मुंबई के पास गांवों में जल संकट की भयावह स्थिति
मुंबई के निकटवर्ती पालघर जिले के आदिवासी बहुल इलाकों में जल संकट की स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि स्थानीय निवासियों को जानवरों के साथ साझा किए जाने वाले पानी पर निर्भर रहना पड़ रहा है। यह दृश्य भारत के तेजी से विकसित होते महानगर मुंबई के बिल्कुल पास स्थित गांवों का हकीकत है, जहां आधुनिकता की चमक के बीच लाखों लोग कल का पानी भी सुरक्षित नहीं हैं।
कातकरी पाड़ों और अन्य आदिवासी बस्तियों में रहने वाले परिवार अपनी दैनंदिन जरूरतों के लिए गंदे डबकों और तालाबों पर निर्भर हैं। ये वही पानी के स्रोत हैं जहां पशुधन भी पानी पीता है और जहां जानवरों का मल-मूत्र भी मिलता है। ऐसे में स्वच्छता और स्वास्थ्य की बात करना तो दूर, लोग सिर्फ प्यास बुझाने के लिए इसी जल का उपयोग करने को मजबूर हैं। इस गंभीर स्थिति के बावजूद सरकारी योजनाएं कागजों में ही सीमित रह गई हैं।
जल जीवन मिशन की असफलता
भारत सरकार ने जल जीवन मिशन के तहत हर घर तक साफ पानी पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया था। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के अंतर्गत पालघर जिले में भी पाइपलाइनें बिछाई गई हैं और नल लगाए गए हैं। लेकिन जब इन नलों को खोला जाता है तो पानी निकलता ही नहीं या फिर गंदा पानी बहता है। स्थानीय प्रशासन का कहना है कि बोरवेल में पानी ही नहीं है, लेकिन यह जवाब गांववासियों के लिए कोई मायने नहीं रखता। उन्हें तो सिर्फ पानी चाहिए, चाहे वह कहीं से आए।
आधिकारिक दस्तावेजों में यह दिखता है कि अरबों रुपये इस परियोजना पर खर्च किए गए हैं। कई ठेकेदारों ने अपने अनुबंध पूरे किए हैं और सरकार ने भुगतान भी किया है। लेकिन जमीनी हकीकत पूरी तरह से अलग है। पाइपलाइनें तो लगी हुई हैं पर उनमें पानी नहीं बह रहा। यह एक बड़ा सवाल है कि जल जीवन मिशन जैसी योजना कागजों पर तो सफल दिखती है लेकिन गांवों में इसका कोई प्रभाव दिखाई नहीं देता।
आदिवासी समुदाय की पीड़ा
कातकरी आदिवासी समुदाय सदियों से इसी अंचल में रहता आया है। पहाड़ी इलाकों में इनकी बस्तियां हैं जहां पानी की व्यवस्था कभी भी सुविधाजनक नहीं रही। लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह समस्या और भी गंभीर हो गई है। बोरवेलों को अत्यधिक गहराई तक खोदना पड़ता है और यह काम बेहद महंगा है। छोटे गांवों के लिए यह आर्थिक रूप से संभव नहीं है।
महिलाएं प्रतिदिन घंटों तक पानी की खोज में इधर-उधर भटकती हैं। बच्चों को स्कूल भेजने से पहले पानी जुटाना पड़ता है। गर्मी के मौसम में तो यह समस्या विकराल हो जाती है। पानी की कमी के कारण स्वच्छता बनाए रखना लगभग असंभव हो जाता है और बीमारियां बढ़ने लगती हैं। दस्त, पेचिश और संक्रामक रोग बच्चों को अपनी चपेट में ले लेते हैं।
सरकारी उदासीनता और सामाजिक दायित्व
यह विडंबना है कि मुंबई जैसे महानगर के इतने पास के गांवों में पानी की इतनी कमी है। मुंबई में जहां लोग पानी की बर्बादी करते हैं, वहीं पालघर के गांवों में लोग जानवरों का बचा हुआ पानी पीते हैं। यह असमानता प्रशासन की उदासीनता को दर्शाती है। जिला प्रशासन, स्थानीय निकाय और जल आपूर्ति विभाग को इस गंभीर समस्या पर तत्काल ध्यान देना चाहिए।
सरकार को चाहिए कि वह सर्वे करे कि आखिर क्यों बोरवेलों में पानी नहीं है। क्या भूजल स्तर गहरा हो गया है? क्या खनन गतिविधियों ने जल स्रोतों को प्रभावित किया है? क्या जलवायु परिवर्तन इसका कारण है? इन सभी सवालों के जवाब खोजने होंगे और फिर तदनुसार समाधान निकालने होंगे।
स्थानीय स्तर पर जल संचयन और वर्षा जल संग्रहण की परियोजनाएं शुरू की जानी चाहिए। तालाबों और कुओं की मरम्मत की जानी चाहिए। पेड़ों का रोपण किया जाना चाहिए ताकि वर्षा बढ़े और भूजल स्तर ऊपर आए।
यह केवल एक जिले की समस्या नहीं है। भारत के कई हिस्सों में यही हाल है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जल एक मौलिक अधिकार है और हर व्यक्ति को स्वच्छ पानी पाने का हक है। पालघर के इन गांवों के लोग इस अधिकार से वंचित हैं और यह किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं है। सरकार और समाज दोनों को इस दिशा में गंभीर प्रयास करने होंगे।




