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Tuesday, 19 May 2026
समाचार

सैन्य सुधारों में सोच बदलने की चुनौती: सीडीएस चौहान

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Komal
संवाददाता
📅 15 May 2026, 6:16 AM ⏱ 1 मिनट 👁 813 views
सैन्य सुधारों में सोच बदलने की चुनौती: सीडीएस चौहान
📷 aarpaarkhabar.com

भारतीय सेना के सर्वोच्च सैन्य अधिकारी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) जनरल अनिल चौहान ने देश की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर चिंताजनक बातें कही हैं। उन्होंने हाल ही में कलम और कवच सम्मेलन में अपने विचार रखते हुए कहा कि सैन्य सुधारों में सबसे बड़ी चुनौती लोगों की सोच को बदलना है। इसके अलावा उन्होंने एक और महत्वपूर्ण बात कहीः भारत थिएटरीकरण के मामले में अन्य विकसित देशों से पन्द्रह साल पीछे है।

सीडीएस जनरल चौहान के ये विचार भारतीय सेना की आधुनिकीकरण की प्रक्रिया और उसमें आने वाली कठिनाइयों को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि केवल नई तकनीक खरीदना या नई व्यवस्था लागू करना काफी नहीं है। इसके लिए संगठन के भीतर मानसिकता में बदलाव आवश्यक है। जब तक सभी स्तरों पर कर्मचारी और अधिकारी नई सोच को अपनाने के लिए तैयार नहीं होंगे, तब तक सैन्य सुधार पूरी तरह से सफल नहीं हो सकते।

थिएटरीकरण में भारत का पिछड़ापन

थिएटरीकरण का मतलब है सेना को विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों और जिम्मेदारियों के आधार पर संगठित करना ताकि संकट के समय तेजी से प्रतिक्रिया दी जा सके। पश्चिमी देश और चीन जैसी शक्तियां इस व्यवस्था को लंबे समय से अपनाए हुए हैं। ये देश अपनी सेना को विभिन्न कमांड के अंतर्गत संचालित करते हैं जो विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों की जिम्मेदारी लेते हैं।

सीडीएस की टिप्पणी के अनुसार भारत इस क्षेत्र में काफी पिछड़ा हुआ है। पन्द्रह साल का अंतराल यह दर्शाता है कि हमारी सेना अभी भी परंपरागत संरचना में काम कर रही है। थिएटर कमांड की व्यवस्था से सेना की कार्यक्षमता में भारी सुधार आ सकता है। इससे रक्षा मंत्रालय और सेना के विभिन्न अंगों के बीच बेहतर समन्वय संभव होता है। साथ ही, इससे युद्ध की स्थिति में भी तेजी से निर्णय लिए जा सकते हैं।

भारतीय सेना के पास विश्व की सबसे बड़ी सेनाओं में से एक है, लेकिन संगठनात्मक ढांचे की दृष्टि से वह आधुनिक देशों के मुकाबले पिछड़ी हुई है। सीडीएस चौहान की बातें इसी वास्तविकता को दर्शाती हैं। हालांकि, भारत सरकार इस दिशा में कदम उठा रही है और थिएटर कमांड्स की स्थापना की प्रक्रिया चल रही है।

मानसिकता परिवर्तन की जरूरत

सीडीएस जनरल चौहान ने जो बात कही है कि सैन्य सुधारों में मानसिकता का बदलाव सबसे बड़ी चुनौती है, यह बिल्कुल सटीक है। किसी भी संगठन में बड़े बदलाव लाने के लिए सबसे पहले मानसिक स्तर पर लोगों को तैयार करना पड़ता है। सेना में हजारों अधिकारी और लाखों जवान हैं। इन सभी को नई व्यवस्था और नई सोच को स्वीकार करने के लिए प्रशिक्षित करना एक बहुत बड़ा काम है।

परंपरागत तरीके से काम करने वाले लोगों को नई तकनीक और नई प्रक्रियाओं को अपनाने में समय लगता है। कुछ लोग परिवर्तन के विरोधी होते हैं क्योंकि उन्हें पुरानी व्यवस्था में आरामदायक लगती है। सेना में भी ऐसी मानसिकता वाले लोग हो सकते हैं जो नई व्यवस्था को लेकर संशय रखते हैं। ऐसे में सभी स्तरों पर नेतृत्व को मजबूत होना चाहिए और सुधारों के प्रति प्रतिबद्ध रहना चाहिए।

सीडीएस की बातों से यह भी जाहिर होता है कि भारतीय नेतृत्व सैन्य सुधारों के प्रति गंभीर है। वे यह स्वीकार कर रहे हैं कि हम पिछड़े हुए हैं और इसे दूर करने के लिए कड़े कदम उठाने की जरूरत है। यह एक सकारात्मक संकेत है।

भविष्य की चुनौतियां और समाधान

भारत को अगले कुछ वर्षों में अपनी सेना को आधुनिकीकृत करना होगा। थिएटर कमांड्स की स्थापना पहले ही शुरू हो चुकी है। भारतीय नौसेना ने पहले से ही इस व्यवस्था को अपना लिया है। भारतीय वायु सेना भी इस दिशा में आगे बढ़ रही है। भारतीय थल सेना भी इसी प्रक्रिया में है। इन सभी सेवाओं को एक साथ काम करना होगा ताकि एक समन्वित सुरक्षा ढांचा बन सके।

सीडीएस का पद ही इसी समन्वय को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था। जनरल अनिल चौहान जैसे अनुभवी नेताओं की उपस्थिति से यह आशा बढ़ती है कि भारत की सेना आने वाले समय में और मजबूत व आधुनिक होगी। हालांकि, मानसिकता परिवर्तन में समय लगेगा, लेकिन यदि प्रतिबद्धता और निष्ठा से काम लिया जाए तो यह संभव है।

भारत को एक समर्थ और आधुनिक सेना की जरूरत है जो आने वाली चुनौतियों का सामना कर सके। चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ सीमावर्ती क्षेत्रों में तनाव को देखते हुए, सैन्य आधुनिकीकरण अब केवल वांछनीय नहीं बल्कि अनिवार्य हो गया है। सीडीएस की बातें इसी आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।

संक्षेप में कहें तो भारत सैन्य सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहा है, लेकिन इसमें अभी लंबी दूरी तय करनी है। मानसिकता में बदलाव, तकनीकी सुधार, और बेहतर समन्वय ये सभी बातें एक साथ करनी होंगी। अगर सरकार और सेना के शीर्ष नेतृत्व इसी गति से काम करते रहे, तो आने वाले दशक में भारतीय सेना निश्चित ही एक वैश्विक मानक की सेना बन जाएगी।