दिल्ली आग त्रासदी: एम्स में सिसकियां और उम्मीद
दिल्ली की एक भयानक आग त्रासदी ने शहर के सबसे बड़े अस्पताल एम्स में जो दर्दनाक नजारे पेश किए, उन्हें शब्दों में बयां करना किसी के लिए भी आसान नहीं है। यहां आने वाले हर परिवार का अपना एक दर्द था, अपनी एक कहानी थी। कोई बेटे को ढूंढ़ रहा था, तो कोई पति की खबर पाने के लिए बेचैन था। किसी को पिता की जानकारी नहीं मिल रही थी। एक युवक बार-बार अपने भाई की तस्वीर दिखाकर पूछ रहा था कि भैया मिल गए क्या? यह दृश्य एम्स के गलियारों में रात भर गूंजती रहीं सिसकियों का साक्षी बन गया।
आग की यह विभीषिका जब सामने आई, तो दिल्ली के हर घर में खौफ और बेचैनी का माहौल पसर गया। लोग अपने अपने प्रियजनों के बारे में जानने के लिए अस्पताल पहुंचने लगे। एम्स के आपातकालीन विभाग में भीड़ उमड़ पड़ी। माता-पिता अपने बच्चों को खोज रहे थे, दोस्त अपने साथियों का हाल पूछ रहे थे, और पत्नियां अपने पतियों का इंतजार कर रही थीं।
एम्स में गूंजती सिसकियों की व्यथा
एम्स अस्पताल के आपातकालीन वार्ड में जो दृश्य बना था, वह किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल तोड़ देने के लिए काफी था। यहां आने वाले लोगों के चेहरे पर बस एक सवाल था - क्या मेरा प्रियजन बच गया? एक महिला अपने बेटे की तस्वीर दिखाती और रोती जा रही थी। उसका गला भर्रा गया था, लेकिन वह बस पूछती जा रही थी कि क्या कोई उसके बेटे को देखा है। एक बुजुर्ग पिता अस्पताल के कोने में बैठा अपने बेटे के नाम की पुकार लगा रहा था, जैसे कि आवाज उसके बेटे तक पहुंच जाएगी।
अस्पताल के स्टाफ कर्मचारियों के पास भी कोई सही जवाब नहीं था। जानकारी बिखरी हुई थी। कुछ लोगों को अस्पताल के विभिन्न वार्डों में रखा गया था, तो कुछ की खबरें अभी तक ठीक से नहीं मिल पाई थीं। हर बार जब कोई डॉक्टर आता था, तो सभी की सांसें रुक जाती थीं, लेकिन बुरी खबर के बाद फिर से सन्नाटा पसर जाता था। उस सन्नाटे में सिर्फ सिसकियां रह जाती थीं।
एक परिवार की महिला अपने पति के लिए बेताब थी। उसे बताया गया था कि उसका पति अस्पताल में है, पर यह नहीं बताया गया कि उसकी हालत कितनी गंभीर है। घंटों तक इंतजार करने के बाद जब वह अपने पति से मिलीं, तो दोनों के बीच का मिलना ही सब कुछ बता गया। आंसू, गले लगना, और फिर सवाल - यह सब कुछ कैसे हुआ?
रात भर उम्मीद की रोती हुई लड़ाई
रात को एम्स के बाहर जो दृश्य था, वह शहर के इस दर्द को और गहरा करता था। परिवार के लोग अस्पताल के बाहर बैठे हुए थे, कभी अंदर जा रहे थे, कभी बाहर आ जा रहे थे। किसी को नहीं पता था कि आगे क्या होने वाला है। उम्मीद और निराशा दोनों का मिश्रण हर किसी के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।
एक युवा लड़की अपने भाई की खोज में पूरी रात जागती रही। उसने अपने भाई की फोटो सभी को दिखाई, सभी से पूछा, पर हर बार नकारात्मक जवाब मिला। सुबह होते-होते उसके आंसू सूख गए थे, पर उम्मीद नहीं टूटी थी। वह अभी भी मानना चाहती थी कि उसका भाई कहीं सुरक्षित होगा। यह उम्मीद ही थी जो उसे और उसके परिवार को टूटने से बचा रही थी।
अस्पताल के कैंटीन में आधी रात को भी परिवार के लोग बैठे हुए थे। कोई चाय पी रहा था, कोई सिर्फ बैठा हुआ था। सब कुछ मौन था। पर यह मौन किसी शांति का नहीं था, यह था हर किसी के दिल के बोझ का। हर एक को अपने प्रियजन की चिंता था। हर एक अपने ही सोच में खोया हुआ था।
सन्नाटे में डूबती आशा की यादें
जब खबर आई कि किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई, तो अस्पताल में एक खास तरह का सन्नाटा पसर जाता था। यह सन्नाटा पहले तो बहुत तेज सिसकियों से टूटता था, फिर धीरे-धीरे उसी सन्नाटे में सब डूब जाते थे। हर एक को लगता था कि शायद अगली बार बुरी खबर उसके परिवार के लिए आए। यह डर हर माता-पिता के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था।
एक माता ने अपने बेटे की याद में चुप रहकर जो दर्द व्यक्त किया, वह किसी भी लिखी हुई पंक्ति से अधिक प्रभावशाली था। उसकी आंखें सब कुछ कह रही थीं - एक माता का दर्द, एक पत्नी की विधवापन, एक परिवार की टूटन।
दिल्ली की इस आग त्रासदी ने शहर को झकझोर कर रख दिया है। एम्स अस्पताल में जो सिसकियां गूंजी हैं, उन्हें शहर कभी नहीं भूल सकता। हर बुरी खबर के बाद आने वाला सन्नाटा, हर परिवार की टूटन, और हर उम्मीद की रात - यह सब कुछ दिल्ली के दर्द की गवाही है। ऐसी विभीषिका से बचने के लिए हमें अपने सुरक्षा उपायों को और भी मजबूत बनाना होगा। क्योंकि जब तक हम यह सुनिश्चित नहीं करते कि ऐसी घटनाएं दोबारा न हों, तब तक शहर के हर परिवार के दिल में यह खौफ बना रहेगा।




