अमेरिका के चहेते पाकिस्तानी जनरलों का दुखद अंत
अमेरिका के चहेते पाकिस्तानी जनरलों का दुखद अंत: इतिहास से सबक
डोनाल्ड ट्रंप की आंखों का तारा बने हुए पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर आजकल चर्चा में हैं। अमेरिका-ईरान संघर्ष के दौरान ट्रंप की मदद करने के बाद से मुनीर को वाशिंगटन में खासा सम्मान मिल रहा है। लेकिन पाकिस्तान के भीतर इस दोस्ती को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रिया है। एक तबका खुश है, तो दूसरी ओर कई जानकार सहमे हुए नजर आते हैं।
इसकी वजह साफ है - पाकिस्तान के इतिहास में अमेरिका के 'फेवरेट' बने जनरलों का अंजाम कोई खुशगवार नहीं रहा है। अयूब खान से लेकर परवेज मुशर्रफ तक, जितने भी पाकिस्तानी सेना प्रमुखों ने अमेरिकी इशारे पर चलने की कोशिश की, उनका अंत दुखद ही हुआ है।

फील्ड मार्शल अयूब खान: अमेरिकी प्रेम की शुरुआत
पाकिस्तान के पहले सैन्य तानाशाह फील्ड मार्शल अयूब खान (1958-1969) अमेरिकी समर्थन के सहारे सत्ता में आए थे। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका को सोवियत संघ के खिलाफ एक मजबूत सहयोगी की जरूरत थी, और अयूब खान इस भूमिका के लिए एकदम सही थे।
1960 के दशक में अयूब खान अमेरिकी प्रशासन के सबसे करीबी एशियाई नेताओं में से एक थे। अमेरिका से भारी मात्रा में सैन्य और आर्थिक सहायता मिली। पाकिस्तान SEATO और CENTO जैसे अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधनों का सदस्य बना।
लेकिन 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में जब पाकिस्तान को अमेरिकी समर्थन नहीं मिला, तो अयूब खान की स्थिति कमजोर हो गई। 1969 में व्यापक जनांदोलन के बाद उन्हें सत्ता छोड़नी पड़ी। अपने जीवन के अंतिम वर्ष वह बीमारी और अवसाद में बिताते रहे।
जनरल जिया-उल-हक: अफगान युद्ध का हीरो और त्रासद अंत
जनरल जिया-उल-हक (1977-1988) का नाम अमेरिकी-पाकिस्तानी सहयोग के स्वर्णिम काल के रूप में याद किया जाता है। 1979 में जब सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर कब्जा किया, तो जिया अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बन गए।
अमेरिका ने पाकिस्तान को अरबों डॉलर की सैन्य और आर्थिक सहायता दी। CIA और ISI मिलकर अफगान मुजाहिदीन को ट्रेनिंग और हथियार देते रहे। जिया को वाशिंगटन में बेहद सम्मान मिलता था।
लेकिन 17 अगस्त 1988 को एक रहस्यमय विमान दुर्घटना में जिया-उल-हक की मौत हो गई। इस हादसे में अमेरिकी राजदूत अर्नोल्ड राफेल भी मारे गए। आज तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि यह दुर्घटना थी या कोई साजिश।
जनरल परवेज मुशर्रफ: 9/11 के बाद का सबसे करीबी सहयोगी
1999 में सत्ता में आए जनरल परवेज मुशर्रफ 9/11 के बाद अमेरिका के सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बन गए। 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' में पाकिस्तान की भूमिका के लिए वाशिंगटन ने मुशर्रफ को बेहद सराहा।
अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना को पाकिस्तानी रसद सहायता मिली। अल-कायदा के कई शीर्ष नेता पाकिस्तान में पकड़े गए। बदले में अमेरिका से अरबों डॉलर की सहायता आई।
| अमेरिकी सहयोगी जनरल | शासनकाल | मुख्य सहयोग क्षेत्र | अंजाम |
| ---------------------- | ---------- | ------------------- | -------- | |
|---|---|---|---|---|
| अयूब खान | 1958-1969 | शीत युद्ध, SEATO/CENTO | जनांदोलन से पतन | |
| जिया-उल-हक | 1977-1988 | अफगान युद्ध | विमान दुर्घटना में मौत | |
| मुशर्रफ | 1999-2008 | आतंकवाद विरोधी युद्ध | निर्वासन में मौत |
लेकिन 2007-2008 तक आते-आते मुशर्रफ की स्थिति कमजोर हो गई। घरेलू विरोध बढ़ता गया और 2008 में उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। बाद के वर्षों में उन पर कई मुकदमे चले और 2023 में दुबई में निर्वासन की स्थिति में उनकी मौत हो गई।
आसिम मुनीर के लिए इतिहास का सबक
अब जब फील्ड मार्शल आसिम मुनीर अमेरिकी प्रशासन के करीब आ रहे हैं, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि वह अपने पूर्ववर्तियों से क्या सबक लेते हैं। अमेरिका-ईरान संघर्ष में ट्रंप की मदद करने के बाद उनकी साख वाशिंगटन में बढ़ी है।
लेकिन पाकिस्तानी जनता और राजनीतिक हलकों में अमेरिकी नीतियों के प्रति बढ़ते अविश्वास को देखते हुए मुनीर को सावधानी बरतनी होगी। इमरान खान की गिरफ्तारी और PTI के दमन को लेकर पहले से ही सेना की छवि खराब हुई है।
भविष्य की चुनौतियां
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अमेरिकी हितों और अपने राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन कैसे बनाए। चीन के साथ बढ़ती नजदीकी और CPEC जैसी परियोजनाओं के कारण अमेरिकी नीति-निर्माताओं में पाकिस्तान को लेकर संदेह बढ़ा है।
दूसरी ओर, आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय सहायता की सख्त जरूरत है। IMF से लेकर विश्व बैंक तक, सभी संस्थानों पर अमेरिकी प्रभाव को देखते हुए वाशिंगटन के साथ अच्छे रिश्ते जरूरी हैं।
लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि केवल अमेरिकी समर्थन पर निर्भर रहने वाले पाकिस्तानी नेताओं का अंत अच्छा नहीं हुआ है। आसिम मुनीर के लिए यह एक महत्वपूर्ण सबक है कि वह घरेलू जनमत और राष्ट्रीय हितों को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
अंततः पाकिस्तान की स्थिरता इस बात में है कि उसके नेता विदेशी दबावों और घरेलू जरूरतों के बीच संतुलन बनाकर चलें। अमेरिकी समर्थन जरूर मददगार है, लेकिन यह कोई गारंटी नहीं है कि यह हमेशा बना रहेगा। इतिहास इसका गवाह है।




