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Saturday, 03 October 2026
राजनीति

हुगली में चुप्पी और सवाल: शरणार्थी जैसे अपने घर में

author
Komal
संवाददाता
📅 20 April 2026, 6:30 AM ⏱ 1 मिनट 👁 266 views
हुगली में चुप्पी और सवाल: शरणार्थी जैसे अपने घर में
📷 aarpaarkhabar.com

हुगली जिले की गलियों में घूमते हुए एक अलग ही खामोशी का अनुभव होता है। जहां पहले चुनाव के दिनों में रंग-बिरंगे झंडे, नारे और सार्वजनिक सभाएं नजर आती थीं, वहां इस बार एक ख़ामोश विरोध दिखाई दे रहा है। यह खामोशी किसी आंदोलन की खामोशी नहीं है, बल्कि असंतोष और भय की खामोशी है। जब हम इस जिले के विभिन्न इलाकों में गए और जनता से बातचीत की, तो हर घर में एक समान कहानी सुनाई दी - अपने ही घर में रिफ्यूजी बनने का दर्द।

हुगली जिले के अठारह विधानसभा सीटें राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र रही हैं। पिछली बार तृणमूल कांग्रेस ने यहां शानदार जीत दर्ज की थी, लेकिन इस बार की जमीन पर चलने वाली खबरें बिल्कुल अलग कहानी बयां करती हैं। जिले के प्रमुख बाजारों में, चाय की दुकानों पर, और मोहल्लों की गलियों में जब स्थानीय लोगों से चुनाव को लेकर बातचीत की, तो अधिकतर लोग या तो असहज दिखे या फिर सामान्य जवाब देकर अपनी असली बातें छिपा गए।

सुरक्षा की चिंता और अकेलापन

एक साधारण व्यापारी से जब पूछा गया कि आने वाले चुनावों में क्या उम्मीद है, तो उसका जवाब था - "साहब, हम तो बस चाहते हैं कि सब कुछ ठीक हो जाए।" यह सामान्य से लगने वाला उत्तर दरअसल गहरी असंतुष्टि को दर्शाता है। हुगली के कई इलाकों में सांप्रदायिक तनाव की पृष्ठभूमि है, और वर्तमान समय में यह तनाव और भी तीव्र हो गया है। लोग अपने पड़ोसियों के साथ खुलकर बातें नहीं कर पाते, राजनीतिक विचारों पर चर्चा से बचते हैं, और सार्वजनिक स्थानों पर अपनी राय व्यक्त करने में डरते हैं।

यह जो आशंका और भय का माहौल है, वह लोगों को अपने ही घर में शरणार्थी बना गया है। किसी को पता नहीं कि अगली घटना कब घट जाएगी, कौन सी बात किस रूप ले लेगी, और कौन सा पड़ोस की मेलजोल तनाव में बदल जाएगा। इसी वजह से लोग खामोश रहना बेहतर समझते हैं। वे अपनी खिड़कियां बंद रखते हैं, दरवाजे किवाड़ पर ताला लगाते हैं, और अपनी बात किसी से नहीं कहते।

सरकार से बिगड़ते रिश्ते

हुगली जिले में तृणमूल कांग्रेस की सत्ता रही है, लेकिन पिछले कुछ सालों में सरकार और जनता के बीच की दूरी काफी बढ़ गई है। स्थानीय प्रशासन की निष्क्रियता, विकास कार्यों में देरी, और अव्यवस्था ने लोगों को निराश किया है। एक पेंशनभोगी ने कहा, "बुढ़ापे में जो पेंशन मिलती है, उससे गुजारा ही नहीं हो पाता। महंगाई इतनी बढ़ गई है कि आटा-दाल खरीदना भी मुश्किल हो गया है।"

शिक्षा, स्वास्थ्य, और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर जनता की असंतुष्टि स्पष्ट दिखती है। कई युवा जिले से बाहर जाने के लिए तरस रहे हैं क्योंकि यहां उन्हें रोजगार के अवसर नहीं दिख रहे। महिलाओं की सुरक्षा को लेकर भी गहरी चिंता है। ये सभी मुद्दे मिलकर एक ऐसा माहौल बना गए हैं जहां लोग आशान्वित नहीं, बल्कि संशयपूर्ण दिख रहे हैं।

चुनावी खेल और जनता की निरीक्षा

इसी असंतोष के बीच विभिन्न राजनीतिक पार्टियां अपना प्रचार-प्रसार कर रही हैं। भाजपा आक्रामक रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है, जबकि कांग्रेस जैसी पार्टियां भी अपनी रणनीति बदल रही हैं। लेकिन जनता की यह खामोशी और संशय दोनों को चुनौती दे रहा है। लोग पार्टियों के प्रतिनिधियों को नहीं सुनना चाहते, या कम से कम अपनी प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं।

हुगली की यह खामोशी संभवतः आने वाले विधानसभा चुनावों में किसी अप्रत्याशित परिणाम का संकेत दे सकती है। जब जनता मुखर नहीं होती और अपनी असली भावनाएं छिपाती है, तो कई बार चुनाव परिणाम सभी को चकित कर देते हैं। हुगली के मतदाता अब अपने ही घर में अजनबी हैं, डरे-सहमे हैं, और अनिश्चितता में जी रहे हैं। यह स्थिति किसी भी जिले के लिए शुभ संकेत नहीं है।

सवाल यह है कि क्या आने वाले चुनाव इस खामोशी को तोड़ेंगे? क्या जनता अपनी असली भावनाएं वोट के माध्यम से व्यक्त करेगी? और क्या कोई राजनीतिक दल इन लोगों को उनके अपने घर में फिर से सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस कराने में कामयाब हो सकेगा? ये सभी सवाल हुगली की इस खामोशी में ही छिपे हैं। और जब तक ये सवाल का जवाब नहीं मिल जाता, तब तक हुगली की जनता अपने ही घर में रिफ्यूजी बनी रहेगी। यही हुगली की सबसे बड़ी त्रासदी है।