अमेरिका का कर्ज 40 खरब डॉलर: ट्रंप नीति
अमेरिका का कर्ज 40 खरब डॉलर पार। ट्रंप की नीतियां, ईरान युद्ध और टैक्स कटौती कितनी जिम्मेदार? विश्लेषण।
अमेरिका की अर्थव्यवस्था एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। देश का कुल राष्ट्रीय कर्ज अब चालीस खरब डॉलर के आंकड़े को पार कर गया है। यह आंकड़ा दुनिया के किसी भी देश के लिए एक चिंताजनक स्थिति है। अमेरिकी सरकार, संसद और आर्थिक विशेषज्ञ इस मुद्दे को लेकर गंभीर चिंता प्रकट कर रहे हैं। इस विशाल कर्ज के पीछे कई कारण हैं जिनमें ट्रंप प्रशासन की नीतियां, सैन्य खर्च, ईरान युद्ध और विभिन्न टैक्स कटौती शामिल हैं।
राष्ट्रीय कर्ज की समस्या केवल एक दिन की बात नहीं है। यह दशकों की गलत आर्थिक नीतियों का परिणाम है। जब बराक ओबामा राष्ट्रपति बने थे, तब अमेरिका का कर्ज दस खरब डॉलर था। उसके बाद ट्रंप के पहले कार्यकाल में यह कर्ज बीस खरब डॉलर तक पहुंच गया। अब यह चालीस खरब डॉलर हो गया है। इसका मतलब यह है कि हर साल कर्ज में काफी तेजी से वृद्धि हो रही है।
ट्रंप की नीतियों का सीधा असर
ट्रंप प्रशासन ने जब सत्ता संभाली थी, तब उन्होंने कहा था कि वह सरकारी खर्च को कम करेंगे और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएंगे। लेकिन जो नीतियां लागू की गईं, उनका परिणाम बिल्कुल विपरीत निकला। सबसे पहली और महत्वपूर्ण नीति थी टैक्स कटौती। ट्रंप ने कॉर्पोरेट टैक्स को इक्कीस प्रतिशत से घटाकर पंद्रह प्रतिशत कर दिया। इसके अलावा वह व्यक्तिगत आयकर में भी कमी लाए।
सरकार को यह सोचना था कि अगर आयकर कम करेंगे, तो सरकार का राजस्व कम होगा। लेकिन साथ ही साथ खर्च भी कम करना पड़ेगा। ट्रंप प्रशासन ने खर्च कम करने की बजाय सैन्य खर्च को और बढ़ा दिया। अमेरिका की रक्षा बजट पहले ही दुनिया में सबसे अधिक थी, लेकिन इसे और भी बढ़ाया गया। यह फैसला राष्ट्रीय कर्ज को बढ़ाने का सीधा कारण बना।
टैक्स कटौती के पीछे का तर्क यह था कि इससे अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। लेकिन वास्तविकता कुछ और ही रही। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, इन टैक्स कटौतियों से अमीर लोग और बड़ी कंपनियां तो लाभान्वित हुईं, लेकिन आम जनता को इससे कोई विशेष लाभ नहीं मिला। इसके बजाय, सरकार का राजस्व कम हुआ, जिससे कर्ज बढ़ना अनिवार्य हो गया।
ईरान युद्ध और सैन्य खर्च
ईरान के साथ तनाव बढ़ना ट्रंप प्रशासन की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। अमेरिका ने ईरान के साथ परमाणु समझौते से खुद को अलग कर लिया। इसके बाद ईरान के साथ सैन्य टकराव बढ़ने लगे। अमेरिका ने ईरान में अपनी सैन्य उपस्थिति को लगातार बढ़ाया। मध्य पूर्व में सैन्य अभियान चलाने के लिए भारी खर्च किया गया।
ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई भी हुई। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका को इस क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी को और मजबूत करना पड़ा। ड्रोन, विमान, युद्धपोत और सैनिकों के लिए खर्च में भारी इजाफा हुआ। यह सब राष्ट्रीय कर्ज को बढ़ाने का एक प्रमुख कारण बना। अमेरिकी रक्षा विभाग के अनुसार, मध्य पूर्व में अपनी सैन्य उपस्थिति बनाए रखने के लिए प्रतिवर्ष कई अरब डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।
सामान्य तौर पर, अमेरिका विश्व के कुल सैन्य खर्च का लगभग तीस से पैंतीस प्रतिशत खर्च करता है। यह किसी भी अन्य देश से कहीं अधिक है। रूस और चीन भी अपने सैन्य बजट को बढ़ा रहे हैं, जिससे अमेरिका को भी अपना रक्षा बजट बढ़ाना पड़ रहा है। यह एक दुष्चक्र है जो राष्ट्रीय कर्ज को निरंतर बढ़ा रहा है।
भविष्य की चुनौतियां और संभावनाएं
अब सवाल उठता है कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था इस बढ़ते कर्ज के साथ कैसे चल सकती है? सबसे पहली बात यह है कि अमेरिका के पास एक मजबूत अर्थव्यवस्था है और वह अपने कर्ज को सेवा करने में सक्षम है। अमेरिकी डॉलर विश्व की सबसे महत्वपूर्ण मुद्रा है। विश्व भर के निवेशक अमेरिकी सरकारी बांड में निवेश करते हैं।
हालांकि, चिंता की बात यह है कि अगर कर्ज बढ़ता रहा, तो ब्याज दरें भी बढ़ेंगी। जब सरकार को कर्ज पर अधिक ब्याज देना पड़ेगा, तो सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए कम पैसा बचेगा। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी ढांचे में निवेश कम होगा। इसका असर आम अमेरिकी नागरिकों पर पड़ेगा।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अमेरिका को अपने राजस्व को बढ़ाना होगा और खर्च को नियंत्रित करना होगा। टैक्स कटौती को पुनर्विचार करने की जरूरत है। सैन्य खर्च में विवेकपूर्ण कटौती की जरूरत है। साथ ही, आर्थिक विकास दर को बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए। जब आर्थिक विकास अच्छा होता है, तो सरकार के राजस्व में भी वृद्धि होती है।
वर्तमान समय में अमेरिकी नेतृत्व को इस समस्या की गंभीरता को समझना होगा। राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर एक दीर्घकालीन आर्थिक रणनीति तैयार करनी होगी। अगर यह नहीं किया गया, तो न केवल अमेरिका, बल्कि पूरी विश्व अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। अमेरिका का स्थिरीकरण विश्व की आर्थिक स्थिरीकरण के लिए आवश्यक है।




