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Saturday, 04 July 2026
समाचार

भोजपुर एनकाउंटर: भरत तिवारी के पिता की SP तबादले की मांग

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Komal
संवाददाता
📅 30 June 2026, 6:31 AM ⏱ 1 मिनट 👁 694 views
भोजपुर एनकाउंटर: भरत तिवारी के पिता की SP तबादले की मांग
📷 aarpaarkhabar.com

भोजपुर जिले में हुए एक विवादास्पद एनकाउंटर को लेकर अब तक का सबसे बड़ा विरोध सामने आया है। भरत तिवारी के पिता काशीनाथ तिवारी ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि जब तक स्थानीय एसपी राज को स्थानांतरित नहीं किया जाता, तब तक इस मामले की कोई भी जांच निष्पक्ष नहीं हो सकती है। यह बयान पीड़ित परिवार के आक्रोश और निराशा को दर्शाता है जो पिछले कई महीनों से न्याय के लिए संघर्ष कर रहा है।

काशीनाथ तिवारी का यह आरोप केवल मौखिक नहीं है बल्कि उनके पास कई कारण हैं जो इसे सार्थक बनाते हैं। उनके अनुसार, एसपी राज के नेतृत्व में पूरी पुलिस मशीनरी पहले से ही इस मामले को एक सामान्य एनकाउंटर के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास कर रही है। जब तक जिला प्रशासन के शीर्ष पर वही अधिकारी बैठे हैं जो संभवतः इस घटना में संलिप्त हो सकते हैं, तब तक गवाहों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता और साक्ष्य को भी सही ढंग से संरक्षित नहीं किया जा सकता।

एसपी राज के तबादले की मांग क्यों आवश्यक है

भरत तिवारी की मृत्यु को लेकर पहले से ही कई सवाल उठाए जा रहे हैं। परिवार का दावा है कि उसके बेटे को पुलिस द्वारा गैरकानूनी रूप से हिरासत में लिया गया था और फिर झूठी एनकाउंटर की कहानी बनाई गई थी। स्थानीय समुदाय के लोगों की गवाहियां भी इसी ओर इशारा करती हैं कि घटनास्थल पर कोई आपस में संघर्ष नहीं हुआ था बल्कि सीधे गोलीबारी की गई थी।

एसपी राज जब तक इस जिले में रहेंगे, तब तक उन्हें सभी स्थानीय थानेदार, सिपाहियों और प्रशासनिक अधिकारियों पर नियंत्रण रहेगा। ऐसे में किसी भी गवाह को डर रहता है कि अगर वह सच बोलेगा तो उसे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। काशीनाथ तिवारी का मानना है कि किसी बाहरी जांच अधिकारी की नियुक्ति तभी सार्थक हो सकती है जब स्थानीय एसपी को हटा दिया जाए।

सिटिंग जज की निगरानी में न्यायिक जांच की अपरिहार्यता

काशीनाथ तिवारी ने न केवल एसपी के तबादले की मांग की है बल्कि यह भी कहा है कि इस मामले की जांच किसी सिटिंग जज की निगरानी में होनी चाहिए। यह सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुनिश्चित करता है कि जांच की प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी और कानूनी दायरे में रहे। जब कोई उच्च न्यायालय का न्यायाधीश किसी जांच की निगरानी करता है, तो सभी पक्षों को विश्वास रहता है कि निष्पक्ष निर्णय लिया जाएगा।

इस तरह की व्यवस्था में कोई भी पुलिस अधिकारी या प्रशासनिक कर्मचारी जांच में बाधा डालने का साहस नहीं कर सकता। साक्ष्य को नष्ट करना, गवाहों को डराना या झूठा बयान कराना ऐसी परिस्थितियों में संभव नहीं होता क्योंकि सब कुछ जज के सामने होता है और हर कदम दर्ज रहता है।

विधायक आनंद मिश्रा का हस्तक्षेप और भविष्य की संभावनाएं

बक्सर से भाजपा विधायक और पूर्व आईपीएस अधिकारी आनंद मिश्रा ने पीड़ित परिवार से मिलकर उन्हें न्याय का आश्वासन दिया है। यह कदम बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि आनंद मिश्रा स्वयं कानून और व्यवस्था के क्षेत्र में अनुभवी हैं और समझते हैं कि एक गलत एनकाउंटर कितना गंभीर अपराध है।

आनंद मिश्रा ने घटना को एनकाउंटर के रूप में स्वीकार करने से साफ इनकार किया है। उनके अनुसार इसे कानूनी प्रक्रिया के तहत एक हत्या कांड माना जाना चाहिए और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषी अधिकारियों के लिए उन्होंने कड़ी कार्रवाई की मांग की है। एक पूर्व पुलिस अधिकारी का यह बयान अत्यंत प्रभावशाली है क्योंकि वह जानते हैं कि पुलिस सिस्टम कैसे काम करता है और कहां गड़बड़ियां हो सकती हैं।

भरत तिवारी का मामला केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है बल्कि पूरे न्याय तंत्र की विश्वसनीयता का सवाल है। जब तक सरकार और न्यायपालिका इस तरह के मामलों में कड़ी कार्रवाई नहीं करते, तब तक आम नागरिकों को न्याय का विश्वास नहीं रहेगा। काशीनाथ तिवारी की मांग बिल्कुल न्यायसंगत है और राज्य सरकार को इसे गंभीरता से लेना चाहिए।