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Saturday, 04 July 2026
शिक्षा

IIMC ने HC में कहा परीक्षा की लिपि संस्थान तय करेगा

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Komal
संवाददाता
📅 29 May 2026, 7:00 AM ⏱ 1 मिनट 👁 712 views
IIMC ने HC में कहा परीक्षा की लिपि संस्थान तय करेगा
📷 aarpaarkhabar.com

भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया है कि संविधान का अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा के बारे में है और यह किसी को उर्दू पत्रकारिता प्रवेश परीक्षा देवनागरी लिपि में आयोजित करने का अधिकार नहीं देता। संस्थान का यह रुख एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर आया है जो भारतीय शिक्षा व्यवस्था में लिपि और भाषा के प्रयोग से संबंधित है।

आईआईएमसी के अनुसार शैक्षणिक संस्थान को अपनी परीक्षाओं के लिए लिपि निर्धारित करने का संवैधानिक अधिकार है। यह प्रश्न तब उठा था जब कुछ परीक्षार्थियों ने माना था कि उर्दू पत्रकारिता में प्रवेश परीक्षा को देवनागरी लिपि में भी आयोजित किया जाना चाहिए। लेकिन संस्थान का मानना है कि उर्दू की अपनी लिपि है जो देवनागरी नहीं हो सकती।

संवैधानिक प्रावधान और राजभाषा

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 343 भारत की राजभाषा के बारे में विस्तृत प्रावधान करता है। यह अनुच्छेद स्पष्ट करता है कि संघ की राजभाषा हिंदी है और इसकी लिपि देवनागरी है। आईआईएमसी ने अपने हाई कोर्ट में दाखिल दस्तावेजों में इस संवैधानिक प्रावधान को दृष्टांत के रूप में प्रस्तुत किया है।

संस्थान का तर्क है कि संविधान में निहित राजभाषा की परिभाषा विशेष रूप से हिंदी और देवनागरी लिपि के लिए है। इसका अर्थ यह है कि अन्य भाषाओं, जैसे उर्दू, के लिए राजभाषा के नियम लागू नहीं होते। उर्दू की अपनी परंपरागत लिपि है जिसे फारसी-अरबी लिपि के रूप में जाना जाता है। इस लिपि में उर्दू को सही तरीके से व्यक्त किया जा सकता है।

आईआईएमसी का पक्ष यह भी है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान को अपनी परीक्षाओं के लिए उपयुक्त लिपि चुनने का अधिकार होना चाहिए। जब कोई संस्थान किसी विशेष भाषा में पाठ्यक्रम प्रदान करता है, तो उस भाषा की मूल लिपि का उपयोग करना शैक्षणिक मानकों के अनुरूप होता है। यह परंपरा दुनिया के सभी विश्वविद्यालयों में पाई जाती है।

लिपि का महत्व और भाषा की शुद्धता

लिपि किसी भी भाषा का एक अभिन्न अंग है। भाषा का सही अभिव्यक्तिकरण और उसके व्याकरणिक नियमों का सही पालन तभी संभव है जब उसकी मूल लिपि का प्रयोग किया जाए। उर्दू भाषा सदियों से फारसी-अरबी लिपि में लिखी जाती रही है और इसका पूरा साहित्य इसी लिपि में संरक्षित है।

आईआईएमसी का तर्क है कि देवनागरी लिपि में उर्दू को लिखना भाषा के मूल स्वरूप को विकृत करेगा। कई अक्षर और ध्वनियां जो उर्दू में महत्वपूर्ण हैं, वे देवनागरी लिपि में सही तरीके से प्रदर्शित नहीं की जा सकतीं। यह केवल एक तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि भाषा की वैज्ञानिकता और शुद्धता का प्रश्न है।

उर्दू पत्रकारिता प्रवेश परीक्षा एक पेशेवर प्रशिक्षण कार्यक्रम है जहां परीक्षार्थियों को उर्दू भाषा और उसके साहित्य की गहन समझ प्राप्त करनी होती है। इसलिए परीक्षा को भाषा की मूल लिपि में ही आयोजित करना बेहद आवश्यक है ताकि छात्र सही तरीके से अपने ज्ञान को प्रदर्शित कर सकें।

शैक्षणिक स्वायत्तता और संस्थागत अधिकार

आईआईएमसी का एक और महत्वपूर्ण तर्क है कि शैक्षणिक संस्थानों को अपनी परीक्षाओं के संचालन के विषय में पूर्ण स्वायत्तता दी जानी चाहिए। यह स्वायत्तता संस्थान के शैक्षणिक मानकों को बनाए रखने के लिए आवश्यक है। विश्व के किसी भी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में यह देखा गया है कि वे अपनी परीक्षाओं के लिए भाषा और लिपि दोनों निर्धारित करते हैं।

आईआईएमसी एक राष्ट्रीय संस्थान है जो पत्रकारिता में उच्च शिक्षा प्रदान करता है। इसका कर्तव्य है कि यह अपने पाठ्यक्रम और परीक्षाओं को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप रखे। यदि परीक्षा में भाषा और लिपि दोनों में भ्रम की स्थिति बनी रहे, तो इससे परीक्षा की गुणवत्ता और विश्वसनीयता पर प्रश्न चिह्न लग सकता है।

यह मामला भारत में भाषा और लिपि के बारे में एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय का माध्यम बन सकता है। हाई कोर्ट का निर्णय न केवल आईआईएमसी के लिए बल्कि देश के अन्य शैक्षणिक संस्थानों के लिए भी महत्वपूर्ण होगा जहां विभिन्न भाषाओं में परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। इस मामले के माध्यम से भारतीय न्यायव्यवस्था को भाषा, लिपि और शिक्षा के बारे में स्पष्ट दिशानिर्देश देने का अवसर मिल सकता है।