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Saturday, 13 June 2026
राजनीति

शशि थरूर ने कहा – मुझे महिला विरोधी नहीं कह सकता

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Komal
संवाददाता
📅 19 April 2026, 6:32 AM ⏱ 1 मिनट 👁 607 views
शशि थरूर ने कहा – मुझे महिला विरोधी नहीं कह सकता
📷 aarpaarkhabar.com

लोकसभा में महिला आरक्षण से संबंधित संविधान संशोधन विधेयक के गिरने के बाद अब एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उन्हें कोई भी महिला विरोधी नहीं कह सकता। थरूर ने यह बात करते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू के साथ अपनी बातचीत का जिक्र किया। इस पूरे मामले ने राजनीतिक हलकों में एक बड़ी चर्चा पैदा कर दी है।

थरूर ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि वह महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिए जाने के पक्ष में हैं। उन्होंने महिला सशक्तिकरण और उनकी राजनीतिक भागीदारी को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। हालांकि, थरूर की चिंता यह रही है कि परिसीमन के मुद्दे को आरक्षण से जोड़ा जा रहा है। उनके अनुसार, इस तरह का दृष्टिकोण पूरे मामले को जटिल बना देता है और इसका सकारात्मक समाधान निकालना मुश्किल हो जाता है।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने थरूर के बयान के साथ सहमति जताई है। इससे स्पष्ट होता है कि इस मुद्दे पर बहुत सारे राजनेताओं के बीच एक आम सहमति है, भले ही सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक मतभेद हों। यह एक सकारात्मक संकेत है कि महिला प्रतिनिधित्व के बारे में अलग-अलग विचारों वाले नेता एक दूसरे को महिला विरोधी नहीं मानते।

विधेयक गिरने के कारण और राजनीतिक प्रतिक्रिया

महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा में बहुमत न मिलने के कारण गिरना पड़ा। यह एक महत्वपूर्ण घटना थी क्योंकि यह विधेयक महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था। इसके गिरने के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी आमने-सामने आ गईं। दोनों दलों ने एक-दूसरे पर तीखे आरोप लगाने शुरू कर दिए।

कांग्रेस ने भाजपा पर यह आरोप लगाया कि वह महिलाओं के अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध नहीं है। इसके विपरीत, भाजपा ने कांग्रेस को महिला विरोधी नीतियों का पालन करने का आरोप लगाया। यह राजनीतिक तनातनी एक महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे पर पार्टी लाइन के अनुसार लड़े जाने वाले संघर्ष को दर्शाती है। हालांकि, थरूर के हाल के बयान ने इसी संघर्ष में एक नया आयाम जोड़ा है।

विधेयक के गिरने के बाद सरकारी पक्ष और विपक्ष दोनों ने अपने-अपने स्टेटमेंट जारी किए हैं। सरकार का मानना है कि महिलाओं के लिए आरक्षण एक अच्छी नीति है, लेकिन इसे संवैधानिक तरीके से सही ढंग से लागू करने की जरूरत है। विपक्ष का कहना है कि सरकार महिलाओं के अधिकारों को लेकर गंभीर नहीं है।

परिसीमन और आरक्षण का मुद्दा

थरूर की मुख्य चिंता परिसीमन और आरक्षण के बीच के संबंध को लेकर है। परिसीमन एक प्रक्रिया है जिसमें निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से तय किया जाता है। यह एक संवेदनशील मुद्दा है क्योंकि यह विभिन्न राजनीतिक दलों के हितों को प्रभावित करता है। जब महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ा जाता है, तो यह पूरे विधेयक को राजनीतिक रूप से जटिल बना देता है।

थरूर के अनुसार, महिलाओं के आरक्षण को एक अलग मुद्दे के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि इसे परिसीमन के साथ जोड़ा जाता है, तो संभव है कि कुछ पार्टियां अपने राजनीतिक हितों को बचाने के लिए इसका विरोध कर सकती हैं। यह एक तार्किक और व्यावहारिक दृष्टिकोण है जो विधेयक को पारित करने की संभावनाओं को बढ़ा सकता है।

भारत के राजनीतिक इतिहास में परिसीमन को लेकर हमेशा विवाद रहा है। विभिन्न राजनीतिक दलों के स्वार्थ परिसीमन से जुड़े होते हैं। इसलिए, जब महिला आरक्षण को इस मुद्दे से अलग किया जाता है, तो विधेयक को पारित करने की संभावना अधिक होती है।

राजनीतिक सहमति की दिशा में कदम

थरूर और रिजिजू के बीच की बातचीत एक सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि महिला प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच एक सर्वसम्मति बनाई जा सकती है। जब अलग-अलग विचारधारा वाले नेता एक-दूसरे को महिला विरोधी नहीं मानते, तो इससे संवादात्मक माहौल का निर्माण होता है।

भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी एक महत्वपूर्ण सामाजिक लक्ष्य है। वर्तमान में, भारतीय संसद में महिलाओं की संख्या काफी कम है। महिला आरक्षण विधेयक इसी समस्या का समाधान करने के लिए लाया गया था। यदि सभी पार्टियां इस मुद्दे पर सहमत हो जाएं, तो यह विधेयक आसानी से पारित हो सकता है।

थरूर के बयान से यह साफ है कि विपक्ष भी महिला सशक्तिकरण को लेकर गंभीर है। वह केवल यह चाहते हैं कि इस मुद्दे को सही तरीके से और सभी संवैधानिक मानदंडों का पालन करते हुए आगे बढ़ाया जाए। यह एक जिम्मेदारीपूर्ण दृष्टिकोण है जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुदृढ़ करता है।

आने वाले दिनों में, हम उम्मीद कर सकते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक को लेकर और अधिक सकारात्मक बातचीत होगी। यदि राजनीतिक दलों के बीच एक आम सहमति बने, तो यह विधेयक जल्द ही पारित हो सकता है। यह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण कदम होगा और महिलाओं के सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा।