🔴 ब्रेकिंग
रुबीना दिलैक की प्रेग्नेंसी में दोस्तों ने तोड़ा भरोसा|इस्लामाबाद वार्ता में कंफ्यूजन, वेंस जाएंगे या नहीं|दही को खट्टा होने से बचाएं – सरल घरेलू तरीका|मुरादाबाद में पति-पत्नी की निर्मम हत्या, पड़ोसी गिरफ्तार|FBI निदेशक काश पटेल ने द अटलांटिक पर मानहानि मुकदमा दायर किया|सूरत रेलवे स्टेशन पर थार कार हादसा, दीवार क्षतिग्रस्त|पानी टंकी खोदाई में कब्रिस्तान को नुकसान|सारा अली खान का बोल्ड अवतार, रिवीलिंग ड्रेस में स्टनिंग पोज|मणिपुर में 5.2 तीव्रता का भूकंप, कामजोंग में झटके|गर्मी की लहर से बचाव: 45°C तापमान और सावधानियां|रुबीना दिलैक की प्रेग्नेंसी में दोस्तों ने तोड़ा भरोसा|इस्लामाबाद वार्ता में कंफ्यूजन, वेंस जाएंगे या नहीं|दही को खट्टा होने से बचाएं – सरल घरेलू तरीका|मुरादाबाद में पति-पत्नी की निर्मम हत्या, पड़ोसी गिरफ्तार|FBI निदेशक काश पटेल ने द अटलांटिक पर मानहानि मुकदमा दायर किया|सूरत रेलवे स्टेशन पर थार कार हादसा, दीवार क्षतिग्रस्त|पानी टंकी खोदाई में कब्रिस्तान को नुकसान|सारा अली खान का बोल्ड अवतार, रिवीलिंग ड्रेस में स्टनिंग पोज|मणिपुर में 5.2 तीव्रता का भूकंप, कामजोंग में झटके|गर्मी की लहर से बचाव: 45°C तापमान और सावधानियां|
Wednesday, 22 April 2026
मौसम

दिल्ली में फिर होगा क्लाउड सीडिंग ट्रायल, IIT कानपुर तैयार

author
Komal
संवाददाता
📅 03 April 2026, 7:27 PM ⏱ 1 मिनट 👁 663 views
दिल्ली में फिर होगा क्लाउड सीडिंग ट्रायल, IIT कानपुर तैयार
📷 Aaj Tak

दिल्ली में फिर आएगी कृत्रिम बारिश, IIT कानपुर की नई पहल से उम्मीद की किरण

दिल्ली की बिगड़ती हवा और बढ़ते प्रदूषण से निपटने के लिए एक बार फिर क्लाउड सीडिंग तकनीक का सहारा लिया जाने वाला है। आईआईटी कानपुर ने इस साल गर्मी के मौसम में कृत्रिम वर्षा का नया प्रयोग करने के लिए तैयारी शुरू कर दी है और इसके लिए DGCA से आवश्यक अनुमति मांगी है।

पिछले साल अक्टूबर में हुए दो असफल प्रयासों के बाद, अब विशेषज्ञ एक नई रणनीति के साथ इस चुनौती का सामना करने को तैयार हैं। दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग और आईआईटी कानपुर के बीच 25 सितंबर 2025 को हुए समझौते के तहत यह महत्वाकांक्षी परियोजना आगे बढ़ रही है।

दिल्ली में फिर होगा क्लाउड सीडिंग ट्रायल, IIT कानपुर तैयार

पिछले प्रयासों से मिली सीख

अक्टूबर 2025 में दिल्ली में किए गए क्लाउड सीडिंग के दो ट्रायल सफल नहीं हो पाए थे। मुख्य कारण था उस समय वायुमंडल में पर्याप्त नमी का अभाव और अनुकूल मौसमी परिस्थितियों का नहीं होना। इन असफलताओं से सबक लेते हुए, अब वैज्ञानिक टीम ने अपनी रणनीति में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं।

आईआईटी कानपुर के विशेषज्ञों का मानना है कि गर्मी के मौसम में वायुमंडलीय स्थितियां क्लाउड सीडिंग के लिए अधिक अनुकूल होती हैं। इस दौरान प्राकृतिक रूप से बादल बनने की संभावना अधिक होती है, जिससे कृत्रिम वर्षा की सफलता की दर बढ़ सकती है।

क्या है क्लाउड सीडिंग तकनीक

क्लाउड सीडिंग एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें विमान या जमीनी उपकरणों के माध्यम से बादलों में सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या अन्य रसायनों का छिड़काव किया जाता है। इन रसायनों के कण बादलों में मौजूद पानी की बूंदों के साथ मिलकर उन्हें भारी बनाते हैं, जिससे बारिश होती है।

यह तकनीक दुनिया भर के कई देशों में सफलतापूर्वक इस्तेमाल की जा रही है। चीन, अमेरिका, और UAE जैसे देश नियमित रूप से क्लाउड सीडिंग का प्रयोग करते हैं। भारत में भी कई राज्यों में इस तकनीक का सफल प्रयोग हुआ है।

नई रणनीति और तैयारियां

इस बार आईआईटी कानपुर की टीम ने अपनी रणनीति में कई सुधार किए हैं। सबसे पहले, मौसम विभाग के साथ बेहतर समन्वय स्थापित किया गया है ताकि सही समय का चुनाव हो सके। दूसरे, उन्नत मौसम पूर्वानुमान तकनीकों का इस्तेमाल करके वायुमंडलीय नमी और बादलों की स्थिति का बेहतर विश्लेषण किया जा रहा है।

टीम ने विशेष रूप से प्रशिक्षित पायलटों और तकनीशियनों की व्यवस्था की है। इसके अलावा, क्लाउड सीडिंग के लिए इस्तेमाल होने वाले रसायनों की गुणवत्ता और मात्रा पर भी विशेष ध्यान दिया जा रहा है।

प्रदूषण पर प्रभाव की उम्मीद

विशेषज्ञों के अनुसार, सफल क्लाउड सीडिंग से दिल्ली की हवा में मौजूद PM2.5 और PM10 कणों की मात्रा में काफी कमी आ सकती है। बारिश के दौरान ये हानिकारक कण जमीन पर बैठ जाते हैं, जिससे हवा की गुणवत्ता में सुधार होता है।

दिल्ली सरकार का मानना है कि यह तकनीक न केवल प्रदूषण कम करने में मदद करेगी, बल्कि शहर के तापमान को भी नियंत्रित रखने में सहायक होगी। गर्मियों में कृत्रिम वर्षा से तापमान में 2-3 डिग्री तक की कमी देखी जा सकती है।

चुनौतियां और भविष्य की योजनाएं

क्लाउड सीडिंग की सफलता कई कारकों पर निर्भर करती है। मुख्य चुनौती है सही समय और स्थान का चुनाव। वैज्ञानिकों को प्राकृतिक बादलों की उपस्थिति, हवा की दिशा और गति, तापमान, और आर्द्रता जैसे कई कारकों का ध्यान रखना पड़ता है।

DGCA से अनुमति मिलने के बाद, आईआईटी कानपुर की टीम तुरंत काम शुरू कर देगी। यदि यह प्रयास सफल होता है, तो भविष्य में नियमित आधार पर क्लाउड सीडिंग का इस्तेमाल किया जा सकता है।

दिल्ली की बढ़ती जनसंख्या और औद्योगीकरण के कारण प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन गया है। पारंपरिक उपायों के साथ-साथ इस तरह की नवाचार तकनीकों का प्रयोग जरूरी हो गया है। क्लाउड सीडिंग एक उम्मीद की किरण है जो दिल्ली वासियों को साफ हवा दिला सकती है।