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Thursday, 28 May 2026
अपराध

ओडिशा: अब्दुर रहमान आतंकवाद मामले में बरी

author
Komal
संवाददाता
📅 27 May 2026, 5:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 948 views
ओडिशा: अब्दुर रहमान आतंकवाद मामले में बरी
📷 aarpaarkhabar.com

ओडिशा के कटक की एक अदालत ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इसी फैसले में साल 2015 में आतंकवाद के आरोपों में गिरफ्तार किए गए अब्दुर रहमान को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया गया है। यह फैसला आने के बाद जहां अब्दुर रहमान के परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई है, वहीं यह मामला भारतीय न्यायिक व्यवस्था में एक बहुत महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि प्रस्तुत किए गए सबूत अब्दुर रहमान को दोषी साबित करने के लिए बिल्कुल पर्याप्त नहीं हैं।

अदालत के फैसले में कहा गया है कि अब्दुर रहमान पर लगाए गए आरोपों में से कोई भी आरोप सिद्ध नहीं किया जा सका है। इन आरोपों में अलकायदा की विंग ईएसआईएस से संबंध रखना, कट्टरपंथ फैलाने की कोशिश करना और देश के खिलाफ षड्यंत्र रचना जैसे गंभीर आरोप शामिल थे। लेकिन जांच एजेंसियों ने जो सबूत अदालत में पेश किए थे, वे बिल्कुल अपर्याप्त और कमजोर साबित हुए। इसी कारण अदालत को अब्दुर रहमान को बरी करने का फैसला लेना पड़ा।

2015 में आतंकवाद के आरोपों में हुई गिरफ्तारी

अब्दुर रहमान को साल 2015 में आतंकवाद से संबंधित मामले में गिरफ्तार किया गया था। इस समय भारत के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद की गतिविधियों को लेकर सतर्कता बहुत ज्यादा थी। राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी को यकीन था कि अब्दुर रहमान ईएसआईएस से जुड़े हुए हैं और वह कट्टरपंथ फैलाने का काम कर रहे हैं। इसी आशंका के आधार पर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। आतंकवाद निरोधक कानून के तहत उनके खिलाफ केस दर्ज किया गया था।

गिरफ्तारी के बाद अब्दुर रहमान को कटक की अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें बरी न करने का फैसला लेते हुए उन्हें 11 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के लिए तैयार कर दिया। इन 11 सालों में अब्दुर रहमान और उनका परिवार काफी कष्ट झेलते रहे। उन्हें कई सार्वजनिक अपमान का सामना भी करना पड़ा। लेकिन अब आखिरकार अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है।

आरोपों में क्या क्या शामिल था

अब्दुर रहमान पर जो आरोप लगाए गए थे, वे बेहद गंभीर थे। पहला आरोप यह था कि वह अलकायदा की विंग यानी ईएसआईएस से सीधे संबंध रखते हैं। दूसरा आरोप यह था कि वह भारत में कट्टरपंथ फैलाने की कोशिश कर रहे थे। तीसरा आरोप यह लगाया गया था कि अब्दुर रहमान राष्ट्रीय सुरक्षा के खिलाफ षड्यंत्र में शामिल थे। चौथा और सबसे गंभीर आरोप यह था कि वह भारत के खिलाफ विद्रोह की योजना बना रहे थे।

जांच एजेंसियों ने दावा किया था कि उन्हें अब्दुर रहमान के फोन रिकॉर्ड और कुछ डिजिटल सबूत मिले हैं जो उनके आतंकवादी संगठनों से संबंध को साबित करते हैं। हालांकि, अदालत को ये सबूत बिल्कुल भी पर्याप्त नहीं लगे। अदालत ने अपने फैसले में कहा है कि इस तरह के आरोपों को साबित करने के लिए बहुत ठोस और मजबूत सबूत होने की जरूरत होती है। जांच एजेंसियां इसमें असफल रहीं।

11 साल की लंबी न्यायिक प्रक्रिया और अब अंत

अब्दुर रहमान के खिलाफ मुकदमा चलते हुए पूरे 11 साल हो गए हैं। इन 11 सालों में अदालत की कई सुनवाई हुई हैं। जांच एजेंसियों ने अपने पक्ष में कई सबूत पेश करने का प्रयास किया। अब्दुर रहमान के वकीलों ने भी इन सबूतों का खंडन करते हुए कहा कि ये सबूत बिल्कुल विश्वसनीय नहीं हैं। इसी बीच कई सुनवाई तारीख तय हुईं और फिर स्थगित भी हुईं।

लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद आखिरकार अदालत ने बुधवार को अपना फैसला सुना दिया। अदालत ने कहा कि जांच एजेंसियों ने जो सबूत पेश किए हैं, वे अब्दुर रहमान को दोषी साबित करने के लिए बिल्कुल ही अपर्याप्त हैं। इसलिए उन्हें आतंकवाद निरोधक कानून के सभी आरोपों से बरी किया जा रहा है। यह फैसला अब्दुर रहमान के लिए बेहद राहत भरा साबित हुआ है।

अब्दुर रहमान के बरी किए जाने का यह फैसला भारतीय न्यायिक प्रणाली की एक महत्वपूर्ण घटना है। इससे यह साफ होता है कि भारत की अदालतें किसी भी आरोप को बिना ठोस सबूतों के साबित नहीं करतीं। अदालतें व्यक्तिगत आजादी और संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की रक्षा करती हैं। हालांकि, यह भी सच है कि 11 साल का समय अब्दुर रहमान के जीवन से छीन लिया गया है। लेकिन कम से कम अब उन्हें न्याय मिल गया है।

इस मामले से भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भी एक संदेश मिलता है। आतंकवाद जैसे गंभीर आरोपों में बिना पर्याप्त सबूतों के किसी को गिरफ्तार नहीं करना चाहिए। हर आरोप को साबित करने के लिए ठोस और विश्वसनीय सबूत होने चाहिए। अन्यथा निर्दोष लोगों को लंबी कानूनी कार्यवाहियों का सामना करना पड़ता है, जिससे उनके जीवन में व्यापक व्यवधान पड़ता है।