बंगाल चुनाव में SIR मुद्दा कितना असरदार हो सकता है
बिहार की चुनावी लड़ाई में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव ने जिस तरह का रणनीतिक खेल खेला, उसमें SIR का मुद्दा सबसे अहम माना जा रहा था। लेकिन जमीनी हकीकत ने साफ दिखा दिया कि सिर्फ सवर्णों के खिलाफ राजनीतिक रोष पैदा करना काफी नहीं है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या यही रणनीति बंगाल में अलग परिणाम ला सकती है या फिर वहां भी यह मुद्दा ठंडा पड़ जाएगा।
बिहार के चुनावों में जो हुआ उसे समझना बेहद जरूरी है क्योंकि इसी से बंगाल की राजनीति के भविष्य का अंदाजा लगाया जा सकता है। राजद और कांग्रेस ने सामाजिक न्याय और आरक्षण के मुद्दों को लेकर काफी जोर-शोर से प्रचार किया था। तेजस्वी यादव ने तो खुद को इसी मुद्दे की आड़ में ब्राह्मणवाद विरोधी नेता के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की। लेकिन मतदाताओं ने इस रणनीति को सवर्णों के खिलाफ एक विभाजनकारी कदम माना। परिणाम यह निकला कि RJD की सीटें 90 से घटकर महज 30 रह गईं।
बिहार में SIR मुद्दे की विफलता के कारण
बिहार के चुनाव नतीजे बताते हैं कि भारतीय मतदाता केवल विभाजनकारी राजनीति से ऊपर नहीं उठे हैं, बल्कि वह इस तरह की नकारात्मक राजनीति के विरुद्ध हो गए हैं। जब कोई पार्टी किसी खास समुदाय के खिलाफ नफरत का प्रचार करती है तो आम जनता इसे पकड़ लेती है। राहुल गांधी की कांग्रेस जिस तरह से सवर्णों को निशाना बना रही थी, उससे ऐसा लग रहा था कि वह देश को और भी विभाजित करना चाहती हैं। यह दृष्टिकोण आधुनिक भारत में लोकप्रिय नहीं रहा।
दूसरी बात यह है कि बिहार जैसे राज्य में जहां सामाजिक न्याय की लंबी परंपरा रही है, वहां पुरानी और पुनरावृत्ति होने वाली रणनीति काम नहीं करती। मंडल कमीशन के दिनों से ही आरक्षण का मुद्दा बिहार की राजनीति का हिस्सा रहा है। इसलिए जब कोई इसे फिर से उजागर करता है तो लोगों को लगता है कि यह कोई नई बात नहीं है। बल्कि, अगर इसे पुरानी विभाजनकारी भाषा में प्रस्तुत किया जाए तो यह और भी कम प्रभावी साबित होता है।
बंगाल में SIR मुद्दे की संभावनाएं और सीमाएं
अब सवाल यह है कि बंगाल में क्या यह मुद्दा अलग परिणाम दे सकता है। बंगाल की राजनीति बिहार से काफी अलग है। यहां की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत पूरी तरह भिन्न है। बंगाल में बुद्धिजीवियों का प्रभाव हमेशा से बहुत रहा है। यहां की जनता राजनीतिक मुद्दों को बिहार की तुलना में अधिक गहराई से विश्लेषण करती है। इसलिए सिर्फ भावनात्मक अपील से बंगाल में काम नहीं चलेगा।
बंगाल में वर्ण-आधारित राजनीति हमेशा से एक जटिल विषय रहा है। यहां की राजनीति जाति और वर्ण के सवालों से कहीं अधिक बहुआयामी है। बंगाल में साम्यवादी आंदोलन का गहरा प्रभाव रहा है और इसने सामाजिक न्याय को एक वर्ग-आधारित दृष्टिकोण से देखा है, वर्ण-आधारित दृष्टिकोण से नहीं। इसलिए जब राहुल गांधी या अन्य कोई नेता बंगाल में SIR के मुद्दे को लेकर आएंगे तो स्थानीय राजनीति के साथ उसका तालमेल बिठाना होगा।
बंगाल के मतदाताओं की शिक्षा दर भारत में सबसे अधिक है। यहां की जनता विकास और रोजगार के मुद्दों को ज्यादा तरजीह देती है। अगर कोई पार्टी केवल सामाजिक विभाजन के मुद्दों पर जोर देगी तो बंगाल की जनता उसे नकार देगी। इसलिए कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों को SIR के मुद्दे को व्यापक विकास एजेंडे के साथ जोड़ना होगा।
भविष्य की राजनीतिक रणनीति
बिहार के चुनावों से जो सीख मिली है, वह यह है कि भारतीय मतदाता अब केवल भावनाओं पर निर्णय नहीं ले रहे हैं। वह तार्किक और व्यावहारिक मुद्दों को देखते हैं। राहुल गांधी को बंगाल में अपनी रणनीति को पूरी तरह बदलना होगा। SIR का मुद्दा अकेले काम नहीं आएगा। इसे आर्थिक सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार जैसे मुद्दों के साथ जोड़ना होगा।
बंगाल में जो भी दल सफल होना चाहता है, उसे समझना होगा कि यहां की जनता न तो विभाजन चाहती है और न ही पुरानी राजनीति। यहां की जनता चाहती है ऐसे नेताओं को जो विकास के नए आयाम खोल सकें। इसलिए SIR का मुद्दा अगर बंगाल में सकारात्मक सामाजिक परिवर्तन के साथ प्रस्तुत किया जाए तो शायद कुछ असर पड़ सकता है, अन्यथा यह एक और विफल रणनीति साबित होगी।
निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि बंगाल में SIR का मुद्दा तभी काम आ सकता है जब उसे एक व्यापक और सकारात्मक एजेंडे का हिस्सा बनाया जाए। अकेले विभाजनकारी राजनीति से न तो बिहार में काम आया और न ही बंगाल में आएगी। भारतीय राजनीति में अब समय आ गया है कि नेता समावेशी दृष्टिकोण अपनाएं।




