ट्रंप का यू-टर्न: ईरान के सामने झुका अमेरिका?
ट्रंप का यू-टर्न: क्या ईरान के सामने झुका अमेरिका?
मिडिल ईस्ट में 33 दिनों से जारी तनाव अचानक एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। जिस डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात की थी, अब वही राष्ट्रपति युद्धविराम का ऐलान करने की तैयारी में दिख रहे हैं। बीते 24 घंटों में आए संकेत बताते हैं कि अमेरिकी प्रशासन अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रहा है।
यह स्थिति तब बनी है जब न तो अमेरिका अपने मूल लक्ष्य हासिल कर पाया है और न ही ईरान अपनी स्थिति से पीछे हटा है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या ईरान के विध्वंसक पलटवार ने वाशिंगटन की रणनीति को हिला दिया है?

अमेरिकी लक्ष्य: यूरेनियम न मिला, सत्ता न बदली
जब ट्रंप प्रशासन ने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था, तो इसके पीछे दो मुख्य उद्देश्य थे। पहला, ईरान के परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह रोकना और यूरेनियम संवर्धन की गतिविधियों पर नियंत्रण पाना। दूसरा, तेहरान में सत्ता परिवर्तन लाकर अमेरिका समर्थक सरकार स्थापित करना।
हकीकत यह है कि 33 दिनों के संघर्ष के बाद भी अमेरिका इन दोनों में से कोई भी लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया है। न तो ईरान की यूरेनियम संवर्धन की क्षमता में कोई महत्वपूर्ण कमी आई है और न ही वहां की सत्ता में कोई बदलाव का संकेत दिख रहा है।
ईरानी नेतृत्व न केवल मजबूती से अपनी स्थिति पर कायम है, बल्कि इस संघर्ष में उसे क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन भी मिला है। चीन और रूस जैसी महाशक्तियों का साथ ईरान को मिल रहा है।
ईरान का विध्वंसक पलटवार
ईरान ने अमेरिकी दबाव के जवाब में जो रणनीति अपनाई, वह वाशिंगटन की अपेक्षाओं से कहीं ज्यादा प्रभावी साबित हुई। तेहरान ने न केवल अपनी रक्षात्मक स्थिति मजबूत की, बल्कि आक्रामक पलटवार भी किया।
ईरान की तरफ से आए हमलों ने अमेरिकी रणनीतिकारों को चौंका दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य में तेल परिवहन पर प्रभाव, क्षेत्रीय सहयोगियों पर बढ़ता दबाव, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि ईरान की मिसाइल क्षमता का प्रदर्शन अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के आकलन से कहीं बेहतर रहा।
इस पलटवार का सबसे बड़ा प्रभाव यह हुआ कि अंतर्राष्ट्रीय तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं। वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दबाव से अमेरिकी अर्थव्यवस्था भी अछूती नहीं रह सकी।
ट्रंप की बदलती रणनीति
| पहले की स्थिति | वर्तमान स्थिति |
| --- | --- | |
|---|---|---|
| कड़ी कार्रवाई की धमकी | युद्धविराम की तैयारी | |
| सैन्य दबाव बढ़ाना | कूटनीतिक हल खोजना | |
| ईरान को घुटने टेकने पर मजबूर करना | बातचीत की मेज पर आना | |
| 6 अप्रैल तक की डेडलाइन | जल्दी समझौते की कोशिश |
विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, व्हाइट हाउस में पिछले 48 घंटों से गहरी चर्चा चल रही है। राष्ट्रपति ट्रंप के सलाहकारों ने उन्हें साफ तौर पर बताया है कि मौजूदा रणनीति से अमेरिकी हितों को फायदा होने के बजाय नुकसान हो रहा है।
पेंटागन से आई रिपोर्टों में भी चेतावनी दी गई है कि लंबे संघर्ष से अमेरिकी सैन्य संसाधनों पर अनावश्यक दबाव पड़ रहा है। इससे दूसरे महत्वपूर्ण मोर्चों, खासकर चीन के मुकाबले तैयारी प्रभावित हो सकती है।
अंतर्राष्ट्रीय दबाव का असर
अमेरिकी रणनीति में बदलाव के पीछे अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी एक महत्वपूर्ण कारक है। यूरोपीय सहयोगियों ने साफ संकेत दिए हैं कि वे इस संघर्ष को और बढ़ाने के पक्ष में नहीं हैं।
जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे पारंपरिक सहयोगियों ने भी कूटनीतिक हल की जरूरत पर जोर दिया है। नाटो के भीतर भी मतभेद दिखाई दे रहे हैं, जो अमेरिकी स्थिति को और कमजोर बनता जा रहा है।
संयुक्त राष्ट्र में भी अमेरिकी स्थिति को समर्थन नहीं मिल रहा। सुरक्षा परिषद में रूस और चीन के वीटो की संभावना से अमेरिका को कोई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित करवाने में कठिनाई हो रही है।
आर्थिक चुनौतियां
संघर्ष का सबसे गहरा प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जो अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए चिंता का विषय है।
अमेरिकी शेयर बाजार में भी गिरावट का दौर जारी है। रक्षा कंपनियों के शेयरों में तेजी के बावजूद, समग्र बाजार की स्थिति चिंताजनक है। यह स्थिति ट्रंप प्रशासन के लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकती है।
गैस की कीमतों में वृद्धि से आम अमेरिकियों के जीवन पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है। यह स्थिति ट्रंप की घरेलू लोकप्रियता को प्रभावित कर सकती है।
आगे की राह
अब सभी की नजरें ट्रंप के संभावित संबोधन पर टिकी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राष्ट्रपति युद्धविराम की घोषणा को अपनी कूटनीतिक जीत के रूप में पेश करने की कोशिश करेंगे।
हालांकि, यह साफ है कि यह निर्णय मजबूरी में लिया जा रहा है, न कि किसी रणनीतिक सफलता के कारण। ईरान की मजबूत प्रतिरोध क्षमता और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के मिले-जुले रुख ने अमेरिकी नीति निर्माताओं को पुनर्विचार पर मजबूर किया है।
आने वाले दिन इस बात का फैसला करेंगे कि यह युद्धविराम स्थायी होगा या फिर यह केवल एक रणनीतिक विराम है। मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति में यह घटनाक्रम निश्चित रूप से एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा।




