पाकिस्तानी ड्रामा में धुरंधर जैसी कहानी, खराब एक्टिंग
पाकिस्तानी ड्रामा सीरीज 'जहन्नुम बरास्ता जन्नत' का एक दृश्य इन दिनों सोशल मीडिया पर जबरदस्त वायरल हो रहा है। इस सीन में पाकिस्तानी निर्माताओं ने बॉलीवुड की मशहूर फिल्म धुरंधर जैसी कहानी दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन यह प्रयास बिल्कुल विफल साबित हुआ। भारतीय दर्शकों और सोशल मीडिया यूजर्स को इस ड्रामा सीरीज की एक्टिंग, संवाद और निर्देशन किसी भी लिहाज से पसंद नहीं आया। इस विफल प्रयास के बाद अब लोग इसी नाम से ट्रोल्स और मजेदार कमेंट्स कर रहे हैं।
धुरंधर फिल्म को अगर देखा जाए तो यह शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन की एक शानदार फिल्म थी जो 1998 में रिलीज हुई थी। इस फिल्म में एक चोर और पुलिस वाले की कहानी थी जो बेहद प्रभावशाली तरीके से दिखाई गई थी। फिल्म की कहानी, एक्टिंग और निर्देशन सभी कुछ शानदार था। अब जब पाकिस्तानी ड्रामा सीरीज में इसी जैसी कहानी दिखाने की कोशिश की गई, तो दर्शकों को बिल्कुल अलग ही अनुभव हुआ।
सोशल मीडिया पर हुई तीव्र आलोचना
जहन्नुम बरास्ता जन्नत की इस एपिसोड को जब सोशल मीडिया पर शेयर किया गया, तो लोगों की प्रतिक्रिया तुरंत आने लगी। ट्विटर, इंस्टाग्राम, फेसबुक और टिकटॉक सभी जगह इसी ड्रामा के बारे में चर्चा होने लगी। भारतीय यूजर्स ने न केवल एक्टिंग की आलोचना की बल्कि कहानी के निर्माण, संवादों और पूरे सीन की प्रस्तुति पर भी सवाल उठाए।
लोगों ने कहा कि धुरंधर जैसी किसी बेहतरीन फिल्म को अगर किसी ड्रामा में दिखाना है तो उसे बिल्कुल सही तरीके से किया जाना चाहिए। लेकिन इस ड्रामा में न तो एक्टर्स की एक्टिंग ही ठीक दिखी और न ही संवाद। कई यूजर्स ने तो यह भी कहा कि अगर यह कहानी बॉलीवुड में बनाई जाती तो कितनी शानदार होती। पाकिस्तानी टीवी उद्योग को लेकर भी कई नकारात्मक टिप्पणियां मिलीं।
एक्टर्स की एक्टिंग में कमी
इस ड्रामा में जो एक्टर्स काम कर रहे थे, उनकी एक्टिंग में काफी कमी देखने को मिली। धुरंधर फिल्म में शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन ने जो गहराई और सूक्ष्मता के साथ अपने किरदार को निभाया था, वह इस ड्रामा में बिल्कुल नजर नहीं आया। एक्टर्स को लग रहा था कि वे सिर्फ संवाद बोल रहे हैं, किरदार को जी नहीं रहे हैं।
दर्शकों को लगा कि एक्टर्स को अपने रोल के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं। धुरंधर में जो भावनाओं की गहराई थी, वह इस ड्रामा में पूरी तरह गायब थी। यहां तक कि कई बार तो एक्टर्स के चेहरे के भाव भी सही नहीं दिख रहे थे। यह सब देखकर दर्शकों को बहुत निराशा हुई कि किसी उत्कृष्ट फिल्म की कहानी को कैसे बर्बाद किया जा सकता है।
संवाद और निर्देशन में कमजोरी
इस सीन के संवाद (डायलॉग्स) भी काफी कमजोर थे। धुरंधर में जो तीक्ष्ण और बुद्धिमान संवाद थे, उनमें एक अलग ही मजा था। लेकिन इस ड्रामा में संवाद बिल्कुल सीधे-सादे थे। न तो उनमें कोई क्लेवरनेस थी और न ही कोई गहरा अर्थ। लगता था कि संवाद लिखने वाले ने मूल फिल्म को ठीक से नहीं समझा था।
निर्देशन की भी काफी आलोचना हुई। इस सीन को शूट करने के तरीके, कैमरा एंगल्स और एडिटिंग सभी कुछ सामान्य स्तर की थी। धुरंधर की जो दृश्य प्रस्तुति थी, उसमें एक विशेष शैली थी जो इस ड्रामा में बिल्कुल नहीं दिख रही थी। यह साफ जाहिर हो गया कि निर्माताओं ने किसी महान कृति को दोहराने के लिए पर्याप्त मेहनत नहीं की थी।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह एक विफल प्रयास था। किसी प्रसिद्ध और सफल कृति से प्रेरणा लेना गलत नहीं है, लेकिन उसे ठीक से एक्सीक्यूट करना बेहद जरूरी है। पाकिस्तानी निर्माताओं को इस गलती से सीखना चाहिए और भविष्य में अपने अपने मूल विचारों पर ध्यान देना चाहिए। सोशल मीडिया पर यह ड्रामा एक मजेदार विषय बन गया है और लोग इसे लेकर लगातार मजाक बना रहे हैं।




