नेतन्याहू ने ट्रंप को पहुंचाया नुकसान? अमेरिका का रक्षा खजाना खाली
अमेरिका और इस्राइल के बीच सुरक्षा संबंधों को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। वाशिंगटन पोस्ट की ताज़ी रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि इस्राइल की रक्षा के नाम पर अमेरिका ने अपने रक्षा खजाने में भारी कटौती की है। यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को गलत सलाह दी है।
रिपोर्ट के अनुसार, ईरान से इस्राइल की सुरक्षा के लिए अमेरिका ने अपने मिसाइल इंटरसेप्टर का लगभग आधा भंडार खत्म कर दिया है। यह एक अभूतपूर्व घटना है जिसने न केवल पेंटागन को चिंतित कर दिया है बल्कि अमेरिका के सहयोगी देशों को भी सतर्क कर दिया है। इस पूरे संकट के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका इस्राइल के लिए अपनी सुरक्षा व्यवस्था को नजरअंदाज़ कर रहा है।
अमेरिकी मिसाइलों का विशाल भंडार खत्म
वाशिंगटन पोस्ट की जांच में यह बात सामने आई है कि अमेरिका ने इस्राइल की रक्षा के लिए कुल 200 से अधिक "थाड" (Terminal High Altitude Area Defence) मिसाइलें दागी हैं। इसके अलावा 100 अन्य उन्नत मिसाइलें भी इस्तेमाल की गई हैं। ये सभी मिसाइलें ईरानी हमलों को रोकने के लिए दागी गई थीं। इस बीच, इस्राइल ने अपनी मिसाइलें नहीं दागीं और अपने हथियार भंडार को सुरक्षित रखा।
यह रणनीति अमेरिकी रक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गई है। पेंटागन के अधिकारियों का मानना है कि इस तरह की रणनीति दीर्घकालीन में अमेरिका के लिए हानिकारक साबित हो सकती है। अमेरिकी सेना को अपने मिसाइल भंडार को तेजी से फिर से भरने की आवश्यकता पड़ेगी, जिसमें करोड़ों डॉलर खर्च होंगे।
इस पूरे प्रकरण में यह भी सवाल उठा है कि क्या नेतन्याहू ने ट्रंप को इस गलत फैसले के लिए प्रभावित किया। इस्राइली नेता को अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था की कीमत पर अपने देश की सुरक्षा करते हुए दिखा है। अमेरिका-इस्राइल संबंधों के इतिहास में ऐसी घटना पहली बार हुई है।
पेंटागन और सहयोगियों की चिंता
अमेरिकी रक्षा विभाग (पेंटागन) इस स्थिति से बहुत चिंतित है। वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि मिसाइल भंडार की यह कमी अमेरिका की प्रतिरक्षा क्षमता को कमजोर कर सकती है। खासकर इंडो-प्रशांत क्षेत्र में चीन के सामने अमेरिका के पास पर्याप्त मिसाइलें नहीं रह गई हैं।
नाटो के सदस्य देश भी इस स्थिति से परेशान हैं। यूरोप में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। रूस के साथ संभावित संघर्ष की स्थिति में अमेरिका के पास पर्याप्त मिसाइलें नहीं बचेंगी। जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं।
पेंटागन के प्रवक्ता ने कहा है कि मिसाइल उत्पादन को तेजी से बढ़ाया जाएगा। लेकिन इसमें महीनों का समय लगेगा। इस बीच, अमेरिकी सेना की तत्परता में कमी आ सकती है। यह स्थिति अमेरिका के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
नेतन्याहू की रणनीति पर सवालिया निशान
अमेरिकी मीडिया और विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरी घटना में इस्राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की भूमिका संदिग्ध है। नेतन्याहू को ट्रंप के कान भरते हुए माना जा रहा है ताकि अमेरिका इस्राइल की सुरक्षा के लिए अपने संसाधन खर्च करे।
इस्राइल ने अपनी उन्नत प्रौद्योगिकी और सैन्य क्षमता का उपयोग नहीं किया। इसके बजाय, अमेरिकी मिसाइलों पर पूरी तरह निर्भर रहा। इस रणनीति से अमेरिका को बहुत नुकसान हुआ है। विश्लेषकों का मानना है कि इस्राइल अपनी सैन्य शक्ति को सुरक्षित रखना चाहता है भविष्य के संघर्षों के लिए।
नेतन्याहू के इस कदम की तुरंत प्रतिक्रिया अमेरिकी कांग्रेस में भी सुनाई दी है। कुछ सांसदों ने सवाल उठाया है कि क्या अमेरिका को इस्राइल को इतनी सहायता देनी चाहिए। अमेरिकी जनता भी इस मामले को लेकर विभाजित दिख रही है। कुछ लोगों का मानना है कि अमेरिका को अपने हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।
यह पूरा प्रकरण अमेरिका-इस्राइल संबंधों में एक नई जटिलता जोड़ देता है। भविष्य में यह देखना होगा कि ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे पर कैसे कार्रवाई करता है। अभी के लिए, अमेरिका को अपने रक्षा बजट में बड़ी बढ़ोतरी करनी पड़ सकती है।




