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Wednesday, 19 August 2026
समाचार

भारत पर डबल मार: लू से 30 हजार मौतें और कमजोर मानसून

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Komal
संवाददाता
📅 30 May 2026, 6:45 AM ⏱ 1 मिनट 👁 361 views
भारत पर डबल मार: लू से 30 हजार मौतें और कमजोर मानसून
📷 aarpaarkhabar.com

भारत की जलवायु इन दिनों बेहद खतरनाक मोड़ पर पहुंच गई है। देश के मौसम विभाग की ओर से आने वाली चेतावनियां सचमुच ही चिंताजनक हैं। लगातार पांच दिन की भीषण गर्मी और लू चलने से देश भर में करीब 30 हजार अतिरिक्त मौतें हो सकती हैं। इसके साथ ही मानसून का कमजोर होना एक और बड़ी मुसीबत सिर पर मंडरा रही है। यह दोनों समस्याएं मिलकर भारत के लिए एक अभूतपूर्व संकट का रूप ले सकती हैं।

लू की मार से मौतों का खतरा

विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार पांच दिन चलने वाली भीषण गर्मी यानी हीटवेव देश के लिए घातक साबित हो सकती है। इस दौरान तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है। ऐसी चरम स्थिति में मानव शरीर को भारी नुकसान पहुंचता है। बुजुर्ग, बीमार और कमजोर लोग सबसे ज्यादा खतरे में होते हैं।

उत्तर प्रदेश इस भयंकर लू की चपेट में सबसे ज्यादा आएगा, जहां अकेले 8,100 अतिरिक्त मौतों की आशंका है। बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र भी इस संकट से बचे नहीं रहेंगे। दिल्ली जैसे महानगरों में तो कंक्रीट के जंगलों के कारण स्थिति और भी गंभीर है। रात के समय भी तापमान गिरता नहीं है, जिससे शरीर को ठंडक मिलने का मौका ही नहीं मिलता।

यह आंकड़े सिर्फ सांख्यिकी नहीं हैं। ये हर एक मौत के पीछे एक परिवार की त्रासदी, एक माता-पिता का दर्द और समाज की एक बड़ी खोट है। स्वास्थ्य विभाग को तुरंत इस संकट से निपटने के लिए व्यापक योजना बनानी चाहिए। हीट सेंटर खोले जाएं, पानी की व्यवस्था की जाए और संवेदनशील लोगों तक मदद पहुंचायी जाए।

अल नीनो का असर: मानसून का कमजोर होना

जहां एक ओर लू की मार से जूझ रहा है देश, वहीं दूसरी ओर मानसून को लेकर भी चिंता गहराई है। भारतीय मौसम विभाग के आंकलन के अनुसार अल नीनो के प्रभाव के कारण इस साल मानसून की बारिश पिछले 11 सालों के सबसे निम्नतम स्तर पर रह सकती है। अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु परिघटना है जो प्रशांत महासागर के तापमान में असामान्य वृद्धि के कारण होती है।

जब मानसून कमजोर होता है तो इसके परिणाम अत्यंत विनाशकारी होते हैं। खरीफ की फसलें खराब हो जाती हैं। किसानों को भारी नुकसान का सामना करना पड़ता है। कृषि जिन राज्यों की रीढ़ की हड्डी है, वहां की पूरी अर्थव्यवस्था थर-थर कांपने लगती है। जल संकट गहरा हो जाता है। नदियों में पानी की कमी हो जाती है।

मानसून की बारिश में कमी का सीधा असर खाद्यान्न के उत्पादन पर पड़ता है, जिससे महंगाई बढ़ने की आशंका बढ़ जाती है। आम आदमी की थाली से अन्न की कमी होने लगती है। ग्रामीण इलाकों में गरीबी और भी गहरी हो जाती है। श्रमिकों के पास काम नहीं मिलता। पलायन की समस्या बढ़ जाती है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था पूरी तरह बेपटरी हो जाती है।

संकट से निपटने के लिए तैयारी जरूरी

ऐसे समय में सरकार और समाज को एक साथ काम करना होगा। पहली प्राथमिकता तो हीटवेव से निपटना है। हर शहर और कस्बे में कूलिंग सेंटर खोले जाने चाहिए। बुजुर्गों, बीमारों और बेघरों का रजिस्टर बनाया जाए और उन तक पानी, भोजन और चिकित्सा सेवाएं पहुंचायी जाएं। पाठशालाओं और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर रात में आश्रय देने की व्यवस्था हो।

दूसरा, मानसून की कमी को ध्यान में रखते हुए सिंचाई की व्यवस्था को मजबूत करना होगा। तालाबों, कुओं और नहरों की मरम्मत की जाए। वर्षा जल संरक्षण की योजनाओं को तेजी से लागू किया जाए। जल-संरक्षण को हर गांव में प्राथमिकता दी जाए।

तीसरा, किसानों को सूखे की स्थिति में सहायता देने की तैयारी होनी चाहिए। सरकार को आपातकालीन राहत कार्यक्रम तैयार रखने चाहिए। बीज, खाद और कर्ज में छूट जैसी व्यवस्थाओं को पहले से सक्रिय किया जाए।

चौथा, शहरी इलाकों में हरियाली बढ़ानी होगी। पेड़ लगाने को जन आंदोलन बनाना होगा। कंक्रीट के जंगलों को हरे-भरे बगीचों में तब्दील करने की योजनाएं बनानी होंगी। इससे न केवल तापमान कम होगा बल्कि पर्यावरण भी बेहतर होगा।

भारत का यह दोहरा संकट समाज को एक महत्वपूर्ण संदेश दे रहा है। जलवायु परिवर्तन अब सिर्फ विज्ञान की बातें नहीं रह गई हैं। ये हमारे घरों, हमारे जीवन और हमारे भविष्य को सीधे प्रभावित कर रहे हैं। इसलिए हर नागरिक को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। सरकार, समाज, किसान, मजदूर, डॉक्टर, शिक्षक - सभी को मिलकर इस संकट का सामना करना होगा। तभी हम इस दोहरी मार से अपने देश और समाज को बचा पाएंगे।