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Thursday, 20 August 2026
विश्व

उत्तराखंड में जंगल की आग के अलर्ट, सिर्फ 12.5% सही

उत्तराखंड में 4879 जंगल की आग के अलर्ट में सिर्फ 12.5% ही सही पाए गए। बाकी खेतों की आग या गलत सूचना से जुड़े थे। सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल।

author
Komal
संवाददाता
📅 20 August 2026, 7:46 AM ⏱ 1 मिनट 👁 661 views
उत्तराखंड में जंगल की आग के अलर्ट, सिर्फ 12.5% सही
📷 aarpaarkhabar.com

उत्तराखंड में जंगल की आग को नियंत्रित करने के लिए जो आधुनिक प्रणाली लागू की गई है, वह अपनी बुनियादी जिम्मेदारी निभाने में विफल दिख रही है। राज्य में भेजे गए 4879 अलर्ट में से मात्र 12.5 प्रतिशत ही वास्तविक वन आग से जुड़े हुए थे। यह आंकड़ा न केवल चिंताजनक है, बल्कि पूरी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े करता है। आइए समझते हैं कि आखिर ऐसी स्थिति कैसे पैदा हुई और इससे वास्तविक आग पर नियंत्रण में क्या बाधा आ रही है।

वर्तमान स्थिति कितनी गंभीर है

उत्तराखंड के वन विभाग द्वारा संचालित यह अलर्ट प्रणाली सैटेलाइट तकनीक और स्वचालित निगरानी पर आधारित है। लेकिन हकीकत यह है कि 4879 अलर्ट में से केवल 610 अलर्ट ही असली जंगल की आग से संबंधित थे। बाकी 4269 अलर्ट गलत साबित हुए। इसका मतलब यह है कि 87.5 प्रतिशत अलर्ट बिना किसी वास्तविक आग के भेजे गए। पर्यावरण संबंधी संसदीय समिति ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

ये गलत अलर्ट विभिन्न कारणों से आए हैं। कुछ अलर्ट खेतों में आग जलाने से जुड़े थे, जो कृषि के सीजन में एक आम बात है। कुछ अलर्ट नियंत्रित तरीके से आग जलाने से संबंधित थे, जो वन प्रबंधन का हिस्सा है। इसके अलावा कई अलर्ट गैर-वन क्षेत्रों से आए थे, जहां वास्तव में कोई जंगल नहीं है। लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि कई अलर्ट बिल्कुल गलत सूचना पर आधारित थे।

यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब हम जानते हैं कि जंगल की आग से उत्तराखंड को कितना नुकसान हुआ है। पिछले कुछ सालों में राज्य में हजारों हेक्टेयर जंगल जल चुके हैं। हजारों करोड़ रुपये की संपत्ति नष्ट हुई है। इसके अलावा जंगल की आग से वायु प्रदूषण बढ़ता है, जलवायु परिवर्तन को बढ़ावा मिलता है, और वन्यजीवों को विशाल नुकसान होता है।

सिस्टम में खामियां कहां हैं

ऐसी स्थिति पैदा होने के पीछे कई कारण हैं। सबसे पहली समस्या सैटेलाइट तकनीक की सीमाओं से संबंधित है। सैटेलाइट तस्वीरें तापमान में बदलाव को पकड़ते हैं, लेकिन वह हर चीज में अंतर नहीं कर सकते। गर्म धातु, उद्योग की आग, खेतों में आग, और असली जंगल की आग सब सैटेलाइट के लिए समान तरीके से दिखाई देती है। इसलिए कई बार गलत अलर्ट आते हैं।

दूसरी समस्या जमीनी सत्यापन की कमी है। जब कोई अलर्ट आता है, तो उसे तुरंत सत्यापित करने के लिए पर्याप्त कर्मी नहीं होते। वन विभाग के कर्मचारी हमेशा तैनात नहीं होते, खासकर दूर-दराज के इलाकों में। इसलिए अलर्ट का सत्यापन बहुत बाद में होता है, और तब तक सही जानकारी मिल पाना मुश्किल हो जाता है।

तीसरी बड़ी खामी डेटा विश्लेषण में है। सिस्टम को ऐसा डिजाइन किया जाना चाहिए कि वह मौसम, इलाके, और पिछली आग की जानकारी के आधार पर अलर्ट को फिल्टर कर सके। लेकिन वर्तमान सिस्टम ऐसा करने में विफल है। इसलिए हर छोटी-मोटी संदिग्ध चीज के लिए अलर्ट आ जाता है।

असली आग पर नियंत्रण में क्या असर पड़ रहा है

जब इतने सारे गलत अलर्ट आते हैं, तो असली समस्या यह है कि असली आग के अलर्ट में भी ध्यान नहीं दिया जाता। लोग और विभाग गलत अलर्ट से थक जाते हैं। इसे "अलर्ट फेटिग" कहते हैं। जब कोई चीज बार-बार गलत साबित होती है, तो लोग उस पर विश्वास करना बंद कर देते हैं।

नतीजा यह है कि असली जंगल की आग को नोटिस करने में देरी होती है। सेकंड और मिनटों का फर्क जंगल की आग को पूरे इलाके में फैलाने के लिए काफी होता है। इसलिए जब आग को नियंत्रित किया जाता है, तो तब तक वह काफी बड़ी हो चुकी होती है।

दूसरी समस्या संसाधनों की बर्बादी है। जब गलत अलर्ट पर कार्रवाई की जाती है, तो वन विभाग के कर्मचारी, सामान, और सड़ी-गली तकनीक उस पर लगती है। यह सब संसाधन असली आग से निपटने के लिए उपलब्ध नहीं रहते। इस तरह मूल्यवान संसाधनों की बर्बादी होती है।

आगे का रास्ता क्या है

इस समस्या को हल करने के लिए कई कदम उठाने की जरूरत है। पहला, सिस्टम को और भी बेहतर बनाया जाना चाहिए। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग का इस्तेमाल करके गलत अलर्ट को कम किया जा सकता है। दूसरा, जमीनी कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए। तीसरा, सैटेलाइट तकनीक के साथ-साथ ड्रोन और अन्य आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करना चाहिए।

चौथा, स्थानीय समुदायों को भी इस प्रणाली में शामिल किया जाना चाहिए। गांवों के लोग अक्सर आग को तुरंत पकड़ लेते हैं। उन्हें सही प्रशिक्षण और संसाधन दिए जाएं, तो वे बहुत कारगर साबित हो सकते हैं। अंत में, यह जरूरी है कि सभी विभागों के बीच बेहतर समन्वय हो। पुलिस, प्रशासन, और स्थानीय अधिकारियों को वन विभाग के साथ मिलकर काम करना चाहिए।

उत्तराखंड की जंगलों की रक्षा करना सभी की जिम्मेदारी है। अगर सिस्टम विश्वसनीय नहीं है, तो उसे ठीक किया जाना चाहिए। लापरवाही को सहन नहीं किया जा सकता, क्योंकि इसका खामियाजा पूरा समाज और पर्यावरण को भुगतना पड़ता है।