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करें। यह दिन हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहने और पारिवारिक मूल्यों को समझने का मौका देता है।