रील्स की लत से उजड़ रहे घर परवरिश या एल्गोरिथम
इटली में एक बारह साल की नन्ही बच्ची की मौत ने दुनिया भर में सोशल मीडिया की लत को लेकर एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। इस घटना के बाद बच्ची की मां ने सीधे मेटा और टिकटॉक पर आरोप लगाया है कि इन कंपनियों के एल्गोरिथम बच्चों को इस तरह एडिक्टिव बनाते हैं कि वे अपने जीवन को ही खतरे में डाल देते हैं। यह एक ऐसा सवाल है जो आज हर घर में गूंज रहा है।
आजकल की दुनिया में घर के किसी कोने में बैठा कोई न कोई सदस्य अपने मोबाइल फोन में खोया हुआ दिख जाता है। बड़े हों या छोटे, सब रील्स देख रहे हैं, शॉर्ट विडियो में अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। माता-पिता चिंतित हैं, स्कूल में पढ़ाई का स्तर गिर रहा है, परिवारों में बातचीत कम हो गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ परवरिश में खोट है या इसके पीछे एक बड़ा डिजिटल षड्यंत्र है?
सोशल मीडिया एल्गोरिथम का खेल
मेटा, गूगल, टिकटॉक और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के पास दुनिया के सबसे होशियार इंजीनियर और साइकोलॉजिस्ट काम करते हैं। उनका एकमात्र काम है आपको स्क्रीन के सामने ज्यादा से ज्यादा समय रखना। ये एल्गोरिथम इतने सूक्ष्म तरीके से काम करते हैं कि आपको पता ही नहीं चलता कि आप कब घंटों स्क्रीन के सामने बैठ गए। रील्स के बाद एक नई रील, फिर दूसरी, फिर तीसरी। यह अंतहीन लूप है जो मानवीय मनोविज्ञान को समझकर बनाया गया है।
जब आप किसी रील को देर तक देखते हैं, तो एल्गोरिथम समझ जाता है कि आपको क्या पसंद है। फिर वह आपको वैसी ही कंटेंट बार-बार दिखाता है। यह एक एडिक्शन साइकिल है। विशेषज्ञ बताते हैं कि जब आप किसी नई चीज को देखते हैं तो आपके दिमाग में डोपामाइन नाम का रसायन निकलता है जो खुशी और रोमांच का एहसास कराता है। ये प्लेटफॉर्म इसी बात को समझते हैं और हर बार नई-नई कंटेंट दिखाकर आपको उसी डोपामाइन की भूख बनाए रखते हैं।
यह बात विशेषकर बच्चों के लिए ज्यादा खतरनाक है। बच्चों का दिमाग अभी विकास के चरण में होता है। उनका आत्मनियंत्रण पूरी तरह विकसित नहीं होता। इसलिए वे इन एल्गोरिथम के शिकार आसानी से हो जाते हैं। घंटों बैठे-बैठे रील्स देखते हैं और अपनी पढ़ाई, अपने खेल-कूद, अपने मानसिक और शारीरिक विकास को नजरअंदाज कर देते हैं।
परवरिश और जिम्मेदारी का सवाल
लेकिन क्या सब कुछ एल्गोरिथम की जिम्मेदारी है? परवरिश में माता-पिता की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है? यह सवाल भी बिल्कुल वाजिब है। आजकल माता-पिता अपने बच्चों को शांत रखने के लिए मोबाइल फोन दे देते हैं। बचपन में ही बच्चे को स्मार्टफोन थमा दिया जाता है। कोई स्कूल की फीस का टेंशन है, कोई अपना काम है, कोई अपने काम में व्यस्त है। बच्चे को खेलने के लिए खुली जगह नहीं मिलती, तो फोन ही बचाव हो जाता है।
घरों में बातचीत नहीं रही। पिता के पास समय नहीं कि बैठकर बेटे-बेटी से कुछ बात करें। माता अपना काम निबटाते-निबटाते दिन भर व्यस्त रहती हैं। इस तरह जब बच्चा घर में अकेलापन महसूस करता है, तो सोशल मीडिया उसका साथी बन जाता है। रील्स उसे वह सब कुछ दे देती हैं जो घर में नहीं मिल रहा। मजेदार कंटेंट, दोस्तों की तरह की बातें, किसी की तारीफ के कमेंट, सब कुछ।
समाधान कहां है
तो क्या समाधान यह है कि हम बस मेटा और टिकटॉक को दोष दें? या यह है कि अपने बच्चों की परवरिश ठीक तरीके से करें? शायद दोनों ही जरूरी है। एक तरफ तो सरकार को इन कंपनियों पर नियंत्रण रखना चाहिए, उन्हें ऐसे एल्गोरिथम बनाने के लिए मजबूर करना चाहिए जो बच्चों को नुकसान न पहुंचाएं। दूसरी तरफ माता-पिता को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।
बच्चों को मोबाइल फोन देने से पहले उन्हें समझाना चाहिए कि इसका सही इस्तेमाल क्या है। स्क्रीन टाइम सीमित होना चाहिए। घर में बातचीत का माहौल होना चाहिए। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए। उन्हें बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। स्कूल में भी इस बारे में शिक्षा दी जानी चाहिए कि सोशल मीडिया एडिक्शन कितना खतरनाक है।
इटली की बच्ची की मौत सिर्फ एक घटना नहीं है। यह एक चेतावनी है। यह हमें बताती है कि अगर हम अभी नहीं जागे तो हमारे अपने बच्चे हमसे ही दूर हो जाएंगे। रील्स की लत घरों को तोड़ रही है। परिवारों में दूरी बढ़ रही है। बचपन बर्बाद हो रहा है। सवाल यह है कि हम कब तक यह सब देखते रहेंगे और कब अपनी जिम्मेदारी समझेंगे।




