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Saturday, 03 October 2026
विश्व

मोहनजोदड़ो की डांसिंग गर्ल को NCERT ने कपड़े पहनाए

author
Komal
संवाददाता
📅 15 June 2026, 9:16 AM ⏱ 1 मिनट 👁 578 views
मोहनजोदड़ो की डांसिंग गर्ल को NCERT ने कपड़े पहनाए
📷 aarpaarkhabar.com

एनसीईआरटी की कक्षा नौ की नई कला शिक्षा पुस्तक 'मधुरिमा' में सिंधु घाटी सभ्यता की सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण मूर्ति 'डांसिंग गर्ल' को लेकर एक विवादास्पद फैसला सामने आया है। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने इस प्राचीन कांस्य मूर्ति के नग्न धड़ को ढंककर एक संशोधित संस्करण प्रकाशित किया है। यह कदम देश भर के इतिहासकारों, कला विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के बीच तीव्र आलोचना का विषय बन गया है।

मोहनजोदड़ो की डांसिंग गर्ल मूर्ति भारतीय पुरातत्व और कला का एक अमूल्य खजाना है। यह लगभग पचास सौ साल पुरानी है और सिंधु घाटी सभ्यता की उन्नत कला और संस्कृति का प्रमाण है। यह मूर्ति पाकिस्तान के मोहनजोदड़ो पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुई थी और वर्तमान में पाकिस्तान के राष्ट्रीय संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है। इसकी मूल तस्वीर दशकों से भारतीय इतिहास की पुस्तकों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती आई है।

NCERT की नई पुस्तक और विवादास्पद निर्णय

एनसीईआरटी ने कक्षा नौ के लिए जारी की गई नई कला शिक्षा पुस्तक 'मधुरिमा' में डांसिंग गर्ल की मूर्ति की एक संशोधित तस्वीर प्रकाशित की है। इस संशोधन में मूर्ति के धड़ के नग्न हिस्से को डिजिटली ढंका गया है, जिससे मूर्ति का मूल रूप बिल्कुल बदल गया है। यह पहली बार है जब इस प्राचीन कलाकृति के साथ ऐसा किया जा रहा है। पहले की सभी पुस्तकों, पाठ्यक्रमों और शैक्षणिक संसाधनों में मूर्ति की मूल और अपरिवर्तित तस्वीर ही प्रस्तुत की जाती थी।

यह निर्णय तुरंत विवाद का केंद्र बन गया। कई विद्वानों का मानना है कि यह सेंसरशिप की एक स्पष्ट मिसाल है। इतिहासकारों ने कहा है कि प्राचीन कला को उसके मूल रूप में प्रस्तुत करना बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे ही हम अपनी सभ्यता और संस्कृति को समझ सकते हैं। शरीर की नग्नता को छिपाना या बदलना इतिहास की विकृति है और यह शिक्षा के उद्देश्य के विरुद्ध है।

इतिहासकारों और विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया

इस निर्णय के विरुद्ध देश के प्रमुख इतिहासकारों और कला विशेषज्ञों ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कला इतिहास विभाग के प्रोफेसरों ने इसे एक गंभीर निर्णय कहा है जो पुरातात्विक शिक्षा में खतरनाक मिसाल स्थापित करता है। उनका कहना है कि इस तरह की प्रवृत्ति से भविष्य में अन्य महत्वपूर्ण कलाकृतियों के साथ भी हस्तक्षेप किया जा सकता है।

कई शिक्षकों ने भी इस कदम की आलोचना की है। उन्होंने कहा है कि छात्रों को प्राचीन कला को उसके मूल संदर्भ में समझना चाहिए। इसे संशोधित करने से शिक्षार्थियों को गलत संदेश मिलता है और वे प्राचीन सभ्यता की वास्तविकता को नहीं समझ पाते। साथ ही, यह आधुनिक मूल्यों को अतीत पर लागू करने का एक उदाहरण है, जो ऐतिहासिक अध्ययन के सिद्धांतों के विरुद्ध है।

सांस्कृतिक और शैक्षणिक महत्व

मोहनजोदड़ो की डांसिंग गर्ल मूर्ति सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में हमें कई महत्वपूर्ण बातें बताती है। यह बताती है कि उस समय की समाज में नृत्य कला का महत्व था, महिलाओं की सामाजिक स्थिति क्या थी, और सौंदर्य के प्रति लोगों की समझ कैसी थी। मूर्ति की शारीरिक संरचना से ही हमें इस सभ्यता की मानवविज्ञानीय जानकारी मिलती है।

जब हम इस मूर्ति को संशोधित करते हैं, तो हम न केवल कला को बदलते हैं, बल्कि इतिहास से भी समझौता करते हैं। एनसीईआरटी जैसी संस्था को यह जिम्मेदारी है कि वह प्राचीन कला को उसके मूल रूप में प्रस्तुत करे। शिक्षा का उद्देश्य सत्य को समझना और जानना है, न कि उसे छिपाना।

इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि क्या हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में सेंसरशिप की ओर बढ़ रहे हैं। यह मामला दर्शाता है कि कैसे आधुनिक विचार और परंपरागत मूल्यों के बीच टकराव तब पैदा होता है जब हम प्राचीन कला और संस्कृति को आधुनिक नैतिकता के अनुसार संशोधित करने का प्रयास करते हैं। एनसीईआरटी को इस बारे में पुनर्विचार करना चाहिए और पुस्तक के अगले संस्करण में मूल तस्वीर को बहाल करना चाहिए।