अमेरिका-ईरान बातचीत अटकी, दो मुद्दों पर गतिरोध
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु समझौते की बातचीत एक बार फिर से गंभीर संकट का सामना कर रही है। दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत में अभी भी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति नहीं बन पाई है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर अमेरिका शुरुआती चरण में ही उसकी फ्रीज संपत्तियों का कुछ हिस्सा रिलीज नहीं करता, तो अंतिम समझौते की संभावना खत्म हो सकती है। यह विवाद ईरान और अमेरिका के बीच तनाव को और भी गहरा कर सकता है।
हाल के महीनों में दोनों देश परमाणु समझौते पर नई बातचीत के लिए एक दूसरे के करीब आए थे। लेकिन अब स्पष्ट हो गया है कि दोनों देशों की मांगें एक दूसरे के विपरीत हैं। ईरान का मानना है कि अगर वह आत्मसमर्पण करके अपने परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण स्वीकार करे, तो अमेरिका को पहले ही कुछ रियायतें देनी चाहिए। इसके बदले में ईरान अपनी परमाणु गतिविधियों पर अंतरराष्ट्रीय निगरानी को स्वीकार करने के लिए तैयार है।
फ्रीज संपत्तियों को लेकर विवाद
ईरान की फ्रीज संपत्तियां इस बातचीत का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई हैं। अमेरिका ने साल 2016 में ईरान के विरुद्ध कठोर प्रतिबंध लगाए थे, जिससे ईरान की विदेशी संपत्तियां बंद हो गईं। इसके फलस्वरूप ईरान की अरबों डॉलर की संपत्ति विभिन्न बैंकों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों में फ्रीज हो गई। अब ईरान चाहता है कि अमेरिका इन संपत्तियों को रिलीज करे ताकि वह अपनी अर्थव्यवस्था को पुनः स्थापित कर सके।
इस मामले में अमेरिका की स्थिति अलग है। अमेरिका का कहना है कि ईरान को पहले अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से नियंत्रित करना होगा। उसके बाद ही धीरे-धीरे प्रतिबंधों को हटाया जा सकता है। अमेरिका यह नहीं मानता कि पहले ही संपत्तियों को रिलीज किया जाए। इसी कारण से बातचीत में गतिरोध बना हुआ है। ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा है कि अगर अमेरिका इस शर्त को स्वीकार नहीं करता, तो ईरान समझौते से पीछे हट सकता है।
अंतरराष्ट्रीय निगरानी की शर्त
दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा अंतरराष्ट्रीय परमाणु एजेंसी की निगरानी से संबंधित है। अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी को ईरान के सभी परमाणु स्थलों पर पूरी पहुंच दी जाए। यह निगरानी कम से कम दस साल तक जारी रहनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि ईरान परमाणु हथियार नहीं बना रहा है।
हालांकि, ईरान इस शर्त पर आपत्ति जता रहा है। ईरान का कहना है कि इतनी लंबी निगरानी अवधि उसकी संप्रभुता का उल्लंघन है। ईरान चाहता है कि यह अवधि पांच साल होनी चाहिए। साथ ही, ईरान कुछ सैन्य स्थलों पर निगरानी की अनुमति नहीं देना चाहता। यह मुद्दा भी दोनों पक्षों के बीच एक प्रमुख विवाद बना हुआ है।
समझौते की भविष्य की संभावना
वर्तमान स्थिति में ऐसा लगता है कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता होना मुश्किल हो गया है। दोनों पक्ष अपनी मूल मांगों से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। यदि यह गतिरोध जारी रहा, तो यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों में और भी तनाव ला सकता है।
अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि इस समस्या को हल करने के लिए दोनों देशों को एक-दूसरे की बातें सुननी होगी। यूरोपीय संघ के मध्यस्थों ने कहा है कि वे दोनों पक्षों को एक समझौते पर पहुंचने में मदद कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए दोनों पक्षों को अपनी कठोर मांगों में कुछ लचीलापन दिखाना होगा।
ईरान की आर्थिक स्थिति भी काफी खराब है। प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। लोगों की क्रय क्षमता कम हो गई है और बेरोजगारी बढ़ गई है। इसी कारण से ईरान समझौते के लिए जल्दबाजी में है। लेकिन अमेरिका की अपनी शर्तें हैं जिन्हें वह पूरा करना चाहता है।
आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि दोनों देश इस गतिरोध से कैसे बाहर निकलते हैं। अगर समझौता नहीं हुआ, तो इसका असर पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र पर पड़ सकता है। समझौता होने से न केवल ईरान बल्कि पूरे विश्व को लाभ होगा क्योंकि इससे क्षेत्रीय शांति में वृद्धि होगी।




