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Thursday, 04 June 2026
राजनीति

केजरीवाल के आरोप पर जस्टिस स्वर्णकांता का जवाब

author
Komal
संवाददाता
📅 21 April 2026, 7:01 AM ⏱ 1 मिनट 👁 1.1K views
केजरीवाल के आरोप पर जस्टिस स्वर्णकांता का जवाब
📷 aarpaarkhabar.com

दिल्ली हाई कोर्ट में एक महत्वपूर्ण फैसले में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की याचिका को खारिज कर दिया है। केजरीवाल ने जस्टिस स्वर्णकांता से शराब नीति मामले की सुनवाई से अलग होने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इस याचिका को स्वीकार नहीं किया। अपने फैसले में जस्टिस स्वर्णकांता ने साफ कहा है कि वह बिना किसी ठोस साक्ष्य के लगाए गए आरोपों के आधार पर सुनवाई से पीछे नहीं हटेंगी।

यह मामला दिल्ली की राजनीति में काफी संवेदनशील माना जा रहा है। अरविंद केजरीवाल के खिलाफ शराब नीति से जुड़ी जांच काफी समय से चल रही है। इसी बीच केजरीवाल की ओर से दावा किया गया था कि जस्टिस स्वर्णकांता के साथ पूर्वाग्रह हो सकता है, इसलिए वह इस मामले की सुनवाई से अलग हो जाएं। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज कर दिया है।

न्यायिक निरपेक्षता का मुद्दा

जस्टिस स्वर्णकांता ने अपने फैसले में स्पष्ट किया है कि न्यायिक प्रणाली के लिए यह जरूरी है कि न्यायाधीशों को बिना किसी ठोस कारण के अपने कर्तव्य से पीछे न हटना पड़े। उन्होंने कहा है कि केवल आरोप और संदेह के आधार पर किसी जस्टिस को निष्पक्ष माना नहीं जा सकता। अगर हर बार कोई पक्ष किसी न्यायाधीश पर संदेह जताए, तो न्यायिक प्रक्रिया बाधित हो सकती है।

जस्टिस स्वर्णकांता ने अपने आदेश में लिखा है कि एक न्यायाधीश को केवल तभी अलग होना चाहिए जब कोई वास्तविक और ठोस कारण हो। किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल अफवाहें या अनुमान लगाना न्याय के सिद्धांत के विपरीत है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि हर बार किसी को संदेह हो तो यह न्यायिक व्यवस्था को कमजोर कर देगा।

केजरीवाल की याचिका में क्या थे आरोप

अरविंद केजरीवाल की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया था कि जस्टिस स्वर्णकांता के खिलाफ कुछ टिप्पणियां उनके पूर्वाग्रह को दर्शाती हैं। केजरीवाल का तर्क था कि न्यायिक निरपेक्षता को बनाए रखने के लिए जस्टिस को इस मामले से अलग हो जाना चाहिए। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।

जस्टिस स्वर्णकांता ने अपने फैसले में एक-एक आरोप का जवाब दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि अदालत में दी गई उनकी टिप्पणियां केवल कानूनी दृष्टिकोण से थीं। उन्होंने कहा कि न्यायाधीश को अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है, खासकर जब मामले की कानूनी पहलुओं पर विचार किया जा रहा हो।

न्यायिक प्रक्रिया पर असर

इस फैसले का व्यापक असर होने की संभावना है। अगर किसी भी पक्ष को किसी भी न्यायाधीश के बारे में संदेह हो सके, तो न्यायिक प्रणाली ठीक से काम नहीं कर सकेगी। जस्टिस स्वर्णकांता ने इसी बात को रेखांकित किया है। उन्होंने कहा है कि न्यायिक स्वतंत्रता और निरपेक्षता को बनाए रखना अत्यंत जरूरी है।

इस मामले में शराब नीति से संबंधित कई गंभीर आरोप हैं। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में जांच की है और कई सवाल उठाए हैं। केजरीवाल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाए गए हैं। ऐसे में यह मामला काफी संवेदनशील है और इसमें पूर्ण निरपेक्षता के साथ सुनवाई होनी चाहिए।

जस्टिस स्वर्णकांता का यह फैसला न केवल इस मामले के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय न्यायिक प्रणाली के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है। उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि न्यायाधीशों को बिना किसी ठोस कारण के सुनवाई से अलग नहीं होना चाहिए। यह निरपेक्ष न्याय प्रणाली को मजबूत करने के लिए जरूरी है।

अब इस मामले की सुनवाई जस्टिस स्वर्णकांता की देखरेख में आगे बढ़ेगी। दिल्ली हाई कोर्ट में शराब नीति से संबंधित सभी पहलुओं पर विस्तार से विचार किया जाएगा। केजरीवाल के पक्ष को अपना बचाव पेश करने का पूरा अवसर दिया जाएगा, लेकिन यह सब न्यायिक प्रक्रिया के तहत ही होगा।

यह फैसला दिल्ली की राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। दिल्ली सरकार पर लगे आरोपों की जांच के लिए अब पूरी कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इस मामले का नतीजा न केवल अरविंद केजरीवाल के लिए, बल्कि दिल्ली की पूरी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।