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Wednesday, 22 April 2026
मौसम

आंधी-बारिश अनिश्चित क्यों, ISRO-AMU का 35 साल का अध्ययन

author
Komal
संवाददाता
📅 13 April 2026, 6:30 AM ⏱ 1 मिनट 👁 853 views
आंधी-बारिश अनिश्चित क्यों, ISRO-AMU का 35 साल का अध्ययन
📷 aarpaarkhabar.com

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इसरो के सहयोग से चलाया जा रहा एक महत्वपूर्ण अध्ययन हमारे सामने एक गंभीर सवाल खड़ा कर रहा है। यह सवाल है कि आखिर हमारे मौसम और मौसमी चक्र इतने अनिश्चित क्यों हो गए हैं? गत तीस-पैंतीस सालों में जलवायु में आई तेजी से बदलाव के कारण हमारे देश में आंधी-बारिश का पैटर्न पूरी तरह से अलग हो गया है। यह बदलाव सिर्फ किसान-मजदूर के लिए नहीं, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।

पृथ्वी के बढ़ते तापमान का असर

विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं का कहना है कि पिछले तीन दशकों में वैश्विक तापमान में जो बढ़ोतरी हुई है, उसका सीधा असर हमारे मौसमी प्रणाली पर पड़ा है। जब धरती का तापमान बढ़ता है, तो समुद्र का पानी भी गर्म होता है, जिससे वायुमंडल में नमी की मात्रा बदल जाती है। इसके परिणामस्वरूप, बारिश के दिन, बारिश की तीव्रता और गर्मी की लहरें सभी कुछ अप्रत्याशित हो गया है।

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के भूगोल विभाग के प्रोफेसर और इस शोध परियोजना के प्रमुख अन्वेषक के अनुसार, उन्होंने पिछले तीन दशकों में पृथ्वी के तापमान में करीब एक डिग्री सेल्सियस की वृद्धि दर्ज की है। यह वृद्धि छोटी लग सकती है, लेकिन यह हमारे पूरे जलवायु तंत्र के लिए बहुत बड़ी है। इसी के कारण, भारत के विभिन्न हिस्सों में गर्मी की तीव्रता में वृद्धि हुई है, सर्दियां कम अवधि की हो गई हैं, और बारिश का पैटर्न पूरी तरह से बदल गया है।

डेटा विश्लेषण और खोजें

इसरो द्वारा प्रदान किए गए उपग्रह डेटा का उपयोग करते हुए, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शोध टीम ने उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में मौसमी परिवर्तनों का गहन विश्लेषण किया है। इस अध्ययन में देश के विभिन्न मौसम विज्ञान केंद्रों से एकत्र किए गए डेटा का भी उपयोग किया गया है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि पिछली शताब्दी के नब्बे के दशक और दो हजार के दशक की तुलना में, वर्तमान समय में गर्मी की लहरें अधिक प्रबल और लंबी हो गई हैं।

अध्ययन के अनुसार, मई और जून के महीनों में तापमान में पचास के दशक की तुलना में अब दो से तीन डिग्री अधिक बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसके विपरीत, मानसून का आगमन अधिक अनिश्चित हो गया है। कभी-कभी तो मानसून सामान्य समय से एक-दो हफ्ते पहले आ जाता है, तो कभी देरी से आता है। बारिश की मात्रा भी वर्ष दर वर्ष बहुत अलग-अलग होती है। कहीं अत्यधिक बारिश हो जाती है, तो कहीं सूखे की स्थिति निर्मित हो जाती है।

कृषि और समाज पर प्रभाव

इन मौसमी परिवर्तनों का सबसे बड़ा असर भारतीय कृषि पर पड़ा है। भारत एक कृषि प्रधान देश है, जहां लाखों किसान पारंपरिक तरीके से खेती करते हैं। जब बारिश और तापमान का पैटर्न ही अनिश्चित हो जाए, तो किसान यह नहीं जान पाता कि किस समय पर बीज बोएं, किस समय पर सिंचाई करें, और कौन सी फसल बोएं जो उन्हें अच्छा मुनाफा दे।

इस अध्ययन के निष्कर्षों के आधार पर, विशेषज्ञ सुझाव दे रहे हैं कि हमें अपनी कृषि नीति और जल प्रबंधन नीति को दोबारा देखना चाहिए। पारंपरिक तरीके से खेती करने वाले किसानों को आधुनिक तकनीकों, जैसे ड्रिप सिंचाई, मल्च खेती, और जलवायु-सहिष्णु फसलों की जानकारी दी जानी चाहिए। साथ ही, सरकार को बेहतर मौसम पूर्वानुमान प्रणाली में निवेश करना चाहिए, ताकि किसान अपनी योजना बेहतर तरीके से बना सकें।

इसरो का यह सहयोग बहुत ही सराहनीय है, क्योंकि उपग्रह तकनीक से प्राप्त डेटा बहुत ही सटीक और विश्वसनीय होता है। इसके द्वारा हम वास्तविक जलवायु परिवर्तन को समझ सकते हैं और भविष्य में और भी बेहतर पूर्वानुमान लगा सकते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान का यह शोध न केवल हमारे देश के लिए, बल्कि पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

भविष्य में, यदि हम इन बदलावों को समझ लें और उसी अनुसार अपनी रणनीति बना लें, तो हम इन चुनौतियों का सामना बेहतर तरीके से कर सकेंगे। यह अध्ययन हमें याद दिलाता है कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ एक पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज, अर्थव्यवस्था और जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है। इसलिए, इस गंभीर विषय पर अधिक से अधिक शोध, जागरूकता और सरकारी ध्यान देने की आवश्यकता है।