ट्रंप नाटो विवाद: रुबियो की पुरानी पोस्ट वायरल
ईरान युद्ध की आंच में जल रहे ट्रंप-नाटो रिश्ते, रुबियो के पुराने बयान ने बढ़ाई मुश्किल
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान के साथ जारी संघर्ष के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नाटो से बढ़ती नाराजगी एक नया मोड़ ले रही है। इस नाजुक समय में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो का एक पुराना बयान तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि राष्ट्रपति बिना सीनेट की मंजूरी के नाटो नहीं छोड़ सकते। यह बयान अब ट्रंप प्रशासन के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती बनकर उभरा है।
फिलहाल ईरान के साथ जारी युद्ध में यूरोपीय सहयोगी देशों से अपेक्षित मदद न मिलने के कारण ट्रंप का गुस्सा चरम पर है। उनका मानना है कि नाटो के सदस्य देश अमेरिका पर निर्भर रहकर अपनी जिम्मेदारियों से बचते रहे हैं।
रुबियो के पुराने बयान से बढ़ी मुश्किलें
मार्को रुबियो का वायरल हो रहा बयान उस समय का है जब वे सीनेटर थे और ट्रंप के नाटो विरोधी रुख की आलोचना करते थे। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि अमेरिकी संविधान के अनुसार राष्ट्रपति को किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संधि से बाहर निकलने के लिए सीनेट से दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है।
रुबियो ने अपने उस बयान में कहा था, "नाटो जैसी महत्वपूर्ण सैन्य गठबंधन से अमेरिका का अलग होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए घातक होगा।" आज जब वे खुद विदेश मंत्री हैं, तो उनके ये शब्द उन्हीं के सामने चुनौती बनकर खड़े हैं।
सोशल मीडिया पर इस पुराने बयान को लेकर तीखी बहस छिड़ी है। विपक्षी नेता रुबियो से पूछ रहे हैं कि क्या वे अब भी अपनी उसी बात पर कायम हैं या फिर राष्ट्रपति के दबाव में अपना रुख बदल लेंगे।
ईरान युद्ध में यूरोप की मंद प्रतिक्रिया
ईरान के साथ बढ़ते तनाव में अमेरिका को उम्मीद थी कि नाटो के सहयोगी देश पूरा साथ देंगे। लेकिन हकीकत कुछ और ही निकली है। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे प्रमुख यूरोपीय देशों ने केवल राजनयिक समर्थन तक अपना योगदान सीमित रखा है।
ख़ासकर जर्मनी की स्थिति ट्रंप को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है। जर्मन चांसलर ने साफ कहा है कि वे ईरान के मामले में किसी भी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं बनेंगे। इससे व्हाइट हाउस में गुस्सा और भी बढ़ गया है।
ट्रंप के करीबी सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रपति का कहना है कि "अमेरिका हमेशा यूरोप की रक्षा करता आया है, लेकिन जब हमें जरूरत है तो ये लोग मुंह फेर लेते हैं।"
संवैधानिक बाधाएं और राजनीतिक हकीकत
| पक्ष | स्थिति | मुख्य तर्क |
| ------ | -------- | ---------- | |
|---|---|---|---|
| ट्रंप प्रशासन | नाटो से निकलना चाहता है | यूरोप का असहयोग | |
| सीनेट डेमोक्रेट्स | नाटो में बने रहना | राष्ट्रीय सुरक्षा जरूरी | |
| रिपब्लिकन सीनेटर | विभाजित राय | कुछ ट्रंप के साथ, कुछ विरोध में |
अमेरिकी संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति को नाटो से बाहर निकलने के लिए सीनेट से दो-तिहाई वोट चाहिए। फिलहाल सीनेट में रिपब्लिकन का बहुमत है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत नहीं है। कई रिपब्लिकन सीनेटर भी नाटो से अलग होने के विरोध में हैं।
सीनेटर जॉन कॉर्निन ने कहा है, "नाटो अमेरिकी सुरक्षा नीति की आधारशिला है। इससे अलग होना चीन और रूस को फायदा पहुंचाएगा।"
अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं और भविष्य की चुनौतियां
नाटो मुख्यालय में भी इस विवाद को लेकर चिंता बढ़ रही है। नाटो के सेक्रेटरी जनरल ने एक बयान में कहा है कि "गठबंधन की एकता इस वक्त सबसे ज्यादा जरूरी है।"
यूरोपीय नेताओं का कहना है कि वे ईरान मुद्दे पर अमेरिका के साथ हैं, लेकिन सैन्य कार्रवाई उनकी प्राथमिकता नहीं है। फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने कहा है, "हम राजनयिक समाधान में विश्वास करते हैं।"
चीन और रूस इस स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। दोनों देशों के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त बयान में कहा है कि "पश्चिमी गठबंधन की एकता में दरार आ रही है।"
विशेषज्ञों का मानना है कि यह विवाद केवल नाटो तक सीमित नहीं रह सकता। इसका असर अन्य अंतर्राष्ट्रीय संधियों और समझौतों पर भी पड़ सकता है। अगर ट्रंप अपने इरादे में कामयाब हो जाते हैं तो यह द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद बनी अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था के लिए एक बड़ा झटका होगा।
फिलहाल रुबियो अपने पुराने बयानों पर चुप्पी साधे हुए हैं। व्हाइट हाउस से भी इस मामले में कोई स्पष्ट बयान नहीं आया है। लेकिन अमेरिकी राजनीति में यह विवाद आने वाले दिनों में और भी तीखा होने के संकेत दे रहा है।




