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Thursday, 05 November 2026
समाचार

अरावली पहाड़ी में आग: इंद्री गांव की सुरक्षा

author
Komal
संवाददाता
📅 25 April 2026, 6:00 AM ⏱ 1 मिनट 👁 600 views
अरावली पहाड़ी में आग: इंद्री गांव की सुरक्षा
📷 aarpaarkhabar.com

हरियाणा के नूंह जिले में स्थित इंद्री गांव के पास अरावली की पहाड़ियों में लगी आग ने एक बार फिर से प्रशासनिक व्यवस्था की कमजोरियों को सामने ला दिया है। तीन दिनों तक सुलगती रहने वाली इस आग को नियंत्रित करने के लिए ग्रामीणों को ही अपने हाथों में मोटरसाइकिलों से पानी पहुंचाकर काम करना पड़ा। यह घटना एक बार फिर से यह सवाल खड़े करती है कि आखिर हमारी व्यवस्था इतनी निष्क्रिय क्यों रह जाती है जब ऐसी आपातकालीन स्थितियां पैदा हो जाती हैं।

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, बडेलाकी गांव की ओर से आने वाली अरावली की पहाड़ी में तीन दिनों से आग सुलग रही थी। शुरुआत में यह आग धीमी गति से फैल रही थी, लेकिन गर्मी और हवा के कारण यह धीरे-धीरे तेज होने लगी। बृहस्पतिवार की रात को जब स्थिति बिगड़ने लगी, तो ग्रामीणों को ही इस आग को नियंत्रित करने का काम संभालना पड़ा। उन्होंने अपनी मोटरसाइकिलों का उपयोग करके पहाड़ पर पानी पहुंचाया और कई घंटों की मेहनत के बाद इसे शांत करने में कामयाब रहे।

लेकिन शुक्रवार की दोपहर को यह आग एकदम से भड़क गई। जिस तरह से अचानक से आग फिर से लपलपाने लगी, उससे लगता है कि आग पूरी तरह से बुझी नहीं थी। कुछ स्थानों पर अभी भी कोयले जैसी गर्मी बनी हुई थी, जो अनुकूल परिस्थितियों में फिर से भड़कने लगी। यह घटना इस बात का संकेत देती है कि ऐसी आपातकालीन परिस्थितियों को संभालने के लिए पेशेवर दलों की कितनी जरूरत है।

प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम की नींद

सबसे अहम बात यह है कि इन तीनों दिनों में न तो कोई सरकारी एजेंसी सक्रिय दिखी और न ही कोई आधिकारिक कार्रवाई की गई। वन विभाग, अग्निशमन सेवा, या किसी भी आपातकालीन सेवा की ओर से कोई पहल नहीं देखी गई। यदि ग्रामीणों ने स्वयं अपनी पहल न की होती, तो यह आग पूरे इलाके को निगल सकती थी। इंद्री गांव के निकट कई घर, पशुधन और कृषि भूमि इसी पहाड़ के पास स्थित हैं। अगर आग यहां तक पहुंच गई होती, तो हजारों लोगों की जानमाल को खतरा पैदा हो सकता था।

यह सवाल बहुत महत्वपूर्ण है कि आखिर क्या कारण है कि हमारे प्रशासनिक तंत्र ऐसी घटनाओं के प्रति इतने निष्क्रिय हैं। क्या वन विभाग के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं? क्या निगरानी की प्रणाली अपर्याप्त है? या फिर कोई और कारण है? ये सभी सवाल बिल्कुल जायज हैं।

जलवायु परिवर्तन और गर्मी की मार

गर्मी के इस मौसम में अरावली की पहाड़ियों में आग लगना कोई नई घटना नहीं है। हर साल इसी समय ऐसी घटनाएं देखने को मिलती हैं। सूखी घास, पत्तियां और लकड़ी का ढेर इन आग को तेजी से फैलाने में मदद करते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी अधिक हो गई है, जिससे ऐसी आग लगने का खतरा भी बढ़ गया है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार इस गंभीर समस्या का कोई स्थायी समाधान ढूंढ़ रही है? क्या पहाड़ियों की सफाई की कोई योजना है? क्या नियमित निगरानी के लिए कोई व्यवस्था की गई है? अगर ये सब सुनिश्चित किया जाता, तो ऐसी घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता था।

स्थानीय समुदाय की बहादुरी और चेतावनी

इस पूरी घटना में सबसे सकारात्मक पहलू यह रहा कि इंद्री के ग्रामीणों ने अपनी जान की परवाह किए बिना पहाड़ पर चढ़कर आग से लड़ाई की। उन्होंने मोटरसाइकिलों से पानी ढोकर आग को बुझाने का प्रयास किया। यह उनकी सामाजिक जिम्मेदारी और अपने क्षेत्र को बचाने की भावना को दर्शाता है। ऐसी परिस्थितियों में आम लोगों को पेशेदार दलों का समर्थन मिलना चाहिए था, लेकिन उन्हें अकेले ही संघर्ष करना पड़ा।

यह घटना एक गंभीर चेतावनी है कि हमें अपनी आपातकालीन व्यवस्थाओं को मजबूत करना होगा। वन विभाग को अधिक सक्रिय होना होगा। आग लगने की रोकथाम के लिए नियमित निगरानी और रखरखाव करना होगा। साथ ही, स्थानीय लोगों को भी आग से निपटने के प्रशिक्षण दिए जाने चाहिए।

इंद्री गांव की इस घटना से यह स्पष्ट हो गया है कि सिस्टम जब सो जाता है, तो आम जनता को ही सब कुछ संभालना पड़ता है। लेकिन यह तरीका न तो सुरक्षित है और न ही दीर्घकालीन समाधान है। हमें एक बेहतर, अधिक जिम्मेदार और सक्रिय प्रशासनिक व्यवस्था की आवश्यकता है जो ऐसी घटनाओं को रोकने में सक्षम हो।