दिल्ली की हरियाली खतरे में, कंक्रीट निगल रहा शहर
देश की राजधानी दिल्ली के फेफड़ों में घुटन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। हरी-भरी वादियां कंक्रीट के जंगल में बदल रही हैं। जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है जो दिल्ली के लिए एक गंभीर चेतावनी है। इस अध्ययन में पाया गया है कि मध्य दिल्ली ने अपना 73.8 प्रतिशत उत्कृष्ट पारिस्थितिकी स्वास्थ्य वाला क्षेत्र खो दिया है। यह आंकड़ा शहर के पर्यावरणीय संकट की गंभीरता को दर्शाता है।
शहर की तेजी से बढ़ती आबादी और अनियंत्रित निर्माण कार्य प्रकृति को निगल रहे हैं। पिछले दो दशकों में दिल्ली का चेहरा पूरी तरह बदल गया है। जहां कभी पेड़-पौधों से घिरा शहर था, वहां आज बस ईंट और सीमेंट की दीवारें नजर आती हैं। इसका सीधा असर शहर के नागरिकों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। प्रदूषण के स्तर में भयावह वृद्धि हुई है और यह वृद्धि हर साल रिकॉर्ड तोड़ रही है।
हरियाली का विनाश और शहरीकरण की कीमत
दिल्ली में जैसे-जैसे आबादी बढ़ी, वैसे-वैसे हरे क्षेत्र सिमटते गए। मध्य दिल्ली में यह समस्या सबसे ज्यादा गंभीर है। जामिया के शोधकर्ताओं ने सैटेलाइट इमेजरी और जमीनी सर्वेक्षण के माध्यम से पाया कि पिछले बीस सालों में शहर के हरित क्षेत्र में भारी कमी आई है। पार्कों को मॉल्स में बदल दिया गया। बाग-बगीचों की जगह आवासीय कॉलोनियां बन गईं। सड़कों के किनारे लगे पुराने पेड़ों को काट दिया गया ताकि रोड वाइडनिंग की जा सके।
यह विकास की एक विकृत तस्वीर है जहां जनता के जीवन की गुणवत्ता की कोई परवाह नहीं की गई। शहर की योजना ऐसे तरीके से बनाई गई जिससे पेड़ों के लिए कोई जगह नहीं रही। अब दिल्ली की बहुत सारी कॉलोनियों में न तो कोई पार्क है और न ही खेल का मैदान। बच्चों के खेलने की जगह नहीं है। बुजुर्गों के लिए सुबह की सैर के लिए कोई हरा-भरा स्थान नहीं है। यह स्थिति मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक साबित हो रही है।
जामिया के शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि जो थोड़ी-बहुत हरियाली बची है, उसका भी काफी हिस्सा प्रदूषण से प्रभावित है। प्रदूषित हवा के कारण पेड़ों की पत्तियों पर धूल जमा हो जाती है जिससे वे प्रकाश संश्लेषण ठीक से नहीं कर पाते। इस तरह शहर की हरियाली न केवल क्षेत्रफल में बल्कि गुणवत्ता में भी गिरावट आ रही है।
प्रदूषण से बढ़ते स्वास्थ्य खतरे
हरियाली के नुकसान का सबसे बड़ा असर दिल्ली के नागरिकों की सेहत पर पड़ रहा है। शहर में वायु प्रदूषण की समस्या हर साल गंभीर होती जा रही है। सर्दियों में जब प्रदूषण अपने चरम पर पहुंचता है, तो दिल्ली वासियों को सांस लेने में कठिनाई होती है। बुजुर्गों और बच्चों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से खतरनाक है।
दिल्ली के हॉस्पिटलों में श्वसन संबंधी बीमारियों के मामले साल दर साल बढ़ रहे हैं। अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और फेफड़ों की अन्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। यह केवल बड़ों में ही नहीं, बल्कि बच्चों में भी देखी जा रही है। कई स्कूलों में अब अस्थमा के मरीज बच्चों की संख्या काफी बढ़ गई है। प्रदूषण के कारण कैंसर के मामले भी बढ़ रहे हैं।
त्वचा संबंधी रोग भी प्रदूषित हवा के कारण बढ़ रहे हैं। शहर में एलर्जी से ग्रस्त लोगों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। गर्मी के मौसम में दिल्ली में तापमान अब पहले से भी ज्यादा बढ़ता है क्योंकि कंक्रीट और काले रंग की सड़कें गर्मी को सोख लेती हैं। इसके कारण हीट स्ट्रोक के मामले भी बढ़ रहे हैं।
भविष्य के लिए जरूरी कदम
जामिया के इस शोध से पता चलता है कि दिल्ली के लिए तुरंत कार्रवाई की जरूरत है। शहर को बचाने के लिए हरियाली को प्राथमिकता देनी होगी। सरकार को ऐसी नीतियां बनानी चाहिए जो पेड़ों की कटाई को रोकें और नई हरियाली बढ़ाएं। पहले से बनी हुई कॉलोनियों में भी सार्वजनिक पार्कों का निर्माण किया जाना चाहिए।
निजी भूमि मालिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। छत के बागों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। सड़कों के किनारे अधिक से अधिक पेड़ लगाए जाने चाहिए। ऐसे पेड़ों का चयन किया जाना चाहिए जो तेजी से बढ़ते हों और प्रदूषण को अच्छी तरह सोख सकें।
दिल्ली को फिर से एक स्वस्थ शहर बनाने के लिए सभी को एक साथ काम करना होगा। सरकार, नागरिक समाज, स्कूलों और कॉलेजों को सब को आगे आना होगा। जामिया के इस शोध को दिल्ली की राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए और इसके आधार पर त्वरित कार्रवाई की जानी चाहिए। दिल्ली की हरियाली बचाना सभी की जिम्मेदारी है और अगर अभी नहीं तो बहुत देर हो जाएगी।




