सिद्धारमैया की शक्ति बनाए रखने की कोशिश हाईकमान ने ठुकराई
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया अपनी शक्ति को बनाए रखने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसी कड़ी में उन्होंने कांग्रेस हाईकमान के सामने एक नया प्रस्ताव रखा है। उनका मानना है कि कर्नाटक में एक समन्वय समिति बनाई जानी चाहिए जो सरकार और पार्टी संगठन के बीच बेहतर तालमेल स्थापित कर सके। लेकिन दिल्ली में बैठे कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने इस प्रस्ताव को सीधे खारिज कर दिया है।
यह पूरा मामला कर्नाटक राजनीति में चल रही आंतरिक कशमकश को दर्शाता है। सिद्धारमैया का यह कदम स्पष्ट संकेत देता है कि वह अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि एक औपचारिक समन्वय समिति के जरिए वह कांग्रेस संगठन पर अपनी पकड़ को मजबूत रख सकते हैं। साथ ही, सरकार के निर्णय लेने में भी वह अधिक प्रभावशाली बने रह सकते हैं।
यह बात दिलचस्प है कि सिद्धारमैया ने अपने प्रस्ताव के लिए 2018 के कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार का उदाहरण दिया है। उस समय एक समन्वय समिति का गठन किया गया था जो दोनों पक्षों के बीच एक सेतु की भूमिका निभाता था। सिद्धारमैया का कहना है कि वही व्यवस्था आज भी कर्नाटक में काम कर सकती है। लेकिन कांग्रेस हाईकमान को लगता है कि यह व्यवस्था अनावश्यक है और यह पार्टी के आंतरिक मामलों में जटिलता ला सकती है।
कर्नाटक में चल रहा राजनीतिक खेल
कर्नाटक की राजनीति में पिछले कुछ साल से काफी उथल-पुथल देखी जा रही है। सिद्धारमैया के मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही पार्टी के अंदर विभिन्न गुट सक्रिय हो गए हैं। डिप्टी सीएम डी.के. शिवकुमार के साथ सिद्धारमैया के बीच नेतृत्व को लेकर एक स्पष्ट प्रतिद्वंद्विता दिखाई दे रही है। ऐसी परिस्थिति में सिद्धारमैया यह समन्वय समिति बनाकर अपनी स्थिति को मजबूत करना चाहते थे।
इस समिति में सिद्धारमैया का प्रभाव निश्चित होता क्योंकि वह मुख्यमंत्री के रूप में इसके महत्वपूर्ण सदस्य होते। सरकार और पार्टी संगठन के बीच किसी भी विवाद को सुलझाने में वह एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते थे। लेकिन हाईकमान को यह पसंद नहीं आया। उन्हें लगता है कि इससे संगठन की आंतरिक जिम्मेदारी कम हो जाएगी और सब कुछ मुख्यमंत्री के इशारे पर चलने लगेगा।
हाईकमान का रुख और पार्टी की नीति
कांग्रेस हाईकमान का यह फैसला पार्टी के आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत रखने की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जा सकता है। हाईकमान का स्पष्ट संदेश है कि सरकार और संगठन के बीच एक निश्चित दूरी होनी चाहिए। अगर सब कुछ एक समन्वय समिति के माध्यम से चलने लगे तो संगठन की स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
यह भी संभव है कि हाईकमान को सिद्धारमैया की निरंतर शक्ति बढ़ाने की कोशिश पसंद नहीं आई है। पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेताओं ने कई बार संकेत दिया है कि वह सभी नेताओं को समान महत्व देना चाहते हैं। डी.के. शिवकुमार को डिप्टी सीएम का पद देना भी इसी नीति का हिस्सा था। अब अगर सिद्धारमैया को एक समन्वय समिति के माध्यम से अतिरिक्त शक्तियां मिल जातीं तो यह संतुलन बिगड़ सकता था।
भविष्य में क्या हो सकता है
सिद्धारमैया के इस प्रस्ताव का खारिज किया जाना कर्नाटक की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। यह साफ संकेत देता है कि हाईकमान सिद्धारमैया को अतिरिक्त शक्तियां देने में असमर्थ या अनिच्छुक है। इसके आगे के दिन काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। सिद्धारमैया यह निर्णय कैसे लेते हैं यह देखने की बात होगी।
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार अगले चुनावों तक बनी रहे इसके लिए पार्टी को आंतरिक समरसता बनाए रखनी होगी। सिद्धारमैया और डी.के. शिवकुमार दोनों को एक-दूसरे के साथ काम करना होगा। लेकिन जब तक पार्टी का नेतृत्व स्पष्ट नहीं होगा तब तक यह कशमकश जारी रहेगी। आने वाले दिन कर्नाटक की राजनीति के लिए काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं और सब कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि हाईकमान और सिद्धारमैया आपस में किस तरह का समझौता कर पाते हैं।




