ईरान में इंटरनेट और डिजिटल आजादी पर संकट
ईरान के तेहरान शहर से एक बार फिर डिजिटल दमन की खबरें सुनाई दे रही हैं। युद्ध के चलते चल रहे संकट के बीच ईरानी सरकार ने अपनी जनता पर मीडिया और इंटरनेट संबंधी नई पाबंदियां लगा दी हैं। हालांकि महीनों बाद इंटरनेट सेवाएं आंशिक रूप से बहाल की गई हैं, लेकिन यह आजादी पूरी नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स पर सख्त प्रतिबंध लगे हुए हैं और विदेशी मीडिया चैनलों को भी काफी हद तक ब्लॉक किया गया है।
ईरान की सरकार ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया पर कड़ी नजरदारी शुरू कर दी है। इस्राइली मीडिया आउटलेट्स और बाहर से आने वाले फारसी भाषा के न्यूज चैनलों को सीधे तरीके से ईरान में प्रसारण करने से रोका जा रहा है। जो पत्रकार विदेश से रिपोर्टिंग कर रहे हैं, उन्हें भी विशेष निर्देश दिए गए हैं।
यह पहली बार नहीं है जब ईरान ने डिजिटल दुनिया पर नियंत्रण बढ़ाने की कोशिश की है। पिछले कुछ सालों से ईरान की सरकार इंटरनेट और सोशल मीडिया को सख्त नियंत्रण में रखने के लिए जाना जाता है। लेकिन इस बार की पाबंदियां और भी कठोर हैं क्योंकि युद्ध की स्थिति में सरकार को लगता है कि सूचना का प्रवाह नियंत्रित करना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है।
ईरान में इंटरनेट की स्थिति कैसी है?
मई के महीने में जब ईरान ने इंटरनेट सेवाएं आंशिक रूप से बहाल की थीं, तो देश की जनता को लगा कि अब उन्हें कुछ स्वतंत्रता मिलेगी। लेकिन हकीकत कुछ और ही थी। सरकार ने इंटरनेट को खोलते समय बहुत सारी पाबंदियां लगा दीं। व्हाट्सएप, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल मीडिया ऐप्स पर कड़ी पाबंदी बनी हुई है।
इसका मतलब यह है कि आम ईरानी नागरिक बुनियादी इंटरनेट सेवाओं का इस्तेमाल तो कर सकते हैं, लेकिन उन्हें दुनिया के साथ जुड़ने का माध्यम नहीं है। बहुत सारे लोग वीपीएन का इस्तेमाल करके इन पाबंदियों को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन सरकार उन पर भी निगरानी बढ़ा रही है।
जो लोग ईरान से बाहर रह रहे हैं, उन्हें भी अपने परिवार से संपर्क में रहने में मुश्किल हो रही है। वीडियो कॉलिंग ऐप्स धीमे हो गए हैं और कई बार बिल्कुल काम नहीं कर रहे। यह युद्ध की स्थिति में एक और बड़ी समस्या बन गई है क्योंकि कई लोग अपने प्रिय जनों से जुड़ने के लिए व्याकुल हैं।
मीडिया पर सख्ती: स्वतंत्र पत्रकारिता को चुनौती
ईरान की सरकार ने जो मीडिया पर नई पाबंदियां लगाई हैं, उनका सबसे बड़ा प्रभाव स्वतंत्र पत्रकारिता पर पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय पत्रकार संगठन इसे एक गंभीर मुद्दा मान रहे हैं। ईरान में काम करने वाले विदेशी पत्रकारों को अब नई शर्तों का पालन करना पड़ रहा है।
इस्राइली मीडिया को पूरी तरह ब्लॉक किया जा रहा है, चाहे वह खबरें हों या विश्लेषण। जो पत्रकार अरबी या अंग्रेजी में ईरान के बारे में कुछ भी लिखते हैं, उन्हें भी सरकार की ओर से आपत्ति का सामना करना पड़ रहा है। यह सूचना की स्वतंत्रता के मामले में एक बहुत ही गंभीर कदम है।
विदेश में रह रहे फारसी भाषी पत्रकार भी अब ईरान में अपनी खबरें प्रसारित नहीं कर सकते। बीबीसी फारसी और अन्य अंतरराष्ट्रीय फारसी चैनलों को भी प्रतिबंधित किया जा रहा है। इससे ईरान की जनता को सच्ची और निष्पक्ष खबरें नहीं मिल पा रहीं।
युद्ध का असर: सरकार की कड़ी रणनीति
ईरान में चल रहे युद्ध ने सरकार को इंटरनेट और मीडिया पर कड़ी नजरदारी करने के लिए प्रेरित किया है। ईरानी नेतृत्व का तर्क है कि यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है। उनका मानना है कि दुश्मन इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रोपेगेंडा फैला रहे हैं।
इसलिए सरकार को लगता है कि जनता पर सूचना का नियंत्रण रखना आवश्यक है। लेकिन मानवाधिकार संगठन इसे जनता की स्वतंत्रता का उल्लंघन मान रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान की इस नीति की आलोचना हो रही है।
युद्ध के चलते देश की अर्थव्यवस्था भी खस्ता हाल है। लोग अपने प्रियजनों के बारे में जानना चाहते हैं, कहां क्या हो रहा है, इसकी खबर चाहते हैं। लेकिन सरकारी सेंसरशिप से यह संभव नहीं हो पा रहा। यह एक नाजुक समय है और ईरान की सरकार को जनता की भावनाओं का भी ख्याल रखना चाहिए।
ईरान में जो कुछ हो रहा है, वह आधुनिक समय में डिजिटल दमन का एक उदाहरण है। सरकार अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके जनता को सूचना से वंचित कर रही है। यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है जो लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत है। दुनिया की अन्य सरकारों को भी ऐसी नीतियों से बचना चाहिए क्योंकि यह समाज में विभाजन और असंतोष को बढ़ाती है।




