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Friday, 05 June 2026
शिक्षा

डिग्री के बाद नौकरी का संकट, पांच लाख सैलरी का सपना

author
Komal
संवाददाता
📅 01 May 2026, 7:01 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
डिग्री के बाद नौकरी का संकट, पांच लाख सैलरी का सपना
📷 aarpaarkhabar.com

आजकल की शिक्षा व्यवस्था में एक बहुत बड़ा संकट उभरकर सामने आ रहा है। जहां एक ओर अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के लिए लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इन पढ़े-लिखे युवाओं को हजारों रुपये की सैलरी में ही काम करना पड़ रहा है। यह स्थिति सिर्फ चिंताजनक नहीं है, बल्कि समाज के विकास के लिए भी खतरनाक साबित हो रही है।

अनस्टॉप टैलेंट रिपोर्ट 2026 ने एक ऐसी सच्चाई सामने रखी है जो लगभग सभी के लिए आंखें खोलने वाली है। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 73 प्रतिशत डिग्रीधारी छात्र पांच लाख रुपये सालाना की सैलरी पाने का सपना देख रहे हैं। लेकिन यह सिर्फ एक सपना ही बनकर रह गया है। हकीकत बिल्कुल अलग है। अधिकांश स्नातकों को 2 लाख से 3 लाख रुपये वार्षिक सैलरी वाली नौकरियां मिल रही हैं, जो न तो उनकी योग्यता के अनुरूप है और न ही उनकी शिक्षा पर किए गए खर्च को न्यायसंगत ठहराती है।

डिग्री में निवेश और सैलरी में अंतर

इस समस्या की गहराई को समझने के लिए हमें शिक्षा के क्षेत्र में किए जाने वाले निवेश को देखना चाहिए। एक सामान्य परिवार अपने बेटे या बेटी को बीटेक या एमबीए की डिग्री दिलाने के लिए 8 लाख से 15 लाख रुपये तक खर्च करता है। प्राइवेट कॉलेजों में यह खर्च और भी अधिक हो जाता है। इसके अलावा कोचिंग, ट्यूशन और अन्य शिक्षा संबंधी खर्चों को मिलाएं तो कुल निवेश 20-25 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।

दूसरी ओर, जब ये स्नातक बाजार में प्रवेश करते हैं तो उन्हें प्रतिशोध के रूप में मात्र 18,000 से 25,000 रुपये मासिक वेतन मिल रहा है। अगर गणित करें तो 2.5 लाख रुपये की वार्षिक सैलरी पर 10 साल लगेंगे ताकि इंसान अपनी शिक्षा पर किए गए निवेश को वापस कर सके। यह स्थिति केवल असंतोषजनक नहीं है, बल्कि समस्याग्रस्त भी है।

बाजार में मांग और आपूर्ति का संकट

यह समस्या मुख्यतः बाजार में कुशल कार्यबल की मांग और शिक्षा प्रणाली द्वारा आपूर्ति किए जाने वाले कार्यबल के बीच एक बड़े अंतर के कारण उत्पन्न हो रही है। भारत में हर साल लाखों स्नातक बाजार में आते हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश के पास ऐसे कौशल नहीं होते जो नियोक्ताओं के लिए आवश्यक हैं।

तकनीकी विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ऑटोमेशन के इस दौर में कंपनियां ऐसे कर्मचारियों को ढूंढ रही हैं जो न केवल सैद्धांतिक ज्ञान रखते हों, बल्कि व्यावहारिक कौशल भी हों। लेकिन हमारी शिक्षा प्रणाली अभी भी पुरानी पद्धति को फॉलो कर रही है। किताबी ज्ञान देने के बाद कोई व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। इसलिए स्नातकों को कंपनियों में कम वेतन पर काम करना पड़ता है क्योंकि उन्हें फिर से प्रशिक्षित करना पड़ता है।

भविष्य की चिंताएं और समाधान

यदि यह प्रवृत्ति जारी रहती है तो शिक्षा के प्रति लोगों का विश्वास डगमगा जाएगा। हजारों परिवारों को निराशा का सामना करना पड़ेगा। साथ ही, योग्य युवा विदेशों की ओर पलायन करने लगेंगे, जिससे देश की मानव पूंजी नष्ट होगी।

इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब शिक्षा प्रणाली में बुनियादी बदलाव लाया जाए। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि व्यावहारिक प्रशिक्षण भी देना चाहिए। इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट-आधारित सीखना और इंडस्ट्री कोलैबरेशन को पाठ्यक्रम का अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए।

सरकार को भी कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना चाहिए। डिजिटल साक्षरता, कोडिंग, डेटा एनालिटिक्स जैसे आधुनिक कौशल के प्रशिक्षण को अनिवार्य किया जाना चाहिए। साथ ही, नियोक्ताओं को भी नए स्नातकों को प्रशिक्षित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

वर्तमान में जो परिस्थिति है, वह न तो छात्रों के लिए अच्छी है, न ही परिवारों के लिए और न ही राष्ट्र के विकास के लिए। लाखों रुपये की शिक्षा के बाद हजारों की सैलरी लेना एक खतरनाक ट्रेंड है जिसे तत्काल रोकने की जरूरत है। सभी हितधारकों को मिलकर इस समस्या का समाधान निकालना चाहिए, तभी भारत सच में एक शिक्षित और समृद्ध राष्ट्र बन सकता है।