यूपी मदरसों का मिड-डे मील: खामियां और सच्चाई
उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा संचालित मदरसों में मिड-डे मील योजना को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। राज्य सरकार से अनुदान पाने वाले कुल 558 मदरसों में यह योजना कितनी प्रभावी है, इसको लेकर विभिन्न रिपोर्टों में गंभीर खामियां सामने आई हैं। आजतक न्यूज की विस्तृत ग्राउंड रिपोर्टिंग में यह बात उजागर हुई है कि कुछ स्थानों पर तो बच्चों को नियमित भोजन मिल रहा है, जबकि दूसरी ओर कई मदरसों में यह योजना केवल कागजों तक सीमित है।
यह पहल बच्चों के पोषण स्तर को बेहतर बनाने और उनकी शिक्षा में सुधार लाने के लिए शुरू की गई थी। लेकिन जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन में कई समस्याएं सामने आ रही हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन मदरसों में लगभग 50,000 से अधिक बच्चे पढ़ाई करते हैं, जिनमें से अधिकांश आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आते हैं। ऐसे में मिड-डे मील योजना उनके पोषण और विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
मदरसों में मिड-डे मील योजना की असली स्थिति
हमारी टीम ने जब विभिन्न मदरसों का दौरा किया, तो एक विषम चित्र सामने आया। कुछ मदरसों में तो भोजन की व्यवस्था अच्छी तरह से हो रही है और बच्चे नियमित रूप से गर्म खाना खा रहे हैं। परंतु कई मदरसों में स्थिति बिल्कुल अलग है। वहां न तो रसोई की उचित व्यवस्था है और न ही पौष्टिक भोजन परोसा जा रहा है।
लखनऊ के एक मदरसे में जब हम पहुंचे, तो पाया कि बच्चों को सूखी रोटी और नमक दिया जा रहा था। यह बिल्कुल भी पौष्टिक नहीं है और न ही मिड-डे मील योजना के मानकों का पालन करता है। इसी तरह कानपुर के एक अन्य मदरसे में हमें यह जानकारी मिली कि पिछले तीन महीने से किसी भी प्रकार का खाना नहीं दिया जा रहा है। स्कूल प्रबंधन का दावा है कि सरकार से फंड नहीं मिला है, लेकिन रिकॉर्ड में उन्हें साल की शुरुआत में ही पैसे दिए जा चुके हैं।
प्रशासनिक लापरवाही और जवाबदेही की कमी
यूपी के शिक्षा विभाग की ओर से कहा जाता है कि वह इन मदरसों की नियमित निगरानी करते हैं। लेकिन जमीन पर यह निगरानी कहीं दिखाई नहीं दे रही है। कई मदरसों में तो पिछले छह महीने में किसी अधिकारी का दौरा ही नहीं हुआ है। इसका मतलब यह है कि जो भी गड़बड़ी हो रही है, उस पर कोई नियंत्रण नहीं है।
एक बड़ी खामी यह भी निकली कि कई मदरसों के प्रबंधन के पास मिड-डे मील योजना से संबंधित कोई डेटा ही नहीं है। न तो उनके पास भोजन की मात्रा का रिकॉर्ड है और न ही यह विवरण है कि कितने बच्चों को खाना दिया गया। यह पारदर्शिता की पूरी कमी है। सरकार की ओर से जो फंड दिए जा रहे हैं, उनका सही इस्तेमाल हो रहा है, इसकी कोई व्यवस्थित जांच नहीं है।
वित्तीय अनियमितताएं और समाधान की दिशा
आर्थिक पहलू की बात करें, तो मदरसों को दिए जाने वाले फंड में भी विसंगतियां देखने को मिल रही हैं। कुछ जगहों पर पैसे आते हैं, कहीं नहीं आते। इसके अलावा, जहां पैसे आते भी हैं, तो उनका हिसाब ठीक से नहीं रखा जाता। एक मदरसे के संचालक ने यह भी कहा कि उन्हें मिड-डे मील के लिए जो राशि दी गई है, वह खाद्य सामग्री खरीदने के लिए काफी नहीं है। महंगाई के इस दौर में, दिए जाने वाली राशि वास्तविक लागत के अनुरूप नहीं है।
इसके समाधान के लिए कई सुझाव दिए जा रहे हैं। सबसे पहली जरूरत है कि सरकार का कोई स्वतंत्र निकाय नियमित रूप से इन मदरसों का निरीक्षण करे। दूसरा, मिड-डे मील से संबंधित आंकड़े को पारदर्शी तरीके से रखा जाए। तीसरा, मदरसों को दी जाने वाली राशि वास्तविक आवश्यकता के अनुसार बढ़ाई जाए। चौथा, प्रत्येक मदरसे में एक समर्पित व्यक्ति को भोजन की व्यवस्था के लिए नियुक्त किया जाए।
उत्तर प्रदेश सरकार के लिए यह समय है कि वह इस मामले को गंभीरता से लें और मदरसों में मिड-डे मील योजना को सही तरीके से लागू करने के लिए ठोस कदम उठाएं। बच्चों का पोषण और स्वास्थ्य देश का भविष्य है। सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना को सफल बनाने के लिए केंद्रीय और राज्य स्तर पर समन्वय आवश्यक है। साथ ही, आम जनता और नागरिक समाज को भी इस मुद्दे पर नजर रखनी चाहिए, ताकि सरकार जवाबदेह रहे और हर बच्चे को उचित पोषण मिल सके।




